सेंट्रल रेलवे: गार्डों का बेल विरोध—मोटा वेतन, जनहित-जवाबदेही शून्य, और अब “ईमेल-बमबारी!” भाग-5
एक ही टेम्पलेट, एक ही टंकण-त्रुटि, एक ही उद्देश्य — सच पर पर्दा डालना!
सुरेश त्रिपाठी
पिछले अड़तालीस घंटों में हमारे सम्पादकीय इनबॉक्स पर एक “प्राकृतिक चमत्कार” घटित हुआ है। दर्जनों भिन्न नामों, भिन्न पतों, भिन्न ईमेल आईडी से एक ही पत्र आ रहा है। एक ही मराठी-हिंदी मिश्रण, एक ही जगह “मॅनेजर” की बिंदुयुक्त वर्तनी, एक ही जगह “पोहोचणे” का व्यंजन-दोष, एक ही जगह “कलंकित” का अनुनासिक छूट जाना। प्रेषक बदलते हैं — कॉमा भी नहीं बदलता।

संयोग ऐसा कि चार-पांच दर्जन “स्वतंत्र नागरिक” एक साथ बैठकर बिल्कुल एक जैसी गलतियाँ करें। यदि भारत में सचमुच टेलीपैथी का आविष्कार हो गया है, तो यह वैज्ञानिक उपलब्धि है, सम्पादक को बताया जाना चाहिए था। हम दूसरी संभावना पर दांव लगाते हैं — यह संगठित अभियान है, यूनियन-संचालित कट-पेस्ट क्रांति।
पहली बात : कुछ संदेश सच्चे थे—उनको हमारा सम्मान
हमें कई वास्तविक, अपने नाम से लिखे, हस्ताक्षरित संदेश भी मिले हैं। रनिंग स्टाफ के उन साथियों से, जिनके लिए “एक बेल बजाना” स्वाभिमान का प्रश्न नहीं, ड्यूटी का स्वाभाविक हिस्सा है। यह वही ईमानदार रनिंग कैडर है जो रात के दो बजे जलते डिब्बे के सामने पहली टॉर्च लेकर खड़ा होता है, हॉट-एक्सल पर तत्काल कार्रवाई करता है, ट्रेन-पार्टिंग की स्थिति में लाइन-प्रोटेक्शन के लिए अंधेरे में दौड़ता है। “इस कैडर को हमारा हार्दिक नमन है — और हमारी आलोचना का स्वर इन पर कभी नहीं था, न है।”
मूल भाग-1 में हमने स्पष्ट लिखा था : “मुंबई के उपनगरीय नेटवर्क में ट्रेन चलाना एक कठिन काम है — यह वाकई कठिन है।” समस्या काम की कठिनाई से नहीं — समस्या उस राजनीति से है, उस मानसिकता से है, जो कठिनाई की आड़ में कर्तव्य और अनुशासन से इनकार करती है।
टेम्पलेट-आधारित ईमेल-बमबारी अभियान दरअसल इन्हीं ईमानदार साथियों की हानि कर रहा है। यह पूरे कैडर को कुछ अहंकारी आवाजों का बंधक बना रहा है। जब चालीस लाख यात्री “गार्ड” शब्द सुनकर तमतमाने लगेंगे, तब घाटा कुर्ला से चलने वाले उस ईमानदार गार्ड का होगा, जिसने इस अभियान में कोई हिस्सा नहीं लिया था।
दूसरी बात : मूल आरोप का खंडन नहीं हुआ—दोहराव हुआ
संशोधन पर्ची संख्या 15 का आग्रह क्या है? मात्र एक घंटी! निर्धारित स्टॉप से पहले मोटरमैन को एक बार सचेत कर देना! ट्रेन यदि अब भी रुकने योग्य गति से अधिक तेज हो, तो ब्रेक लगाने में सहयोग। बस इतना ही। न रात-भर निर्जन सेक्शन में अकेले खड़े होने को कहा गया है, न लोको खींचने को।
टेम्पलेट तर्क करता है — गार्ड 5000-7000 टन की मालगाड़ी संभालते हैं, घाट सेक्शन में अकेले ड्यूटी करते हैं, कोहरे में बारह-चौदह घंटे जागते हैं। ये सब बातें सच हैं। लेकिन यह विरोध मालगाड़ी पर नहीं है। यह 12-कोच की उपनगरीय लोकल पर है, जिसमें 4,000 यात्री बैठे हैं, जो भांडुप, घाटकोपर, ठाणे, डोंबिवली इत्यादि सभी स्टेशनों पर रुकती है — जंगल-घाट में नहीं। यहाँ न हॉट-एक्सल का खतरा है, न ट्रेन-पार्टिंग की जटिलता।
यहाँ केवल यह है — कि 17 मार्च को कल्याण-एसी लोकल भांडुप प्लेटफॉर्म से दो डिब्बे आगे निकल गई थी; विक्रोली में भी वही हुआ। वेस्टर्न रेलवे के गार्ड बिना किसी आंदोलन के यही काम पहले से करते आ रहे हैं। सेंट्रल रेलवे के गार्डों का “स्वाभिमान” तभी क्यों दुखा?
उत्तर हमने भाग-2 में स्पष्ट लिखा था — ब्रेक लगाने का अर्थ है सह-जिम्मेदारी। और जिस कैडर ने जवाबदेही से बचने को अपना मूल कर्तव्य समझ लिया हो, वहाँ कोई भी अतिरिक्त उत्तरदायित्व “अकल्पनीय बोझ” लगता है।
तीसरी बात : न्यायपालिका का दो टूक मत
यह कोई नई बहस नहीं है। टी. के. रंगराजन बनाम तमिलनाडु सरकार (2003) 6 SCC 581 में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा था — “Government employees have no fundamental, legal, statutory or even equitable right to go on strike.” न्यायालय ने अपने इस आदेश में यह भी जोड़ा था — “हड़ताल का प्रयोग समाज को बंधक बनाने का साधन नहीं बन सकता!”
कामेश्वर प्रसाद बनाम बिहार राज्य (1962) से लेकर बी. आर. सिंह बनाम भारत संघ (1990) तक सर्वोच्च न्यायालय एक ही बात दोहराता रहा है — “संगठन बनाने का अधिकार मौलिक है, हड़ताल का अधिकार नहीं!” ‘वर्क-टू-रूल’ स्वयं को “अनुशासित कार्य” बताकर हड़ताल के सभी परिणाम पैदा करता है — श्रम-न्यायशास्त्र में इसे constructive strike कहा जाता है, और रेलवे का विषय तो Essential Services Maintenance Act के अंतर्गत स्पष्ट रूप से आता है।
संक्षेप में — जो किया जा रहा है, वह कानूनी रूप से बचाव-योग्य नहीं है। केवल राजनीतिक रूप से सुविधाजनक है।
चौथी बात : अर्थशास्त्र का सटीक उत्तर
अब टेम्पलेट का सबसे मासूम तर्क — “रनिंग अलाउंस कोई कृपा नहीं, अध्ययन का परिणाम है।” बिल्कुल सही। हर वेतन आयोग ने 30% पे-एलिमेंट, किलोमीटर भत्ता, पेंशन के लिए 55% गणना — सब बनाए रखा है। समस्या इस संरचना से नहीं — इसकी “पवित्रता” पर अड़ने से है। इसको स्थायी अधिकार समझ लेने से है।
अर्थशास्त्री मांकर ओल्सन ने 1965 में अपनी कृति “The Logic of Collective Action” में जो सिद्धांत स्थापित किया था, मुंबई CSMT उसका जीवंत प्रदर्शन है — केंद्रित लाभ, बिखरा हुआ खर्च (concentrated benefits, dispersed costs)। दो हजार गार्डों को मिलने वाले लाभ केंद्रित हैं, मुंबई के अस्सी लाख दैनिक यात्रियों का खर्च बिखरा हुआ। संगठित अल्पसंख्यक (रनिंग स्टाफ) सदैव असंगठित बहुसंख्यक (रेल यात्री) पर भारी पड़ता है — जब तक बहुसंख्यक (जनता) जाग न जाए।
अर्थशास्त्री एन क्रूगर ने इसी प्रवृत्ति को 1974 में “rent-seeking” कहा था — “संगठित समूह राज्य की कीमत पर बाजार-मूल्य से ऊपर का लाभ निकालते रहते हैं, उत्पादकता बढ़ाए बिना।”
सातवें वेतन आयोग ने स्वयं रिकॉर्ड किया कि “भारतीय रेल के गैर-राजपत्रित पदों के वेतन निजी क्षेत्र के समकक्ष पदों से दो-तीन गुना अधिक हैं।” यह कोई गुप्त निष्कर्ष नहीं — यह आयोग की रिपोर्ट का खुला पन्ना है।
और हर पेशे में कठिनाई होती है। आईसीयू-नर्स बारह घंटे की शिफ्ट में मरते मरीज के साथ खड़ी रहती है—उसे किलोमीटर भत्ता नहीं मिलता। ट्रक चालक रात-भर हाइवे पर अकेला डीजल जलाता है—उसे 55% पेंशन-गणना नहीं मिलती। फायर ब्रिगेड का जवान आग में कूदता है—उसे “रनिंग एलिमेंट” नहीं मिलता। सेना का जवान सियाचिन में -50 डिग्री पर खड़ा रहता है — उसकी पेंशन अब भी OROP के बावजूद विवादित है।
तब केवल रेलवे का रनिंग कैडर ही ऐसा “अद्वितीय” क्यों है कि एक बेल बजाने पर सम्पूर्ण मुंबई बंधक बना ली जाए?
पाँचवीं बात : मंगला झिंगाड़े का प्रश्न आज भी अनुत्तरित है!
6 नवंबर 2025 की शाम जब #CRMS ने मोटरमैन लॉबी का दरवाजा लॉक किया था, उन्नीस वर्ष की हेली मोमैया रेल की चपेट में आकर मर गई थीं। उनके बगल में एक अज्ञात व्यक्ति की भी मौत हो गई। तीन गंभीर रूप से घायल हुए। उसी शाम भायखला जा रही मंगला झिंगाड़े ने — अपनी बेटी की शादी के कार्ड हाथ में लिए — एक रिपोर्टर से पूछा था : “अगर किसी की जान चली गई तो जिम्मेदारी कौन लेगा?”
छह महीने बीत गए। दो लोग दफनाए जा चुके हैं। उनके प्रश्नों का उत्तर अब तक कोई नहीं देता। न #CRMS, न #NRMU, न वह #यूनियन जिसने उस शाम मोटरमैन लॉबी का गेट लॉक कराया था, न वे—जो अब “विक्षिप्त पत्रकार” का नारा लगा रहे हैं।
और अंत में—
यूनियनों से हमारी कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं। हमें ईमानदार रनिंग स्टाफ से तो कतई कोई पूर्वाग्रह नहीं। हमें टेम्पलेट-आधारित ईमेल-बमबारी से डर भी नहीं लगता। कल अगर इनकी संख्या पंद्रह सौ हो जाए, तो भी हम अपनी बात नहीं बदलेंगे। पत्रकारिता का काम सत्ता को साष्टांग करना नहीं — सच कहना है। चाहे वह सत्ता रेल मंत्रालय की हो, या यूनियन-लॉबी की।
और सच यह है — एक घंटी बजाने से इनकार करने के लिए चालीस लाख यात्रियों को बंधक बनाना न तो “विरोध” है, न ही “स्वाभिमान।” यह—स्पष्ट शब्दों में—आपराधिक उद्दंडता है, आपराधिक अहंकार है, क्रूर एनटाइटलमेंट है—जो टी. के. रंगराजन निर्णय के विरुद्ध है, ESMA के विरुद्ध है, और सबसे ऊपर — उन करदाताओं के विरुद्ध है, जिनके पैसे से इन भत्तों का एक-एक रुपया चुकाया जाता है।
मंगला झिंगाड़े का प्रश्न जब तक अनुत्तरित है, हम लिखते रहेंगे। क्रमशः…

