विशेष रिपोर्ट: धनबाद मंडल में रोटेशन नीति की धज्जियां उड़ाता सिंडिकेट और वित्तीय अनियमितताएँ!
धनबाद मंडल, पूर्व मध्य रेलवे (#ECR) में स्थानांतरण, पदस्थापना और प्रशासनिक नियमों को ताक पर रखकर एक बड़े सिंडिकेट द्वारा कदाचारपूर्ण समानांतर व्यवस्था चलाई जा रही है। कर्मचारियों का आरोप है कि लगभग सात महीने पहले प्रतिनियुक्ति के आदेश जारी होने के बावजूद सीनियर डीईएन/कोऑर्डिनेशन के पद से हटने का नाम नहीं ले रहे अधिकारी द्वारा अवैध उगाही के लिए नीचे के स्टाफ (JE/PWI/IOW) को ताश के पत्तों की तरह फेंटा जा रहा है। इस मंडल के तहत धनबाद, पाथरडीह, गोमो और कतरास जैसे चुनिंदा स्टेशनों के बीच ही निरीक्षकों/सुपरवाइजरों का एक निश्चित समूह लगातार परिक्रमा कर रहा है और इन्हें संबंधित अधिकारियों का पूरा संरक्षण प्राप्त है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार आईओडब्ल्यू रतनशंकर, मनीष और राजेश पासवान के साथ-साथ पीडब्ल्यूआई राजेश प्रसाद, राजेश कुमार, संजय, अवनीश और शैलेन्द्र जैसे नाम इस कथित सिंडिकेट के मुख्य चेहरे बनकर उभरे हैं। पीड़ित कर्मचारियों का आरोप है कि इन कर्मियों द्वारा हर स्तर पर फर्जी हाजिरी और जाली बिल बनाकर सरकारी राजस्व की खुली लूट का तंत्र विकसित कर लिया गया है। जुगाड़ तकनीक और अपनी भारी वित्तीय भुगतान क्षमताओं की बदौलत ये सभी कर्मी सदैव अपनी मनपसंद पोस्टिंग हासिल करने में सफल रहते हैं। धनबाद मंडल की प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार के लिए इन सभी को इस क्षेत्र से तत्काल प्रभाव से दूर स्थानांतरित करना अपरिहार्य हो चुका है।
इस भ्रष्टाचार और प्रभाव के संजाल की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कतरास स्पेशल पीडब्ल्यूआई के पद पर मात्र 8 महीने पहले पदस्थापित किए गए अवनीश कुमार खुलेआम यह दावा कर रहे हैं कि स्वयं एसडीजीएम/ईसीआर उन्हें धनबाद का प्रभारी बनाना चाहते हैं और उनके द्वारा इसके लिए बकायदा सिफारिश भी की गई है। यदि शीर्ष स्तर से ऐसी सिफारिशें की जा रही हैं, तो यह पूरी रेल प्रणाली की शुचिता के लिए एक अत्यंत चिंताजनक संकेत है।
मंडल में चार वर्ष या उससे अधिक समय से एक ही स्थान पर जमे हुए प्रभारियों की लंबी सूची है, जिसमें प्रभाष चंद्र (एसएसई/पी.वे/पारसनाथ), अजीत कुमार राय (एसएसई/पी.वे/टोरी), अरुण कुमार (एसएसई/पी.वे/बरवाडीह) और विजय सिन्हा (एसएसई/पी.वे/विंधमगंज) शामिल हैं। इसी तरह तीन वर्ष या उससे अधिक समय से अभिषेक सिन्हा (एसएसई/पी.वे/लातेहार), रबींद्र कुमार (एसएसई/पी.वे/डालटनगंज), सतीश चंद्र तिवारी (एसएसई/पी.वे/पतरातु) और संजय कुमार (एसएसई/पी.वे/बरकाकाना) एक ही पद पर लंबे समय से कुंडली मारकर बैठे हुए हैं।

इस सिंडिकेट के चलते जहां अनिवार्य रोटेशन स्थानांतरण नीति पूरी तरह ठप पड़ी है, वहीं सीनियर डीईएन/कोऑर्डिनेशन/धनबाद के संरक्षण और वरदहस्त के चलते नियमों का खुला उल्लंघन हो रहा है। सीनियर डीईएन स्वयं पदोन्नति के बाद किसी भी समय स्थानांतरित होने वाले हैं, लेकिन उनके कार्यकाल के दौरान मात्र 8 महीने पूर्व कतरास के प्रभारी पद से हटाकर स्पेशल पीडब्ल्यूआई बनाए गए अवनीश कुमार को उनकी भारी भुगतान क्षमता के दम पर पुनः प्रभारी पीडब्ल्यूआई धनबाद के महत्वपूर्ण पद पर बिठा दिया गया है। यह पदस्थापना तब की गई है जब पूर्व से धनबाद में पदस्थापित प्रभारी और गोमो के प्रभारी का कार्यकाल अभी तीन वर्ष से भी कम है। प्रशासनिक आवश्यकताओं के नाम पर किए जा रहे इन आदेशों के मापदंड पूरी तरह संदिग्ध और भ्रष्टाचारपूर्ण हैं।
इसी क्रम में कर्मचारियों के बीच यह चर्चा बेहद आम है कि कोऑर्डिनेशन विंग में टेक्निकल एडवाइजर के रूप में नियुक्त आर एन प्रसाद यादव इस पूरे खेल के मुख्य लाइजनर हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि वे अपनी ही जाति के अवनीश कुमार की मलाईदार पोस्टिंग कराने तथा ट्रैक मेंटेनेंस स्टाफ के मुख्यालयों में मनचाहा बदलाव कराने की एवज में मोटी रकमें वसूलने के गोरखधंधे में लिप्त हैं।

बताते हैं कि भ्रष्टाचार की इस कूटनीति में टेक्निकल एडवाइजर आर एन प्रसाद, अवनीश कुमार और ओबीसी यूनियन के अध्यक्ष शैलेन्द्र कुमार की तिकड़ी कुसुंडा और कतरास के इलाकों में गुप्त बैठकें आयोजित करती है। इस सिंडिकेट पर सीनियर डीईएन/कोऑर्डिनेशन के नाम का डर दिखाकर नीचे के कर्मचारियों से अवैध उगाही करने और धूर्ततापूर्ण तरीके से अधिकारियों का विश्वास जीतकर ट्रांसफर-पोस्टिंग तथा मुख्यालय परिवर्तन के खेल से अकूत धन अर्जित करने का गंभीर आरोप है। प्रशासनिक स्तर पर इस व्यवस्था को ठीक करने के लिए वर्तमान स्थानांतरण आदेशों को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाना चाहिए और जिन निरीक्षकों ने एक स्थान पर 4 वर्ष की सेवा पूर्ण कर ली है, उनका रोटेशन नीति के तहत तत्काल अन्यत्र स्थानांतरण किया जाना चाहिए।
यही बदतर स्थिति आईओडब्ल्यू की नियुक्तियों में भी देखने को मिल रही है, जहां रोटेशन के नाम पर केवल धनबाद, गोमो और पाथरडीह के बीच ही इन निरीक्षकों को घुमाया जा रहा है, जबकि इन्हें धनबाद मंडल के अन्य डीईएन यूनिटों में भेजा जाना अनिवार्य है। प्रशासनिक अस्थिरता की स्थिति यह है कि धनबाद में पोस्टिंग के पुराने आदेशों और वर्तमान नए स्थानांतरण आदेशों के बीच समन्वय का अभाव है, और डालटनगंज में किए गए पूर्व के आदेशों को अचानक रद्द करके नए आईओडब्ल्यू की दोबारा मनमानी पोस्टिंग कर दी गई है। कर्मचारियों का आरोप है कि इन विसंगतिपूर्ण स्थानांतरण आदेशों के तहत सीनियर डीईएन/समन्वय की नीति और नीयत दोनों ही भ्रष्ट आचरण में सनी हुई है।

धनबाद मंडल इस समय निम्न स्तर के धंधों में संलिप्त लोगों के लिए एक सुरक्षित चारागाह बन चुका है, जहां धन के बल पर अधिकारियों से कोई भी अनुचित कार्य करवाया जा सकता है। कोयला लोडिंग के अवैध खेल से लेकर हेडक्वार्टर चेंजिंग और मनचाही ट्रांसफर-पोस्टिंग के इस वृहद् भ्रष्ट सिंडिकेट ने समूचे तंत्र को अपनी गिरफ्त में ले रखा है। मंडल में मानव संसाधनों का भी भारी दुरुपयोग हो रहा है, जहां प्रत्येक क्लास-वन अधिकारी के बंगले पर कम से कम 4 ट्रैक मेंटेनेंस स्टाफ नियम विरुद्ध तरीके से पारिवारिक सेवा में लगाए गए हैं।
आश्चर्य की बात यह है कि सीनियर डीईएन/कोऑर्डिनेशन धनबाद का स्थानांतरण आदेश लगभग सात माह पहले जारी हो चुका है, परंतु उन्हें अब तक स्पेयर न किया जाना बेहद गंभीर और जाँच का विषय है। उनके तथाकथित टेक्निकल एडवाइजर ने अपनी धूर्ततापूर्ण युक्ति से उन्हें पूरी तरह गुमराह कर रखा है और उनकी शक्तियों का गलत उपयोग कर निचले कर्मचारियों का शोषण कर रहा है। रेलवे नियमों के तहत सीनियर डीईएन/कोऑर्डिनेशन जैसे एक ब्रांच ऑफिसर को ऐसा कोई एडवाइजर या टेक्निकल एडवाइजर रखने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है। यह सीधे तौर पर मानव संसाधन का अपव्यय और अवैध उगाही के लिए एक निजी लाइजनर रखने जैसा है।
धनबाद मंडल में इंजीनियरिंग के साथ-साथ इलेक्ट्रिकल विभाग में भी जेई, एसएसई और पदोन्नत विभागीय अधिकारियों का सिंडिकेट सक्रिय है। बताते हैं कि इस ग्रुप द्वारा मेंटेनेंस और मरम्मत के नाम पर निजी एजेंसियों को हर महीने लाखों रुपये के फर्जी बिलों का भुगतान किया जा रहा है, जबकि धरातल पर रेल परिसरों में बिजली के उपकरणों की स्थिति अत्यंत दयनीय है। ग्रीष्म ऋतु के प्रारंभ होते ही मंडल कार्यालय के अधिकांश एसी पूरी तरह खराब (आउट ऑफ ऑर्डर) हो चुके हैं और पंखों की गति इतनी कम है कि वे हवा देने में असमर्थ हैं। ठेकेदारों और सिंडिकेट की इस जुगलबंदी के कारण खुद डीआरएम कार्यालय के चैंबरों में लगे अधिकांश एसी केवल शोपीस बनकर रह गए हैं।
रेलवे और सार्वजनिक हित में यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि रोटेशन नीति को कड़ाई से लागू किया जाए तथा हाल ही में खरीदे गए सभी नए बिजली उपकरणों की गुणवत्ता और मंथली मेंटेनेंस के नाम पर जारी किए जा रहे भुगतानों और अधिकारियों के आवासों पर अवैध रूप से लगाए गए रेलवे स्टाफ की रेलवे विजिलेंस द्वारा उच्च स्तरीय जाँच कराई जाए। इसके साथ ही क्लास-वन अधिकारियों के चैंबरों में लगातार नए एसी इंस्टॉल करने और वहां से रिलीज किए गए पुराने एवं कंडम एसी जूनियर अधिकारियों के चैंबरों में धकेलने की पक्षपातपूर्ण व्यवस्था पर भी तुरंत रोक लगाई जानी चाहिए। क्रमशः…

