दारू की बहार, पुरस्कारों की बौछार

दारू की अनलिमिटेड और अनइंटररप्टेड सप्लाई—वो भी बिहार जैसे सूखे राज्य (dry state) में जहाँ शराब का सेवन पूर्णतः प्रतिबंधित है—एक अलग किस्म की रईसी और स्टेटस सिंबल बन गया है। आज के बिहार में अगर आपके पास दारू की निर्बाध सप्लाई का जुगाड़ है, तो आप एक अलग सुकून महसूस कर सकते हैं और इसकी एवज में आप उस सप्लायर के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं। और अगर वो सप्लायर अपनी जाति-बिरादरी का हो तब तो फिर कहना ही क्या, क्योंकि तब आप उसके लिए कोई भी नियम-कानून ताक पर रखने को तत्पर रहते हैं।

पूर्व मध्य रेलवे के एक विभाग प्रमुख बिना दारू के एक पल भी नहीं रह सकते। खबर है कि इन पियक्कड़ विभाग प्रमुख महाशय के लिए उनके एक ब्रांच ऑफिसर, जो कि झारखंड राज्य के एक मंडल में तैनात हैं, ने दारू की अबाधित सप्लाई सुनिश्चित कर रखी है। इस अबाधित सप्लाई के बदले उक्त विभाग प्रमुख ने उस ब्रांच ऑफिसर के सारे काले कारनामों पर पर्दा डाल रखा है और उसके विरुद्ध एक भी शब्द नहीं सुन सकते हैं।

सोने पर सुहागा यह कि वह ब्रांच ऑफिसर विभाग प्रमुख साहब की जाति-बिरादरी से भी संबंध रखता है, अतः ये रिश्ता और पक्का हो गया। 180 किमी प्रति घंटे की गति के नाम पर उक्त सेक्शनल इंजीनियर ने कई गुल खिलाए हैं, लेकिन विभाग प्रमुख साहब के वरदहस्त ने सब कुछ ढ़ंक दिया है।

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उत्तर प्रदेश वाले डिवीज़न में भी 180 किमी प्रति घंटे की गति से जीएम स्पेशल दौड़ी, लेकिन उस सेक्शनल इंजीनियर को उतनी वाहवाही नहीं मिली, जितनी विभाग प्रमुख के स्वजातीय सेक्शनल इंजीनियर को मिली। रेल सेवा विशिष्ट पुरस्कार दिलाने के बाद विभाग प्रमुख महाशय ने अब अपने रिटायरमेंट के पहले उक्त अधिकारी को अति विशिष्ट रेल सेवा पुरस्कार दिलाने के लिए कमर कस लिया है।

वर्ष 2025 के अति विशिष्ट रेल सेवा पुरस्कार के इंडिविजुअल अवॉर्ड्स के जोनल रेलवे से नॉमिनेशन मांगे गए हैं। पुरस्कार की गरिमा उसको पाने वाले अधिकारियों की योग्यता और सत्यनिष्ठा से तय होती है, अगर पुरस्कार, योग्यता के बजाय एक बोतल दारू या फिर जाति-बिरादरी के नाम पर दिया जाने लगेगा, तो उसकी गरिमा का हनन तो होगा ही, बल्कि व्यवस्था में लोगों का विश्वास और भी कम होगा। पुरस्कारों में नॉमिनेशन पूर्णतः ऑब्जेक्टिव और भेदभाव से परे होने चाहिए।

अधिकारी के ट्रांसफर का यूनियन द्वारा विरोध

ईसीआर के लेखा विभाग में हुए ऐतिहासिक ट्रांसफर/पोस्टिंग में यूनियन की एंट्री हो गई है। इसका अर्थ यह लगाया जा रहा है कि ईसीआर के लेखा विभाग के भ्रष्टाचार की कमाई का फायदा यूनियन को भी पहुंच रहा होगा। लोकल लेवल पर हुए इस तबादले से रेलवे बोर्ड के स्तर पर यूनियन का क्या सरोकार हो सकता है, बल्कि यूनियन को दूसरे विभागों में इस तरह के ट्रांसफर की वकालत करनी चाहिए, लेकिन भ्रष्टाचार की काली कमाई में सहभागी यूनियन एक ऐतहासिक और ईमानदार प्रयास को डिरेल करने का प्रयास कर रही है। यह शर्मनाक है।

सीबीआई की FIR में स्पष्ट रूप से लेखा विभाग में पैसा लेने की बात कही गई है, फिर भी यूनियन द्वारा इस तबादले पर की गई टिप्पणी यूनियन के भ्रष्टाचार में शामिल होने का प्रमाण माना जा रहा है। विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि ठेकेदारों की एक लॉबी अपने चहेते बाबुओं को वापस लाना चाहती है और इसमें कुछ वरिष्ठ अधिकारी प्रत्यक्ष रूप से उनका सहयोग कर रहे हैं। सप्लाई चेन टूटने से पुराने पापियों की बौखलाहट साफ़ तौर पर दिख रही है। जाति और पैसे के बलबूते नौकरी करने वाले दूसरों को ज्ञान दे रहे हैं। #Railwhispers हर विभाग में हर स्तर पर रोटेशनल ट्रांसफर का पुरजोर हिमायती है और प्रत्येक जीएम एवं मंत्री स्तर पर इसका कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करने का आग्रह करता है।

जोड़तोड़बाज अधिकारी का जेएस एम्पैनलमेंट

रेलवे में ट्रांसफर, पोस्टिंग रुकवाना, पोस्टिंग चेंज करवाना और अपनी मनचाही जगह मनचाही पोस्टिंग लेना—यह एक बहुत बड़ा खेल है, और इस खेल में भ्रष्टाचार तथा चारित्रिक पतन की बहुत बड़ी भूमिका है। जिसको जो मन होता है वो वैसा करता है, नियम-निर्देशों का कोई अर्थ नहीं है। रेलवे बोर्ड के आदेश को जीएम और विभाग प्रमुख रोक देते हैं, घुमा देते हैं, डिले करते हैं, ताक पर रख देते हैं। अब यह “सेवा की मेवा” डीआरएम स्तर पर भी बाँटी जाने लगी है।

ताजा मामला पूर्व मध्य रेलवे के धनबाद मंडल का है। रेलवे बोर्ड ने लगभग दो महीने पहले धनबाद मंडल के एडीआरएम का ट्रांसफर दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे (#SECR) में किया था। लोकल सेटिंग—साफ़ शब्दों में कहें तो विभाग प्रमुख के साथ “कास्ट एक्वेशन” मजबूत होने के कारण जोनल हेडक्वार्टर से ऑर्डर निकलने में एक महीना लग जाता है। इसी बीच डीआरएम द्वारा जेएस एम्पैनलमेंट करा दिया जाता है।

जेएस एम्पैनलमेंट के लिए काफ़ी ड्यू-डिलिजेंस किया जाता है, लेकिन इस तरह से जोड़तोड़ करने वाले अधिकारी का जेएस एम्पैनल होना पूरी प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। कहा जा रहा है कि एडीआरएम के जेएस एम्पैनलमेंट के लिए डीआरएम ने अपने पूर्व अनुभव का भरपूर उपयोग किया, क्योंकि एडीआरएम महाशय के सौजन्य से डीआरएम साहब की पूरी व्यवस्था सुचारू रूप से चल रही है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लोकल ऑर्डर भी निकले हुए बीस दिन से अधिक हो गए, लेकिन जीएम के आदेश को भी ठेंगा दिखा दिया गया।

जानकारों का मानना है कि #DoPT को जेएस एम्पैनलमेंट के तौर-तरीकों को बदलना होगा, वरना इस तरह की जोड़तोड़ करने वाले अधिकारियों का जेएस एम्पैनलमेंट होता रहेगा। लोकल ऑर्डर के बीसों दिन बाद भी एडीआरएम की रिलीविंग नहीं होना, न केवल चिंता का विषय है, बल्कि ये घोर भ्रष्टाचार और मनमानी की ओर भी इशारा है। सीआरबी और रेलमंत्री को इसका तुरंत संज्ञान लेना चाहिए।