विशेष रिपोर्ट: विकास की पटरी पर उजड़ते सपने—ललितपुर–सिंगरौली रेल परियोजना का कड़वा सच

जिस नीति के तहत 1581 लोगों को रोजगार दिया गया, तो उसी समान नीति के तहत बाकी पात्र लोगों को इससे वंचित क्यों रखा गया?

क्या 2019 की नई भूमि अधिग्रहण नीति को उन अधिग्रहणों पर लागू करना न्यायोचित है, जो 2019 से बहुत पहले पूरे हो चुके थे?

रेलवे द्वारा स्क्रीनिंग और नियुक्ति प्रक्रियाओं में हुई अत्यधिक देरी के लिए कौन जिम्मेदार है?

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मोदी जी, विकास तब तक अधूरा है जब तक उसका आधार ‘अन्याय’ पर आधारित हो!

ललितपुर–सिंगरौली रेल लाइन परियोजना से प्रभावित किसानों की व्यथा और आधिकारिक आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित यह एक विस्तृत खोजी रिपोर्ट है। इस रिपोर्ट में किसानों द्वारा ईमेल पर साझा किए गए मूल इनपुट को प्राथमिकता देते हुए रेलवे के वर्तमान नीतिगत संदर्भों को जोड़ा गया है।

करीब 541 किलोमीटर लंबी ललितपुर-सिंगरौली (बरास्ता महोबा, खजुराहो, सतना, रीवा और सीधी) रेल परियोजना बुंदेलखंड और बघेलखंड के विकास के लिए महत्वपूर्ण मानी गई थी। लेकिन आज यही परियोजना विकास से अधिक उन हजारों किसान परिवारों के साथ “विश्वासघात” का प्रतीक बन गई है, जिन्होंने सरकार को अपनी पैतृक और उपजाऊ जमीन देश के बुनियादी ढ़ांचे के विकास के लिए समर्पित कर दी थी।

पीड़ितों की व्यथा:

भारी मन और टूटी हुई उम्मीदों के साथ ललितपुर–सिंगरौली रेल लाइन परियोजना में भूमि अधिग्रहण के बाद रोजगार में भेदभाव, वादाखिलाफी से प्रभावित सैकड़ों परिवारों ने अपनी पीड़ा सार्वजनिक करने और सरकार के संज्ञान में लाने के लिए ईमेल पर #RailSamachar से गुहार लगाई है। उन्होंने लिखा है कि “विकास के नाम पर हमारी जमीन ली गई, हमारे खेत छिन गए, और हमारे जीवन का आधार खत्म हो गया। उस समय हमें भरोसा दिलाया गया था कि हमारा बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा—हमें रोजगार मिलेगा, सम्मान मिलेगा, हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा, और हमारे इस योगदान से देश का विकास होगा।”

लेकिन आज वास्तविकता यह है कि हजारों परिवार बेरोजगारी, गरीबी और निराशा के अंधेरे में जीने को मजबूर हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार केवल 1581 लोगों को ही रोजगार दिया गया, जबकि 12–13 हजार से अधिक परिवार इस परियोजना से प्रभावित हुए हैं। बाकी लोगों के साथ क्या हुआ? क्या उनकी पीड़ा कोई मायने नहीं रखती?

उन्होंने कहा कि हमने वर्षों तक संघर्ष किया—शांतिपूर्ण आंदोलन किए, सड़कों पर उतरे, लाठियां खाईं, अपमान सहा, और हर दरवाजे पर न्याय की गुहार लगाई। लेकिन बदले में हमें केवल आश्वासन, चुप्पी और अनदेखी मिली। जब भी हम अपने अधिकारों की बात करते हैं, हमें ही गलत ठहराया जाता है, हमारी आवाज को दबाने की पूरी कोशिश की जाती है। आज हर पीड़ित परिवार के मन में एक ही सवाल गूंज रहा है— हमारी जमीन आखिर किस कानून के तहत ली गई? और उस कानून में हमारे अधिकार कहां हैं?

उन्होंने कहा कि यदि कानून में पुनर्वास, मुआवजा और रोजगार का प्रावधान है, तो उसका पालन क्यों नहीं हुआ? यदि वादे किए गए थे, तो उन्हें निभाया क्यों नहीं गया? उनका कहना है कि “यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं है, यह हमारे विश्वास का टूटना है, हमारे साथ विश्वासघात है, यह हमारा अपमान है। यह स्थिति हमारे संविधान के समानता और जीवन के अधिकार के सिद्धांतों के भी विपरीत है, और देश के विकास के प्रति हमारी भावना को भी ठेस पहुंचाती है तथा हमारे योगदान को नकारती है।”

रेलवे रिकॉर्ड्स और तथ्यों का अन्वेषण

इस परियोजना की वर्तमान स्थिति और रोजगार के आंकड़ों को जब रेलवे के दस्तावेजों (RTI और संसद में दिए गए उत्तरों) के आईने में देखते हैं, तो स्थिति अत्यंत गंभीर नजर आती है:

1. भूमि अधिग्रहण: कब और कितनी?

  • प्रारंभ: इस रेल परियोजना को 1997-98 में मंजूरी मिली थी। भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया 2000 के दशक की शुरुआत में विभिन्न चरणों में शुरू हुई।
  • क्षेत्रफल: रेलवे रिकॉर्ड्स के अनुसार, उत्तर प्रदेश (ललितपुर, महोबा) और मध्य प्रदेश (छतरपुर, पन्ना, सतना, रीवा, सीधी, सिंगरौली) में हजारों हेक्टेयर निजी भूमि अधिग्रहित की गई। अकेले मध्य प्रदेश के हिस्से में अधिग्रहण का एक बड़ा हिस्सा 2010 से 2018 के बीच पूरा किया गया।

2. प्रभावित परिवार बनाम रोजगार: आंकड़ों का गणित

  • प्रभावित परिवार: रेलवे के आधिकारिक डेटा और जिला प्रशासन की सूची के अनुसार, अधिग्रहित भूमि के मालिकों (Land Losers) की संख्या वास्तव में 12,000 से अधिक है।
  • रोजगार की स्थिति: किसानों द्वारा दिया गया 1,581 का आंकड़ा उन लोगों का है, जिन्हें रेलवे बोर्ड की पुरानी नीति के तहत ग्रुप-डी (अब लेवल-1) में नियुक्तियां दी गई थीं। यह आंकड़ा रेलवे द्वारा विभिन्न मंचों पर स्वीकार किया गया है।
  • सत्यता की जांच: यह आंकड़ा सही है, लेकिन यह केवल “एक छोटे हिस्से” को दर्शाता है। शेष लगभग 10,000 से अधिक परिवार रोजगार की पात्रता रखने के बावजूद वादाखिलाफी के तहत नीतिगत बदलावों के कारण रोजगार से वंचित रह गए।

3. नीतिगत ‘बदलाव’ और ‘वादाखिलाफी’

रेलवे ने रोजगार देने की अपनी नीति में समय-समय पर बड़े बदलाव किए, जो कि वास्तव में विवाद की मुख्य जड़ हैं:

  • RBE No. 99/2010: इस आदेश के तहत भूमि अधिग्रहण के बदले परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का प्रावधान था।
  • RBE No. 193/2019: 11 नवंबर 2019 को रेलवे बोर्ड ने एक विवादास्पद फैसला लिया, जिसके तहत भविष्य में भूमि अधिग्रहण के बदले ‘रोजगार’ देने के प्रावधान को समाप्त कर दिया गया और इसे केवल ‘नकद मुआवजे’ तक सीमित कर दिया गया।

समस्या यहाँ पैदा हुई: जिन किसानों की जमीन 2010 से 2019 के बीच ली गई थी, उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें नौकरी मिलेगी। लेकिन प्रक्रिया में देरी (Delay in Screening) और बाद में 2019 के विवादास्पद आदेश ने उनके सपनों पर पानी फेर दिया। रेलवे का निराधार तर्क है कि अब केवल नकद मुआवजा ही दिया जाएगा, जबकि किसानों का दावा है कि अधिग्रहण के समय उनसे रोजगार का लिखित/मौखिक वादा किया गया था। स्पष्ट है कि रेलवे ने 2019 के पहले के अधिग्रहणों पर 2019 की नीति लागू करके किसानों के साथ धोखाधड़ी की है।

निष्कर्ष और जवाबदेही की मांग

ललितपुर–सिंगरौली रेल परियोजना केवल रेल की पटरियां बिछाने और देश के ढ़ांचागत विकास का ही कार्य नहीं है, बल्कि यह उन हजारों किसानों के जीवन के साथ जुड़ा मामला है, जिन्होंने अपनी ‘आजीविका’ (जमीन) को ‘राष्ट्रहित’ के लिए दे दिया।

प्रमुख बिंदु जो जांच के घेरे में हैं:
  1. जिस नीति के तहत 1581 लोगों को रोजगार दिया गया, तो उसी समान नीति के तहत बाकी पात्र लोगों को इससे वंचित क्यों रखा गया?
  2. क्या 2019 की नई भूमि अधिग्रहण नीति को उन अधिग्रहणों पर लागू करना न्यायोचित है, जो 2019 से बहुत पहले पूरे हो चुके थे?
  3. रेलवे द्वारा स्क्रीनिंग और नियुक्ति प्रक्रियाओं में हुई अत्यधिक देरी के लिए कौन जिम्मेदार है?

यह रिपोर्ट सरकार, शासन-प्रशासन और रेल मंत्रालय से मांग करती है कि #RailSamachar द्वारा उठाए गए इन संवेदनशील मुद्दों पर एक उच्च-स्तरीय समिति गठित कर जहां-जहां रेलवे द्वारा भूमि अधिग्रहण किया गया है उन सभी जगहों के प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। सरकार को समझना चाहिए कि विकास तब तक अधूरा है जब तक उसका आधार ‘अन्याय’ पर आधारित हो!