रेलवे के मेगा टेंडरों पर प्रश्नचिह्न और कुछ कंपनियों का बढ़ता एकाधिकार!

छोटे ठेकेदारों-छोटी कंपनियों की भागीदारी खत्म, बड़ी कंपनियाँ का कब्जा, सिस्टम पर बड़े खेल के आरोप

भारतीय रेल में पिछले कुछ वर्षों से लगातार बड़े और हाई-वैल्यू टेंडर जारी किए जा रहे हैं। सरकार इसे विकास और आधुनिकीकरण की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, लेकिन दूसरी ओर कुछ चुनिंदा कंपनियों का एकाधिकार बनाया जा रहा है। इससे छोटे और मध्यम श्रेणी के रेलवे ठेकेदारों में बड़े पैमाने पर असंतोष बढ़ रहा है। उनका आरोप है कि रेलवे की टेंडर व्यवस्था अब कुछ चुनिंदा बड़ी कंपनियों तक सीमित होती जा रही है, जिससे हजारों स्थानीय ठेकेदारों का भविष्य खतरे में पड़ गया है।

रेलवे के ठेकेदारों का कहना है कि पहले जिन कार्यों को अलग-अलग पैकेजों में निकाला जाता था, अब उन्हें जोड़कर विशाल टेंडर बना दिए जाते हैं। ऐसे टेंडरों में केवल वही कंपनियां भाग ले पाती हैं जिनके पास भारी वित्तीय क्षमता और बाजार से जुटाई गई पूंजी होती है। छोटे और मध्यम श्रेणी के ठेकेदार तकनीकी अनुभव होने के बावजूद वित्तीय पात्रता की शर्तों के कारण बाहर हो जाते हैं।

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सबसे गंभीर आरोप यह लगाया जा रहा है कि कई बड़ी कंपनियां सार्वजनिक धन यानि शेयर बाजार से पैसा जुटाकर रेलवे के मेगा टेंडर हासिल कर रही हैं। ठेकेदारों का दावा है कि इस पूरी व्यवस्था में कुछ अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों की अंदरूनी भूमिका भी हो सकती है। आरोप यहां तक लगाए जा रहे हैं कि कुछ अधिकारी अप्रत्यक्ष रूप से इन पब्लिक शेयर होल्डिंग कंपनियों में निवेश कर बड़ा लाभ उठा रहे हैं, जिससे टेंडर प्रक्रिया की निष्पक्षता पर बड़े प्रश्न खड़े हो रहे हैं।

रेलवे क्षेत्र से जुड़े कई जानकारों का मानना है कि मेगा टेंडरों के पीछे की पिक्चर उतनी साफ नहीं दिखती जितनी दिखाई जाती है। आलोचकों के अनुसार, “यह केवल विकास का मॉडल नहीं, बल्कि सिस्टम का एक “डर्टी गेम” बनता जा रहा है, जिसमें छोटे ठेकेदारों के हितों की अनदेखी की जा रही है।”

यह स्थिति प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “वोकल फॉर लोकल” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसे नारों की भावना के विपरीत मानी जा रही है। यदि स्थानीय और मध्यम स्तर के उद्यमियों को ही अवसर नहीं मिलेगा, तो आत्मनिर्भर भारत का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि रेल परियोजनाओं को छोटे और व्यवहारिक हिस्सों में विभाजित किया जाए, ताकि अधिक से अधिक स्थानीय और मध्यम स्तर के ठेकेदार भाग ले सकें। इससे न केवल स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, बल्कि रोजगार, पारदर्शिता और क्षेत्रीय आर्थिक विकास को भी मजबूती मिलेगी।

रेलवे के मेगा टेंडरों को लेकर बढ़ती नाराजगी के बीच कई ठेकेदारों में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि गृहमंत्री अमित शाह जैसे जमीनी राजनीति से जुड़े नेता आम लोगों, छोटे व्यापारियों और स्थानीय ठेकेदारों की समस्याओं को बेहतर ढ़ंग से समझते हैं। कई ठेकेदारों का मानना है कि भविष्य में यदि उन्हें बड़ा दायित्व मिलता है, तो छोटे और मध्यम वर्ग के उद्यमियों को सिस्टम में अधिक भागीदारी और न्याय मिलने की उम्मीद बढ़ सकती है।

भारतीय रेल देश की संपत्ति है, अतः इसके विकास में देश के हर वर्ग की भागीदारी आवश्यक है। अब देखना यह होगा कि रेल मंत्रालय इन बढ़ते प्रश्नचिह्नों और असंतोष पर क्या कदम उठाता है!