निडर नाविक : रेल अधिकारियों को समर्पित:

बहुत गुरूर था ‘छत’ को ‘छत’ होने का!
एक मंजिल और बनी छत—फर्श हो गई!!

इसीलिए कहा गया है कि अपनी पद-प्रतिष्ठा पर बहुत गुमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये आने-जाने वाली चीजें हैं!