वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट में कंसल्टेंट नियुक्ति पर प्रश्नचिह्न: थर्ड पार्टी निगरानी या ‘हफ्ता’ तंत्र का नया स्वरूप?
भारतीय रेल, NHAI, CPWD, और विभिन्न राज्य निर्माण विभागों में चल रहे वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट अब एक नए विवाद के केंद्र में आ गए हैं। ठेकेदारों का एक बड़ा वर्ग खुलकर यह प्रश्न उठा रहा है कि टेंडर आवंटन के बाद विभागों द्वारा अनुबंध आधार पर नियुक्त किए जा रहे कंसल्टेंट और सुपरविजन स्टाफ की वास्तविक भूमिका क्या है—क्या ये वास्तव में गुणवत्ता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए तीसरा पक्ष (थर्ड पार्टी) निगरानी एजेंसियां हैं, या फिर ये व्यवस्था कहीं “अनौपचारिक वसूली तंत्र” का नया माध्यम बनती जा रही है? इसके अलावा, बीच में थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन को बदलकर डिपार्टमेंटल इंस्पेक्शन कर दिया जाता है, जो कि फेवर और करप्शन का सबसे बड़ा कारण है!
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ठेकेदारों का आरोप है कि इन कंसल्टेंट्स की नियुक्ति अक्सर बिना स्पष्ट दिशानिर्देश, बिना जवाबदेही और बिना पारदर्शी प्रक्रिया को अपनाए ही की जाती है। ऐसे में उनके अधिकारों, निर्णय लेने की शक्ति और कार्यक्षेत्र को लेकर भारी अस्पष्टता बनी रहती है। कई मामलों में यह भी सामने आया है कि साइट पर कार्य कर रहे ठेकेदारों को इन कंसल्टेंट्स के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य किया जाता है, जबकि उनके अधिकारों की वैधानिक स्थिति स्पष्ट नहीं होती। इससे कार्य की प्रगति प्रभावित होती है और अनावश्यक प्रशासनिक दबाव पैदा होता है।
सबसे गंभीर चिंता का विषय यह है कि ठेकेदारों के बीच यह धारणा तेजी से मजबूत हो रही है कि इन नियुक्तियों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से वित्तीय दबाव बनाया जाता है। “थर्ड पार्टी मॉनिटरिंग” के नाम पर यदि ठेकेदारों से किसी प्रकार के अनौपचारिक भुगतान या सुविधा शुल्क की अपेक्षा की जाती है, तो यह न केवल व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि सरकारी परियोजनाओं की पारदर्शिता और निष्पक्षता को भी गहरा आघात पहुंचाता है। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है, फिर भी यह मुद्दा गंभीर जांच और स्पष्टीकरण की मांग करता है।
ठेकेदारों ने स्पष्ट रूप से मांग की है कि विभाग यह बताए कि इन कंसल्टेंट्स और सुपरविजन स्टाफ की नियुक्ति किस प्रक्रिया के तहत की जाती है, उनके अधिकारों की सीमा क्या है, और वे किसके प्रति जवाबदेह हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि क्या ठेकेदारों को इन एजेंसियों या व्यक्तियों को किसी प्रकार का शुल्क, सेवा शुल्क या अन्य भुगतान करना अनिवार्य है। यदि ऐसा है, तो उसका कानूनी आधार और भुगतान की आधिकारिक व्यवस्था सार्वजनिक की जानी चाहिए।
इसके अतिरिक्त, ठेकेदारों का यह भी कहना है कि इन कंसल्टेंट्स और सुपरविजन स्टाफ का पूरा विवरण—जैसे उनकी योग्यता, अनुभव, पिछला रिकॉर्ड और बाजार में साख—सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इससे न केवल उनकी विश्वसनीयता का स्वतंत्र मूल्यांकन संभव होगा, बल्कि संभावित हितों के टकराव (conflict of interest) को भी रोका जा सकेगा।
यह मुद्दा केवल ठेकेदारों और विभागों के बीच का प्रशासनिक विवाद नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक धन से चल रही परियोजनाओं की पारदर्शिता, जवाबदेही और गुणवत्ता से जुड़ा हुआ है। यदि इस व्यवस्था में स्पष्टता और संतुलन नहीं लाया गया, तो इससे न केवल परियोजनाओं की लागत और समयसीमा प्रभावित होगी, बल्कि सरकारी तंत्र की साख पर भी गंभीर प्रश्न खड़े होंगे।
समय की मांग है कि संबंधित विभाग इस विषय पर स्पष्ट नीति, पारदर्शी प्रक्रिया और जवाबदेही की ठोस व्यवस्था लागू करें, ताकि “थर्ड पार्टी निगरानी” वास्तव में गुणवत्ता सुधार का माध्यम बने—न कि संदेह और विवाद का कारण!

