प्रकरण: रेलवे सुरक्षा बल में दोहरे मापदंड और नीतिगत विसंगतियां
आरपीएफ में दोहरे मापदंड: टीएमएम के फेर में जवान त्रस्त, शीर्ष अधिकारियों पर मेहरबान महानिदेशक; कार्यकाल विस्तार की नई परंपरा से बढ़ा असंतोष
रेलसमाचार ब्यूरो, नई दिल्ली। रेलवे सुरक्षा बल (#RPF) में इस समय नीतिगत विरोधाभास और दोहरे मापदंडों को लेकर गहरा असंतोष पनप रहा है। एक तरफ जहां बल सदस्य और अधीनस्थ अधिकारी ‘ट्रांसफर मैनेजमेंट मॉड्यूल’ (TMM) की विसंगतियों, तकनीकी कमियों और अत्यधिक प्रशासनिक विलंब के कारण अपने परिवारों और बच्चों के भविष्य को लेकर मानसिक एवं आर्थिक रूप से प्रताड़ित हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ शीर्ष स्तर पर चहेते उच्चाधिकारियों को नीति-नियमों को ताक पर रखकर कार्यकाल विस्तार (टेन्योर एक्सटेंशन) से नवाजा जा रहा है। हाल ही में रेलवे बोर्ड द्वारा जारी एक नया आदेश इस प्रशासनिक विसंगति का प्रत्यक्ष प्रमाण बनकर सामने आया है, जिसने संगठन के भीतर ‘जवान बनाम अफसर’ की खाई को और गहरा कर दिया है।
अधिकारियों को मलाई, जवानों को जुदाई: क्या है नया आदेश?
रेलवे बोर्ड द्वारा दिनांक 10.06.2026 को जारी पत्र संख्या E(O)III-2023/TR/296 (जिसका संदर्भ यहाँ देखा जा सकता है) के अनुसार, दो वरिष्ठ आरपीएफ अधिकारियों के कार्यकाल को बढ़ाने का अभूतपूर्व निर्णय लिया गया है। इस आदेश के तहत पहले अधिकारी मुनावर खुर्शीद (IG-Cum-PCSC/IRPFS/ साउथ ईस्ट सेंट्रल रेलवे) के कार्यकाल को 01.02.2027 तक के लिए विस्तारित किया गया है। वहीं, दूसरे अधिकारी बी. वेंकटेश्वर राव (IG-Cum-Director/IRPFS/ जे.आर. आरपीएफ अकादमी, लखनऊ) के कार्यकाल को भी एक वर्ष की अवधि अथवा अगले आदेश तक के लिए बढ़ा दिया गया है। आम सुरक्षाकर्मियों के बीच अब यह यक्ष प्रश्न चर्चा का विषय है कि आखिर इन दोनों अधिकारियों ने ऐसा कौन सा विशेष या असाधारण कार्य किया है, जिसके ‘पुरस्कार’ स्वरूप इन्हें संकट के इस दौर में भी मलाईदार पदों पर कार्यकाल विस्तार का उपहार दिया जा रहा है।

नीतियों की विफलता और महानिदेशक की उदासीनता
यह विसंगति तब और अधिक चुभने वाली हो जाती है जब इसकी तुलना धरातल पर जूझ रहे साधारण बल सदस्यों की स्थिति से की जाती है। कई बल सदस्यों का आरोप है कि आरपीएफ महानिदेशक (#DGRPF) को उन जवानों की कोई चिंता नहीं है जो फरवरी-मार्च 2026 से प्रस्तावित अपने नियमित वार्षिक टेन्योर स्थानांतरण के लिए जून के मध्य तक भी केवल प्रतीक्षा सूची और अनिश्चितता के चक्रव्यूह में फंसे हुए हैं। डिजिटल पारदर्शिता के नाम पर थोपे गए टीएमएम के कारण हजारों बल सदस्यों के बच्चों की शिक्षा अधर में लटकी हुई है, क्योंकि अप्रैल से नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के कारण वे न तो पुराने स्थान पर आश्वस्त हैं और न ही नए स्थान पर समय से दाखिला करा पा रहे हैं। इस डिजिटल सिस्टम की तकनीकी विसंगतियों और बार-बार बदलती तारीखों ने आम कर्मचारियों को तनाव और भारी आर्थिक नुकसान के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है, लेकिन उनके लिए सहानुभूति का एक शब्द भी महानिदेशक की ओर से नहीं आया है।
गलत परंपरा की शुरुआत और रेल प्रशासन का बंटाधार
जानकारों का मानना है कि चुनिंदा अधिकारियों को कार्यकाल विस्तार देने की यह नीति एक बेहद गलत और खतरनाक प्रशासनिक परंपरा की शुरुआत है। इससे पहले भी रेलवे बोर्ड में चेयरमैन और सीईओ (CRB & CEO) के पद पर लगातार एक्सटेंशन और फिर काँट्रेक्ट एक्सटेंशन की रेवड़ियां बांटकर रेल प्रशासन की रीढ़ को कमजोर करने तथा पूरी व्यवस्था का बंटाधार करने का अनुचित कार्य किया गया। अब वही बीमारी रेलवे सुरक्षा बल जैसे अनुशासित संगठन में भी पैर पसारने लगी है। जब नीतिगत रूप से यह तय है कि एक निश्चित कार्यकाल के बाद स्थानांतरण या सेवानिवृत्ति अपरिहार्य है, तो कुछ खास अधिकारियों के लिए नियमों को लचीला बनाना और सर्वसामान्य बल सदस्यों के लिए टीएमएम के नाम पर अत्यधिक कड़ाई करना यह साबित करता है कि तंत्र में मानवीय दृष्टिकोण का पूरी तरह लोप हो चुका है।
जवानों में पनपता आक्रोश: क्या उनके लिए भी लागू होंगे ये नियम?
इस भेदभावपूर्ण रवैये ने सोशल मीडिया से लेकर बैरकों तक एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या कार्यकाल विस्तार की यह उदारता और यह नियम केवल वातानुकूलित कमरों में बैठने वाले अधिकारियों के लिए ही आरक्षित है? क्या ग्राउंड पर 24 घंटे कठिन परिस्थितियों में ड्यूटी देने वाले किसी पीड़ित बल सदस्य के लिए भी उसकी पारिवारिक या चिकित्सीय परिस्थितियों को देखकर ऐसा कोई एक्सटेंशन या राहत दी जाएगी? सुरक्षा बलों के स्थापित नियम कहते हैं कि बल का मनोबल केवल अधिकारियों की सुख-सुविधा से नहीं, बल्कि जवानों के साथ होने वाले न्यायसंगत व्यवहार से तय होता है। यदि शीर्ष प्रशासन अपनी ही नीतियों को लेकर दोमुंहा रुख अपनाएगा, तो देश की इस महत्वपूर्ण सुरक्षा एजेंसी की कार्यक्षमता और आंतरिक अनुशासन पर इसका बेहद घातक असर पड़ना तय है।

