विशेष खोजी रिपोर्ट: किसानों के साथ चीटिंग करने पर उतारू रेल प्रशासन—अदालती आदेशों के बाद भी रोजगार के लिए भटकते भूमिपुत्र

रेलवे का एक ऐसा अमानवीय चेहरा और टालमटोल वाला रवैया, जो न्यायपालिका के स्पष्ट आदेशों को भी दरकिनार करने की कोशिश कर रहा है!

भारतीय रेल की विभिन्न बुनियादी ढ़ांचागत परियोजनाओं के लिए अपनी पुश्तैनी जमीनें देने वाले देश के किसान आज न्याय के लिए दर-दर भटक रहे हैं। रेलवे ने इन परियोजनाओं के समय किसानों से वादा किया था कि प्रभावित परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जाएगी। किसानों ने इस भरोसे पर अपनी जीविका का एकमात्र साधन रेलवे को सौंप दिया, लेकिन आज वर्षों बीत जाने के बाद भी उनके बच्चे रोजगार के लिए प्रशासनिक दफ्तरों और अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT), जबलपुर बेंच के विभिन्न फैसलों का विश्लेषण करने पर रेलवे का एक ऐसा अमानवीय चेहरा और टालमटोल वाला रवैया सामने आता है, जो न्यायपालिका के स्पष्ट आदेशों को भी दरकिनार करने की कोशिश कर रहा है।

इस रिपोर्ट से संबंधित भाग-1 भी देखें: “विशेष रिपोर्ट: विकास की पटरी पर उजड़ते सपने—ललितपुर–सिंगरौली रेल परियोजना का कड़वा सच

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CAT के चार ऐतिहासिक फैसले: एक विस्तृत विश्लेषण

केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण ने बार-बार अपने आदेशों में रेलवे की दलीलों को खारिज किया है। इन निर्णयों का क्रमवार और विस्तृत विवरण इस प्रकार है:

  1. अशोक कुमार पटेल और अन्य बनाम भारत संघ (OA No. 200/275/2021): जबलपुर न्यायाधिकरण ने 23 मार्च 2022 को इस मामले में अपना महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। इस याचिका में अशोक कुमार पटेल सहित कुल दस बेरोजगार आवेदक शामिल थे, जिनकी जमीनें ललितपुर-सतना, रीवा-सीधी, सिंगरौली, महोबा-खजुराहो रेल लाइन परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई थीं। रेल प्रशासन ने आवेदकों के रोजगार के दावों को यह कहकर खारिज कर दिया था कि 11 नवंबर 2019 की नई नीति (RBE No. 193/2019) के तहत अब जमीन के बदले रोजगार सहायता नहीं दी जा सकती, बल्कि केवल मुआवजा दिया जाएगा। हालांकि, आवेदकों की भूमि का अंतिम अवॉर्ड 2 अगस्त 2019 को (यानि नई नीति आने से पहले) ही पारित हो चुका था। न्यायाधिकरण ने रेलवे के रुख को पूरी तरह अनुचित ठहराते हुए स्पष्ट किया कि नई नीति को पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता है और इसका प्रभाव केवल उन मामलों पर होगा जहां भूमि अधिग्रहण 11 नवंबर 2019 के बाद हुआ हो। अदालत ने रेलवे के अस्वीकृति पत्रों को रद्द करते हुए प्रशासन को तीन महीने के भीतर नियुक्तियों पर सकारात्मक पुनर्विचार करने का आदेश दिया।
  2. विजय कुमार सिंह पटेल बनाम भारत संघ (OA No. 200/00228/2020): इस मामले में ट्रिब्यूनल ने 19 जनवरी 2024 को फैसला सुनाया। रीवा-सीधी ब्रॉडगेज रेल लाइन परियोजना के लिए आवेदक की खसरा नंबर 248 की भूमि का अधिग्रहण वर्ष 2015 में किया गया था। रेलवे ने पहले आवेदक को एक पुराने आपराधिक मामले का हवाला देकर रोजगार देने से मना किया, जबकि आवेदक उस मामले में 8 अक्टूबर 2015 को ही अदालत से ससम्मान बरी हो चुका था। इसके बाद रेलवे ने 16 दिसंबर 2019 को नया बहाना बनाते हुए दावा किया कि जमीन का एक हिस्सा सिविल कोर्ट और हाई कोर्ट में विचाराधीन मुकदमे के अंतर्गत आता है और 2019 की नई नीति के कारण नियुक्तियां पूरी तरह बंद कर दी गई हैं। आवेदक ने दस्तावेजों के साथ साबित किया कि वह सिविल विवाद खसरा नंबर 158, 164 और 177 के लिए था, न कि उसकी अधिग्रहित खसरा संख्या 248 के लिए। न्यायाधिकरण ने पाया कि भूमि अधिग्रहण 2019 की नीति से बहुत पहले हुआ था, इसलिए पुरानी नीति ही लागू होगी। अदालत ने रेलवे के अवैध आदेश को रद्द कर दो महीने के भीतर आवेदक को रोजगार देने पर पुनर्विचार का निर्देश दिया।
  3. प्रवीण कुमार पांडे और अन्य बनाम भारत संघ (OA No. 200/786/2023 एवं अन्य संबंधित एकीकृत याचिकाएं): न्यायाधिकरण ने 12 अगस्त 2025 को इस सामूहिक याचिका पर एक विस्तृत निर्णय दिया। इस एकीकृत याचिका में प्रविण कुमार पांडे, रीटा सिंह, रामरतन ग्वालवंशी और शशांक वाडिवा सहित पश्चिम मध्य रेलवे और दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के दर्जनों प्रभावित किसान शामिल थे। रेलवे का तर्क था कि ‘भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013’ लागू होने के बाद रेलवे में नौकरी देने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं बचा है और 2019 की नीति के बाद पुरानी रोजगार योजनाएं पूरी तरह वापस ले ली गई हैं। न्यायाधिकरण ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के एक फैसले (WPS No. 5804 of 2022) का हवाला देते हुए इस दलील को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। अदालत ने स्थापित किया कि रेलवे की 16 जुलाई 2010 की रोजगार नीति 11 नवंबर 2019 तक पूरी तरह से लागू और वैध थी। इसलिए, जिन आवेदकों की भूमि इस अवधि के बीच अधिग्रहित हुई थी, वे सभी नौकरी के हकदार हैं। ट्रिब्यूनल ने रेलवे को तीन महीने के भीतर सभी पात्र भूमिहीनों को रोजगार सहायता देने का कड़ा आदेश जारी किया।
  4. रामजी अग्निहोत्री बनाम भारत संघ (OA No. 200/209/2025): न्यायाधिकरण ने 20 मार्च 2026 को इस अत्यंत गंभीर मामले पर अपना फैसला सुनाया। इस मामले में आवेदक के पिता की भूमि ललितपुर-सिंगरौली (खजुराहो) रेल लाइन के लिए अधिग्रहित की गई थी और अंतिम अवॉर्ड 30 अप्रैल 2015 को पारित हुआ था। आवेदक को स्क्रीनिंग और दस्तावेज सत्यापन में पूरी तरह योग्य पाया गया था और रेलवे ने स्वयं उसे 3 मार्च 2021 को मेडिकल परीक्षा के लिए बुलाया था। परंतु, अंतिम समय पर बिना कोई लिखित कारण दिए उसका मेडिकल रोक दिया गया और उसे मौखिक आश्वासन देकर घर भेज दिया गया। रेलवे ने बाद में दलील दी कि 2019 की नई नीति लागू हो चुकी है, जमीन संयुक्त नामों पर होने के कारण अन्य सह-खातेदारों का अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) नहीं है और एक ही खसरे पर परिवार के अन्य सदस्यों ने भी आवेदन किया है। न्यायाधिकरण ने रेलवे की इस मंशा पर कड़ी नाराजगी जताई और स्पष्ट किया कि आवेदक के पिता का अलग से एक-तिहाई (1/3) हिस्सा रिकॉर्ड पर साफ था और रेलवे उम्मीदवार को योग्य मानने के बाद अपने ही कदम से पीछे नहीं हट सकता। अदालत ने रेलवे को सख्त आदेश दिया कि 30 दिनों के भीतर आवेदक का मेडिकल कराया जाए और अनुकूल पाए जाने पर अगले 60 दिनों में उसे नियुक्ति पत्र सौंप दिया जाए।

रेलवे के तीन प्रमुख बहाने और उनका कानूनी सच

प्रशासनिक स्तर पर रेलवे प्रभावित परिवारों के साथ “चूहा-बिल्ली का खेल” खेलने के लिए मुख्य रूप से तीन हथकंडे अपना रहा है, जिन्हें अदालत ने पूरी तरह अवैध ठहराया है:

  • नीति में बदलाव (RBE No. 193/2019) का गलत इस्तेमाल: रेलवे का सबसे बड़ा बहाना यह है कि 11 नवंबर 2019 को जारी नए सर्कुलर के बाद उसने जमीन के बदले नौकरी देना बंद कर दिया है और अब केवल मुआवजा दिया जा रहा है। कानूनी हकीकत यह है कि न्यायाधिकरण ने अपने हर फैसले में यह साफ किया है कि RBE No. 193/2019 के पैरा 5 में खुद लिखा है कि यह नीति इसके जारी होने की तिथि से प्रभावी होगी। अतः जिन किसानों की जमीनें 2019 से पहले अधिग्रहित की जा चुकी हैं, उन पर यह नई नीति थोपी नहीं जा सकती और उन्हें पुरानी नीति के तहत रोजगार मिलना ही चाहिए।
  • दस्तावेजों की कमी और तकनीकी अड़चनें (NOC और सिविल सूट): कई मामलों में रेलवे यह दलील देता है कि जमीन संयुक्त खाते की है, इसलिए अन्य सह-खातेदारों का NOC चाहिए या जमीन को लेकर कोई पुराना सिविल विवाद लंबित है। कानूनी हकीकत यह है कि रामजी अग्निहोत्री के मामले में अदालत ने पाया कि आवेदक के पिता का हिस्सा पहले से ही स्पष्ट था। वहीं विजय कुमार पटेल के मामले में जिस सिविल सूट का बहाना बनाया गया, वह उस खसरे का था ही नहीं, जो रेलवे ने अधिग्रहित किया था। अदालत ने साफ कहा कि जब रेलवे पहले ही स्क्रीनिंग में उम्मीदवारों को योग्य पा चुका है, तो बाद में ऐसे झूठे तकनीकी बहाने नहीं बना सकता।
  • बरी हो चुके मामलों में भी ‘आपराधिक रिकॉर्ड’ का रोड़ा: युवाओं को रोकने के लिए पुलिस वेरिफिकेशन में आने वाले छोटे-मोटे या पुराने मामलों को आधार बनाया जा रहा है। कानूनी हकीकत यह है कि विजय कुमार सिंह पटेल के मामले में अदालत ने माना कि जब उम्मीदवार को अदालत से ससम्मान बरी किया जा चुका है, तो रेलवे उसे दागी मानकर नौकरी से वंचित नहीं कर सकता।

क्या रेलवे खुद को अदालत से ऊपर समझता है?

प्रभावित परिवारों द्वारा साझा किए गए लिखित इनपुट और जमीनी सच्चाई इस प्रशासनिक उदासीनता की गवाही देते हैं।

रेल परियोजनाओं के लिए किसानों की जमीनें यह वादा करके ली गई थीं कि प्रत्येक प्रभावित परिवार के एक सदस्य को रेलवे में रोजगार मिलेगा। किसानों ने इस वादे पर भरोसा किया और अपनी पुश्तैनी जमीनें सौंप दीं, लेकिन आज वर्षों बाद भी अनेक युवा रोजगार के लिए दर-दर भटक रहे हैं।

कई युवाओं की स्क्रीनिंग, दस्तावेज सत्यापन, पुलिस जांच और मेडिकल तक की प्रक्रिया पूरी कर ली गई, लेकिन अंतिम समय पर तकनीकी अड़ंगे लगाकर उन्हें रोक दिया गया। सबसे गंभीर बात यह है कि देश का न्यायाधिकरण (CAT) अपने आदेशों में स्पष्ट कह चुका है कि पुरानी भूमि अधिग्रहण नीति के मामलों में नई नीति लागू नहीं की जा सकती और पात्र लोगों को रोजगार दिया जाना चाहिए।

इसके बावजूद, रेलवे कभी नई नीति का बहाना बनाता है, कभी दस्तावेजों की कमी का, तो कभी अन्य बेतुके कारण बताकर भूमि प्रभावित परिवारों के साथ “चूहा-बिल्ली का खेल” खेलता दिखाई दे रहा है। अगर रेलवे CAT जैसी संवैधानिक अदालतों के आदेशों का भी सम्मान नहीं कर रहा, तो फिर आखिर वह किसकी बात सुनेगा?

जब अदालतें स्पष्ट रूप से कह रही हैं कि भूमि प्रभावित परिवारों का हक बनता है, तब भी वर्षों तक रोजगार न देना कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि रेलवे अब अपने आपको इतना “सुप्रीम” मानने लगा है कि किसानों की पीड़ा, युवाओं का भविष्य और न्यायाधिकरण के आदेश भी उसके सामने महत्वहीन हो गए हैं?

जिस जमीन से इन गरीब परिवारों का घर चलता था, वही जमीन उनके हाथ से चली गई, लेकिन रोजगार आज तक नहीं मिला। इससे किसानों और युवाओं में गहरा आक्रोश और घोर निराशा व्याप्त है। उनका मानना है कि रेलवे अर्थात सरकार उनके साथ अन्याय और चीटिंग कर रही है।

निष्कर्ष और मांग

#RailSamachar की यह खोजी रिपोर्ट सीधे तौर पर केंद्र सरकार और रेल प्रशासन से यह पुरजोर आग्रह करती है कि न्यायाधिकरणों और उच्च न्यायालयों के आदेशों का अविलंब सम्मान किया जाए। सभी लंबित मामलों में, जहां भूमि अधिग्रहण 2019 की नीति से पूर्व का है, उन सभी पात्र भूमि प्रभावित परिवारों को शीघ्र अति शीघ्र रोजगार प्रदान कर उन्हें न्याय दिया जाए, ताकि देश के अन्नदाताओं और युवाओं का कानून व्यवस्था और सरकार पर भरोसा कायम रह सके।