लगातार जारी हो रहे टेंडर, भुगतान के लिए रो रहे वेंडर: रेल में आखिर किसके इशारे पर चल रहा है यह खेल?
दिल्ली, 29 मार्च: एक तरफ भारतीय रेल के ठेकेदारों और वेंडरों के करोड़ों रुपये के भुगतान लंबे समय से लंबित पड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ रेल अधिकारियों द्वारा लगातार नए टेंडर जारी किए जाने से व्यवस्था की नीयत और प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। निर्माण कार्यों, यथा स्टेशन विकास, शेड, सर्कुलेटिंग एरिया, यात्री सुविधाओं और अन्य इंजीनियरिंग कार्यों से जुड़े अनेक ठेकेदारों का कहना है कि समय पर भुगतान न मिलने के कारण उनकी वित्तीय स्थिति बुरी तरह प्रभावित हुई है। मशीनरी, मजदूरी, डीजल, सामग्री और सप्लायर भुगतान तक संभालना मुश्किल हो गया है, फिर भी रेल प्रशासन पुराने भुगतान दायित्वों को निपटाने के बजाय नए टेंडरों की फाइलें आगे बढ़ाने में व्यस्त दिखाई दे रहा है।
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स्थिति अब केवल भुगतान में देरी तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका सीधा असर रेलवे की टेंडर प्रक्रिया पर भी पड़ने लगा है। ठेकेदारों का कहना है कि जब पुराने बिलों का भुगतान ही अटका हुआ है, तब कोई भी जिम्मेदार एजेंसी या ठेकेदार नए कार्यों में जोखिम लेकर प्रतिस्पर्धी दरों पर बोली कैसे और क्यों लगाए? परिणामस्वरूप कई सक्षम और अनुभवी ठेकेदार अब टेंडरों में भाग लेने से बच रहे हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा घट रही है और निविदा प्रक्रिया सीमित हाथों तक सिमटने का खतरा बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा समाप्त होती है, तो अंततः नुकसान सरकारी खजाने, परियोजनाओं—कार्यों एवं सामग्री—की गुणवत्ता और सार्वजनिक हित—तीनों को होगा।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब रेलवे अपने वर्तमान वित्तीय दायित्वों का सम्मानपूर्वक निर्वहन नहीं कर पा रहा है, तब नए टेंडरों की इतनी जल्दबाजी आखिर क्यों दिखाई जा रही है? क्या यह केवल कागजी उपलब्धियाँ दिखाने का प्रयास है, या फिर प्रशासनिक स्तर पर प्राथमिकताओं का गंभीर विचलन हो गया है?
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यदि भुगतान लंबित रहने के कारण वास्तविक प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो रही है, तो ऐसी निविदाओं की निष्पक्षता और वैधता दोनों ही संदेह के घेरे में आती हैं। ठेकेदारों और संबंधित पक्षों के बीच यह मांग तेजी से उठ रही है कि 12 मार्च 2026 के बाद जारी सभी टेंडरों की समीक्षा की जाए और आवश्यक होने पर उन्हें निरस्त किया जाए, ताकि पहले लंबित भुगतानों का निपटान हो और उसके बाद ही नई निविदा प्रक्रिया शुरू की जाए।
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अब औचित्य सीधे-सीधे जवाबदेही का है। ऐसी स्थिति में जिम्मेदार अधिकारी कौन हैं? किसके आदेश या मौन समर्थन से भुगतान रोके जाने के बावजूद नई निविदाएँ निकाली जा रही हैं? क्या संबंधित वित्त, इंजीनियरिंग, निर्माण और प्रशासनिक शाखाओं के अधिकारी इस स्थिति के लिए उत्तरदायी नहीं हैं? यदि ठेकेदार भुगतान अभाव के कारण भाग नहीं ले पा रहे हैं, तो क्या यह स्थिति रेलवे की टेंडर प्रणाली में कृत्रिम रूप से प्रतिस्पर्धा कम करने जैसी नहीं है? सार्वजनिक धन से चलने वाली संस्था में इस प्रकार की कार्यशैली केवल प्रशासनिक असंतुलन नहीं, बल्कि जनहित और वित्तीय अनुशासन दोनों के विरुद्ध मानी जाएगी।
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रेलवे जैसे विशाल सार्वजनिक तंत्र में पारदर्शिता, निष्पक्षता और वित्तीय अनुशासन केवल कागजों की भाषा नहीं हो सकते। यदि पुराने ठेकेदारों और वेंडरों को उनका वैध भुगतान नहीं दिया जा रहा, तो नए कार्यों की घोषणा और टेंडर जारी करना व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर करता है। अब आवश्यकता केवल स्पष्टीकरण की नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की है — लंबित समस्त भुगतान तत्काल जारी हों, 12 मार्च 2026 के बाद जारी टेंडरों की जांच हो, और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। क्योंकि अब प्रश्न केवल ठेकेदारों के भुगतान का नहीं, बल्कि पूरे रेल प्रशासन की विश्वसनीयता का है।

