सेंट्रल रेलवे: गार्डों का बेल विरोध—मोटा वेतन, लेकिन जनहित और जवाबदेही शून्य! भाग-4
मुंबई लोकल ट्रेनों की सुरक्षा: क्या रेल प्रशासन का गार्डों के समक्ष ‘सरेंडर’ यात्रियों की संरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं है?
मुंबई की उपनगरीय रेल सेवा, जिसे इस महानगर की जीवन रेखा (रक्त धमनियां) माना जाता है, वर्तमान में एक गंभीर प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी संकट से गुजर रही है। हाल ही में मुंबई मंडल प्रशासन और गार्डों के बीच हुई बैठक—जिसमें ‘करेक्शन स्लिप नं. 15’ को आंशिक रूप से लागू करने का निर्णय लिया गया—ने सुरक्षा मानकों को लेकर अनेक प्रश्न खड़े कर दिए हैं। प्रशासन का यह निर्णय न केवल जीएंडएसआर (G&SR) के वैधानिक आदेशों की अनदेखी है, बल्कि आठ मिलियन दैनिक उपनगरीय यात्रियों की सुरक्षा को भी दांव पर लगाता है।
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प्रशासनिक ढुलमुल नीति: एक आत्मसमर्पण?
पता चला है कि सोमवार, 18 मई की बैठक में यह तय हुआ कि फास्ट लोकल के गार्ड मोटरमैन को बेल देंगे, लेकिन स्लो लोकल के लिए इसे तीन महीने के लिए टाल दिया गया। यह निर्णय ‘नॉन-नेगोशिएबल’ सुरक्षा नियमों पर प्रशासन द्वारा किए गए समझौते (सरेंडर) को दर्शाता है। जीएंडएसआर के नियम किसी चर्चा या सौदेबाजी का विषय नहीं होते, वे परिचालन की अनिवार्यता हैं। स्लो कॉरिडोर पर इस नियम को तीन महीने के लिए टालने का तर्क सुरक्षा के लिहाज से निराधार है; क्या तीन महीने बाद दुर्घटना की संभावना समाप्त हो जाएगी? अथवा किसी दुर्घटना को होने में तीन महीने का समय लगेगा?
सुरक्षा मानकों से समझौता: विशेषज्ञों की चिंता
एक सेवानिवृत्त महाप्रबंधक (GM) ने इस स्थिति पर तीखी टिप्पणी करते हुए इसे बड़ी प्रशासनिक विफलता करार दिया है। उनके अनुसार:
- ओवरशूटिंग का मिथक: सुरक्षा संबंधी इस नियम को केवल ‘प्लेटफॉर्म ओवरशूटिंग’ के चश्मे से देखना एक गंभीर प्रशासनिक चूक है, क्योंकि यह मामला हजारों यात्रियों की जान-माल की सुरक्षा का है।
- तकनीकी निर्भरता और जोखिम: यद्यपि लोकल ट्रेनों की हर कैब में आक्जिलरी वार्निंग सिस्टम (AWS) मौजूद है, परंतु उस पर अंधाधुंध निर्भरता खतरनाक हो सकती है। तकनीकी विफलता या गलत एजेम्प्शन की स्थिति में, गार्ड की सतर्कता ही एकमात्र विकल्प है। यदि मोटरमैन को ड्यूटी के दौरान कोई स्वास्थ्य समस्या (हार्ट अटैक, बेहोशी) होती है, तो गार्ड का बेल न देना एक भयावह ट्रेन दुर्घटना को आमंत्रण देने जैसा है।
निरंकुश गार्ड कैडर: जवाबदेही का अभाव
उपनगरीय गार्डों की तमाम गतिविधियों से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि गार्ड कैडर, जो उच्च वेतन (डेढ़-दो लाख रुपये) प्राप्त कर रहा है, अपनी जिम्मेदारी निभाने में आनाकानी कर रहा है। बिना जवाबदेही के काम करना सर्विस रूल्स का सीधा उल्लंघन है। यदि गार्ड सुरक्षा आदेशों का पालन करने में असमर्थ हैं और उन्हें मानने से मना कर रहे हैं, तो उन पर कड़ी अनुशासनिक कार्रवाई करना अनिवार्य है। रेल प्रशासन को यह कड़ा रुख अपनाना होगा कि या तो वे सुरक्षा आदेशों का पूर्णतः पालन सुनिश्चित करें या स्वेच्छा से सेवानिवृत्ति लेकर कार्यमुक्त हो जाएं।
सुधारात्मक कदम: समय की मांग
मुंबई की रेल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित कदम तत्काल प्रभाव से उठाए जाने की आवश्यकता है:
- सीसीटीवी अनिवार्य: लोकल ट्रेनों की—मोटरमैन और गार्ड—दोनों कैब में सीसीटीवी कैमरों की स्थापना अनिवार्य की जानी चाहिए।
- तकनीकी निगरानी: गार्डों के CUG मोबाइल डेटा का विश्लेषण हो, ताकि यह पता चल सके कि ड्यूटी के दौरान वे मोबाइल के उपयोग में तो नहीं उलझे हैं।
- कैडर का पुनर्गठन: गार्डों को मोटरमैन की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए और मुंबई सबर्बन में ‘दो मोटरमैन’ वाली कार्यप्रणाली लागू होनी चाहिए। जो गार्ड इस परिवर्तन को स्वीकार करने के लिए तैयार न हों, उन्हें सेवा से बाहर का रास्ता दिखाया जाना चाहिए।
- अल्कोहल टेस्ट: रनिंग स्टाफ की सुरक्षा और सतर्कता जांचने के लिए ऑन-ड्यूटी मिड-सेक्शन में अल्कोहल टेस्ट की प्रक्रिया अनिवार्य रूप से शुरू की जानी चाहिए।
निष्कर्ष
रेल प्रशासन को यह समझना होगा कि मुंबई की लोकल ट्रेनों का परिचालन किसी भी कर्मचारी संघ की मर्जी और किसी कैडर विशेष की मनमानी पर नहीं छोड़ा जा सकता। इस मामले में दबाव और ब्लैकमेल की राजनीति से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। गार्ड की भूमिका यदि केवल एक ‘अपेंडिक्स’ (अतिरिक्त बोझ) की तरह हो गई है, तो समय आ गया है कि तकनीकी रूप से इसे समाप्त कर नई और सुरक्षित कार्यप्रणाली अपनाई जाए। सुरक्षा के मामले में प्रशासन का ‘सरेंडर’ करना न केवल उसकी कमजोरी को दर्शाता है, बल्कि यह उन अस्सी लाख दैनिक उपनगरीय यात्रियों के विश्वास का अपमान है जो हर रोज अपनी जान रेल प्रशासन के भरोसे छोड़ते हैं।
रेल प्रशासन को यह समझना होगा कि रेलयात्रियों की सुरक्षा किसी भी स्थिति में नॉन-नेगोशिएबल है, और इस पर कोई भी समझौता अक्षम्य होगा।
क्रमशः “सेंट्रल रेलवे: गार्डों का बेल विरोध—मोटा वेतन, जनहित-जवाबदेही शून्य, और अब “ईमेल-बमबारी”! भाग-5”

