दिल्ली मंडल के डीयूके रेलखंड पर ट्रैक मेंटेनेंस कार्यों में अनियमितता, निविदाओं की विफलता और यात्री सुरक्षा की गोपनीय रिपोर्ट

Northern Railway HQs

एक जागरूक नागरिक और व्हिसलब्लोअर के माध्यम से दिल्ली मंडल, उत्तर रेलवे के अंतर्गत आने वाले अत्यंत महत्वपूर्ण डीयूके (कैथल-कुरुक्षेत्र) रेलखंड की गंभीर प्रशासनिक और तकनीकी कमियों को उजागर किया गया है। वर्तमान में इस रेलखंड पर यात्री सुरक्षा दांव पर है और किसी भी समय बड़ी अनहोनी की आशंका बनी हुई है। दिल्ली की मीडिया में भी इस पर कई खबरें प्रकाशित हुई हैं। प्रस्तुत है व्हिसलब्लोअर इनपुट के आधार पर एक परिमार्जित और विस्तृत रिपोर्ट:

दिल्ली मंडल के इस संवेदनशील रेलखंड पर संबंधित विंग के शीर्ष क्षेत्रीय अधिकारी (सेक्शनल सीनियर डीईएन) की तैनाती के बाद से ही नियमित ट्रैक मेंटेनेंस का काम पूरी तरह से ठप पड़ा है। रेल पटरियों की स्थिति अत्यंत जर्जर हो चुकी है और ट्रेन संचालन के समय पटरियों में असामान्य कंपन देखा जा रहा है। संरक्षा और सुरक्षा की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण होने के बावजूद, नए टेंडर जारी कर काम को गति देने के बजाय व्यवस्था को पूरी तरह निष्क्रिय कर दिया गया है।

प्रशासनिक विंग द्वारा नए टेंडर सुचारू रूप से चलाने के बजाय, कई वर्षों पूर्व पूरे हो चुके कार्यों की मनमाने ढ़ंग से रिकवरी निकालकर कार्यरत ठेकेदारों को भारी-भरकम वित्तीय नोटिस जारी किए जा रहे हैं। इसके साथ ही, नियमानुसार होने वाले ठेकेदारों के भुगतानों और बिलों को महीनों तक जानबूझकर अटकाया जा रहा है।

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अधिकारियों के इस अड़ियल और असहयोगात्मक रवैये, और समय न देने तथा दुर्व्यवहार के कारण इस क्षेत्र में बीते 20-20 वर्षों से काम कर रहे अनुभवी स्थानीय ठेकेदारों ने दिल्ली मंडल की निविदाओं से पूरी तरह दूरी बना ली है। वर्तमान में स्थिति यह है कि पिछले कई टेंडर पूरी तरह फेल हो चुके हैं। जो गिने-चुने बाहरी ठेकेदार अज्ञानतावश काम ले भी रहे हैं, उन्हें भी अकुशल श्रम नियोजन और बार-बार कार्यों के वर्गीकरण में बदलाव कर परेशान किया जा रहा है।

व्हिसलब्लोअर ने संबंधित विभाग के शीर्ष सेक्शनल अधिकारी पर वित्तीय अनियमितताओं और गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। निविदा आबंटन में नियमों को ताक पर रखकर न्यूनतम बोलीदाता (L-1) के बजाय अनुचित लाभ लेकर चहेतों (L-2) को फेवर करने की बात सामने आई है। आरोप है कि सेक्शनल अधिकारी ने फील्ड में अवैध वसूली और ठेकेदारों को प्रताड़ित करने के लिए अपने कुछ निजी करीबियों और चुनिंदा अधीनस्थों को तैनात कर रखा है, जो बिल पास करने के नाम पर बिचौलियों की भूमिका निभा रहे हैं। देय वित्तीय लाभ न मिलने पर कार्यों को पूरी तरह ठप कर दिया जाता है।

पूर्व में रेलमंत्री द्वारा इस रेलखंड के निरीक्षण के दौरान जब ट्रेन को गंभीर झटका लगा था, और ट्रायल के लिए ट्रे-टेबल पर रखी गई पानी की बोतल नीचे गिर गई थी, तब वास्तविक रूप से जिम्मेदार ग्राउंड और मंडल स्तर के अधिकारियों पर कार्रवाई करने के बजाय उच्च स्तर के तकनीकी अधिकारियों (पीसीई) को बलि का बकरा बनाकर हटा दिया गया था।

विभागीय अधिकारी अपनी राजनीतिक और न्यायिक पहुंच का बेजा इस्तेमाल कर स्वयं को बचाए हुए हैं। ये अधिकारी मंडल रेल प्रबंधक (#DRM) और अपर मंडल रेल प्रबंधक (#ADRM) जैसे वरिष्ठ मंडल नेतृत्व को भी गलत तकनीकी इनपुट और भ्रामक जानकारी देकर गुमराह कर रहे हैं, जिससे ठेकेदारों की वास्तविक शिकायतों को दबा दिया जाता है।

ग्राउंड जीरो से यह फीडबैक मिला है कि संबंधित विंग के अधिकारियों ने अपने मातहत सहायक अधिकारियों को सख्त हिदायत दे रखी है कि स्वीकृत टेंडर की सीमा से एक इंच भी अतिरिक्त या सुधारात्मक काम न होने दिया जाए। ट्रैक भले ही कितना भी खराब क्यों न हो, उसे उसी हाल पर छोड़ने के निर्देश दिए गए हैं। अधिकारियों का पूरा ध्यान जन सुरक्षा और ट्रैक की मजबूती पर होने के बजाय केवल अनुचित व्यक्तिगत लाभ कमाने पर केंद्रित है।

प्रशासनिक एवं सिस्टम सुधार हेतु आवश्यक सुझाव

रेलवे में इस प्रकार की अराजकता, भ्रष्टाचार और सुरक्षा संबंधी कोताही को स्थायी रूप से समाप्त करने के लिए निम्नलिखित सुधारात्मक कदम उठाए जाने की नितांत आवश्यकता है:

  • विजिलेंस जांच और तकनीकी ऑडिट: इस पूरे मामले और पिछले आठ महीनों में फेल हुए टेंडरों की जांच तुरंत रेलवे बोर्ड विजिलेंस को सौंपी जाए। साथ ही, डीयूके लाइन के ट्रैक की वर्तमान स्थिति की जांच के लिए कमिशनर ऑफ रेलवे सेफ्टी (#CRS) या एक स्वतंत्र तकनीकी टीम से सेफ्टी ऑडिट कराया जाए।
  • अधिकारियों की तैनाती में पारदर्शिता (#Rotation Policy): संवेदनशील और व्यस्त रेलखंडों पर अधिकारियों की तैनाती केवल उनकी कार्यकुशलता, पिछले बेदाग ट्रैक रिकॉर्ड और योग्यता के आधार पर की जानी चाहिए, न कि चापलूसी या व्यक्तिगत केमेस्ट्री के आधार पर। दागी या पूर्व में गंभीर हादसों के समय विवादों में रहे अधिकारियों को मुख्य परिचालन विंग से दूर रखा जाए।
  • डिजिटल बिलिंग और समयबद्ध भुगतान: ठेकेदारों के बिलों को अधिकारियों की व्यक्तिगत ‘आईडी’ में हफ्तों तक रोकने की प्रथा पर पूरी तरह रोक लगे। एक केंद्रीकृत ई-बिलिंग ट्रैकिंग सिस्टम लागू हो, जिसमें यदि कोई अधिकारी 7 दिनों से अधिक समय तक बिना वैध कारण के बिल रोकता है, तो उसके वेतन से पेनल्टी काटने और स्वतः उच्च स्तर पर एस्केलेशन (#Escalation) की व्यवस्था हो।
  • जवाबदेही का विकेंद्रीकरण: किसी भी खंड में ट्रैक फेलियर या मेंटेनेंस की कमी पाए जाने पर केवल शीर्ष स्तर (जैसे #PCE) को हटाने के बजाय, सीधे तौर पर उत्तरदायी सेक्शनल सीनियर डीईएन (#SrDEN), एडीईएन (#ADEN) और एसएसई (#SSE) की जवाबदेही तय कर उन पर तत्काल निलंबन और ट्रांसफर की कार्रवाई की जानी चाहिए।
  • विवाद समाधान तंत्र: मंडल स्तर पर ठेकेदारों और फील्ड स्टाफ की समस्याओं को सीधे सुनने के लिए एक स्वतंत्र “ग्रीवांस रिड्रेसल सेल” का गठन हो, ताकि अधिकारी अपनी मनमानी से निविदाओं को फेल न कर सकें और रेलवे के विकास कार्य निर्बाध रूप से चलते रहें।