बिल भुगतान न होने से ठेकेदारों में भारी रोष, रेलवे टेंडर प्रक्रिया पर उठे गंभीर प्रश्न

नई दिल्ली: रेलवे में फंड रोककर टेंडर प्रक्रिया पर प्रश्न उठ रहे हैं, वेंडर्स-ठेकेदारों में भारी आक्रोश पैदा हो गया है। भारतीय रेल की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर संदेह के घेरे में है। सूत्रों के अनुसार, पिछले 15 दिनों से रेलवे बोर्ड द्वारा सभी भुगतान रोक दिए गए हैं, जबकि दूसरी ओर लगातार नए टेंडर जारी किए जा रहे हैं। इस विरोधाभासी स्थिति ने ठेकेदारों और निर्माण एजेंसियों के बीच भारी असंतोष पैदा कर दिया है।

ठेकेदारों का आरोप है कि रेलवे द्वारा फंड रोक दिए जाने और भुगतान न होने के कारण उनकी वित्तीय स्थिति कमजोर हो रही है। उनके लेबर्स की सैलरी और बैंक की किस्तें अटक गई हैं। इसके अलावा कार्यशील पूंजी की कमी के चलते वे मजबूरी में उच्च दरों पर बोली लगाने को विवश हो रहे हैं। इससे न केवल प्रतिस्पर्धा कम हो रही है, बल्कि टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं।

जानकारों का मानना है कि इस तरह की स्थिति में:

  • टेंडर में भाग लेने वाले ठेकेदारों की संख्या घटती है!
  • बोली की दरें अस्वाभाविक रूप से बढ़ती हैं!
  • कुछ चुनिंदा पक्षों को लाभ पहुंचाने की संभावना बनती है!
  • और अंततः सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है!

जानकारों का यह भी कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया में “मोटे कमीशन” की संभावना पैदा होती है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता, जिससे ठेकेदारों का भरोसा लगातार टूट रहा है।

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ठेकेदारों ने मांग की है कि—

  • लंबित भुगतान तुरंत जारी किए जाएं!
  • समान वित्तीय स्थिति सुनिश्चित की जाए!
  • टेंडर प्रक्रिया को निष्पक्ष एवं पारदर्शी बनाया जाए!
  • और, सभी पक्षों/स्टेकहोल्डर्स का टेंडर प्रक्रिया में भाग लेने का समान अवसर प्रदान किया जाए!

वेंडर्स पूछ रहे हैं कि—जब फंड ही नहीं है, तो टेंडर क्यों जारी किए जा रहे हैं? और यदि टेंडर है, तो भुगतान में देरी क्यों हो रही है? वे यह भी पूछ रहे हैं कि यह स्थिति हर साल मार्च में ही क्यों पैदा की जाती है?

आश्चर्य इस बात का है कि जहां एक तरफ वेंडर्स/ठेकेदारों में बिलों के भुगतान में हो रही देरी के कारण त्राहिमाम हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ रेल प्रशासन की ओर से अभी तक इस मामले में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, जिससे संदेह और गहराता जा रहा है।