पश्चिम मध्य रेलवे में बड़ा टेंडर विवाद—सीमित की गई प्रतिस्पर्धा!

16 प्रतिभागी, लेकिन केवल 2 की फाइनेंशियल बिड खोली गई!

वेंडर्स ने लगाए प्रतिस्पर्धा सीमित करने के आरोप—जांच की मांग!

पश्चिम मध्य रेलवे (#WCR), कोटा मंडल में एक बड़े रेलवे टेंडर को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार लगभग ₹130.69 करोड़ लागत के चार रोड ओवर ब्रिज (#ROB) के निर्माण कार्य के लिए जारी टेंडर में कुल 16 फर्मों ने भाग लिया था, लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि फाइनेंशियल बिड केवल दो फर्मों की ही खोली गई, बाकी 14 प्रतिभागियों को प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिया गया। इस घटनाक्रम ने रेलवे टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता, निष्पक्षता और प्रतिस्पर्धा पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।

मिली जानकारी के अनुसार, नागदा-मथुरा जंक्शन (NAD–MTJ) सेक्शन में चार ROB निर्माण के इस टेंडर में कुल 16 निविदाएँ आई थीं, अर्थात् कुल 16 फर्मों ने बिडिंग की थी, लेकिन टेक्नो-कमर्शियल जांच के बाद केवल दो फर्मों को ही आगे बढ़ाया गया और उन्हीं की फाइनेंशियल बिड खोली गई। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि जब इतने बड़े सार्वजनिक कार्य में 16 इच्छुक प्रतिभागी मौजूद थे, तो आखिर 14 बिडर/फर्मों को किस आधार पर बाहर कर दिया गया? क्या यह वास्तव में वैध तकनीकी कारण थे, या फिर बेहद मामूली और कमजोर आधारों पर प्रतिस्पर्धा को सीमित कर दिया गया?

Tech-Commercial Tabulation

भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार, WCR में कई मामलों में बिड्स को कमजोर, तकनीकी और अत्यधिक कठोर व्याख्या के आधार पर नहीं खोला जा रहा है। आरोप है कि जहां व्यापक प्रतिस्पर्धा और सार्वजनिक हित को प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी, वहां विवेकहीन और एकतरफा दृष्टिकोण अपनाया गया। बताया जा रहा है कि कुछ फॉर्मेट्स, दस्तावेजी आवश्यकताएं और अनुपालन की व्याख्याएँ इस प्रकार लागू की गईं, जो न केवल रेलवे बोर्ड की सामान्य गाइडलाइंस से अलग प्रतीत होती हैं, बल्कि अन्य जोनल रेलों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया से भी काफी भिन्न हैं।

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Tabulation Statement of Financial Bids

प्रस्तुत मामले में सबसे गंभीर आरोप यह है कि WCR के कुछ टेंडर्स में ऐसे फॉर्मेट और अनुपालन मानक अपनाए गए, जो रेलवे बोर्ड की भावना तथा अन्य जोनों की प्रचलित व्यवस्था से मेल नहीं खाते। यदि एकीकृत भारतीय रेल व्यवस्था के भीतर हर जोन अलग-अलग मानक लागू करने लगे, तो फिर निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा, समान अवसर और सार्वजनिक खरीद की विश्वसनीयता पर सीधा असर पड़ता है। यह भी आरोप है कि टेंडर कमेटी के कुछ सदस्यों ने एकतरफा प्रतिकूल निर्णय लेकर प्रतिस्पर्धा को सीमित किया, जिसका सीधा असर इस टेंडर के परिणाम पर पड़ा, और पर्याप्त प्रतिस्पर्धा के अभाव में अधिक रेट पर टेंडर जारी किए जाने से पब्लिक रेवेन्यू का अपव्यय हो रहा है।

जानकारों का कहना है कि GCC के टेंडर क्लॉज के अनुसार, “यदि किसी दस्तावेज, फॉर्मेट या पात्रता से संबंधित कोई अस्पष्टता हो, तो टेंडर कमेटी—टेंडरिंग अथॉरिटी अथवा रेलवे बोर्ड से—आवश्यक स्पष्टीकरण मांग सकती है, अतिरिक्त दस्तावेज मंगवा सकती है, और उचित प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए उपलब्ध रिकॉर्ड का संज्ञान भी ले सकती है।” ऐसे में अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि जब टेंडर कमेटी के पास स्पष्टीकरण मांगने का अधिकार था, तो उसका उपयोग क्यों नहीं किया गया? यदि स्पष्टीकरण, पूरक दस्तावेज या रिकॉर्ड के आधार पर बिड्स को निष्पक्ष रूप से विचार किया जा सकता था, तो फिर सीधे बिड न खोलना, क्या यह सार्वजनिक हित के विरुद्ध कदम नहीं है?

विशेषज्ञों का मानना है कि जब 16 प्रतिभागियों में से केवल दो को ही अंतिम प्रतिस्पर्धा में रखा गया है, तो इसका सीधा असर रेट्स, पारदर्शिता और सरकारी खर्च पर पड़ सकता है। कम प्रतिस्पर्धा का अर्थ है कि उचित मूल्य खोज (price discovery) प्रभावित होती है, सरकारी संस्थान को कम विकल्प मिलते हैं, और अंततः पब्लिक एक्सचेकर पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका बढ़ जाती है। रेलवे के टेंडर सार्वजनिक धन से संचालित होते हैं, इसलिए हर स्तर पर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा योग्य प्रतिभागियों को निष्पक्ष अवसर मिले।

अब इस पूरे मामले में मांग उठ रही है कि #CVC, #CBI, रेलवे बोर्ड और रेलवे बोर्ड विजिलेंस इस पूरे प्रकरण की गहन जांच करें। जांच में यह देखा जाना चाहिए कि 16 में से केवल दो बिड ही क्यों खोली गईं, क्या बाकी बिड्स को वास्तविक वैध आधारों पर रोका गया? या मामूली कारणों से अथवा किसी को फेवर करने के लिए बाहर किया गया? क्या WCR ने रेलवे बोर्ड से अलग या असामान्य फॉर्मेट / व्याख्या अपनाई? और क्या टेंडर कमेटी ने स्पष्टीकरण मांगने की अपनी शक्ति का उपयोग जानबूझकर नहीं किया?

जानकारों का कहना है कि यह मामला अब केवल एक टेंडर तक सीमित नहीं रह गया है, क्योंकि सभी जोनों और उत्पादन इकाईयों में सीमित प्रतिस्पर्धा अथवा किसी फर्म विशेष को फेवर करने की मंशा से टेंडर प्रक्रिया का दुरुपयोग किया जा रहा है। यह प्रश्न अब पूरे सिस्टम पर खड़ा हो गया है कि क्या रेलवे में टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धी है? जब 16 फर्में प्रतिस्पर्धा में थीं, लेकिन अंत में केवल दो को ही फाइनेंशियल बिड तक पहुंचने दिया गया, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह वास्तव में खुली प्रतिस्पर्धा थी? या प्रतिस्पर्धा को पहले ही चरण में सीमित कर दिया गया?

जानकारों का मानना है कि जनहित में यह आवश्यक है कि पूरे टेंडर की स्वतंत्र जांच हो, सभी रिजेक्शन / नॉन-ओपनिंग के कारण स्पष्ट रूप से सार्वजनिक किए जाएं, रेलवे बोर्ड समान और स्पष्ट गाइडलाइंस जारी करे, और भविष्य में तकनीकी आधार पर मनमानी रोकने की व्यवस्था बनाई जाए। रेलवे के टेंडर्स में पारदर्शिता और निष्पक्षता केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और सार्वजनिक धन की सुरक्षा का प्रश्न भी है।