विशेष रिपोर्ट: आरडीएसओ में प्रशासनिक अराजकता और उत्पीड़न
आरडीएसओ में चल रही गंभीर अनियमितताओं पर रेलवे बोर्ड और शीर्ष नेतृत्व की निरंतर चुप्पी—संपूर्ण प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न
रेलसमाचार ब्यूरो, लखनऊ: अनुसंधान अभिकल्प और मानक संगठन (#RDSO), लखनऊ में पिछले कुछ समय से प्रशासनिक संवेदनहीनता, मानसिक उत्पीड़न और सत्ता के दुरुपयोग का एक अत्यंत चिंताजनक वातावरण निर्मित हो गया है। प्राप्त दस्तावेजी साक्ष्यों और लिखित शिकायतों के गहन विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि आरडीएसओ के उपमहानिदेशक (#ADG) काजी और प्रधान मुख्य चिकित्सा निदेशक (#PCMO) डॉ. कमल किशोर की जुगलबंदी के कारण अधीनस्थ डॉक्टरों, तकनीकी स्टाफ और लिपिकीय कर्मचारियों का बड़े पैमाने पर उत्पीड़न किया जा रहा है। इन गंभीर अनियमितताओं के बावजूद रेलवे बोर्ड और शीर्ष नेतृत्व (#CRB) की निरंतर चुप्पी संपूर्ण प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।
अधीनस्थ के उत्पीड़न एवं सत्ता के दुरुपयोग के 6 प्रमुख प्रकरण:
- प्रकरण 1: डॉ. अनुज सिंह का उत्पीड़न एवं नियमों को ताक पर रखकर स्थानांतरण का विफल प्रयास—आरडीएसओ अस्पताल में पदस्थ डॉ. अनुज सिंह के साथ पीसीएमओ डॉ. कमल किशोर द्वारा सरेआम बदसलूकी की गई। स्टाफ के समक्ष उनके सम्मान को ठेस पहुंचाते हुए डॉ. कमल किशोर ने जातिसूचक और अमर्यादित भाषा का प्रयोग करते हुए कहा, “मैं तुम्हारी ठकुरई तुम्हारे पिछवाड़े में घुसेड़ दूंगा।” जब डॉ. अनुज सिंह ने इस अभद्रता का प्रतिकार करते हुए तमीज से बात करने का आग्रह किया, तो दुर्भावना से ग्रसित होकर पीसीएमओ की मौखिक शिकायत पर एडीजी काजी ने बिना किसी आधिकारिक जांच के डॉ. अनुज सिंह को आरडीएसओ से बाहर स्थानांतरित करने हेतु रेलवे बोर्ड को पत्र लिख दिया। इस अन्याय के विरोध में अस्पताल के लगभग 213 कर्मचारियों ने सामूहिक हस्ताक्षर कर महानिदेशक (RDSO) और रेलवे बोर्ड को पत्र भेजकर डॉ. अनुज सिंह को चिकित्सालय का सबसे उत्कृष्ट चिकित्सक बताया और स्थानांतरण रोकने की मांग की। रेलवे बोर्ड ने कर्मचारी आक्रोश का संज्ञान लेते हुए इस दुर्भावनापूर्ण तबादले पर रोक लगा दी, जिससे एडीजी काजी की अत्यधिक फजीहत हुई। इस विफलता से चिढ़कर अब एडीजी और पीसीएमओ द्वारा डॉ. अनुज सिंह को आए दिन प्रशासनिक स्तर पर तंग किया जा रहा है।
- प्रकरण 2: डॉ. सतीश गुप्ता का उत्पीड़न एवं ‘रेफरल रैकेट’ का भंडाफोड़—आरडीएसओ अस्पताल में कार्यरत नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. सतीश गुप्ता वर्तमान में इस जोड़ी के निरंतर उत्पीड़न के कारण गहरे मानसिक अवसाद (डिप्रेशन) में चले गए हैं। उनके पिता और पत्नी द्वारा भेजे गए शिकायती पत्रों से स्पष्ट है कि डॉ. सतीश गुप्ता के अस्पताल में आने से पीसीएमओ डॉ. कमल किशोर की उस ‘ऊपरी कमाई’ पर पूरी तरह रोक लग गई थी, जो वे मरीजों को लखनऊ आई हॉस्पिटल (निजी संस्थान) में अवैध रूप से रेफर करके कमीशन के रूप में अर्जित करते थे। इस आर्थिक चोट से बौखलाए पीसीएमओ ने एडीजी के साथ मिलकर डॉ. सतीश गुप्ता का जीना दूभर कर दिया, जिसके कारण विवश होकर उन्होंने अपना स्थानांतरण समस्तीपुर करने के लिए रेलवे बोर्ड से गुहार लगाई है।
- प्रकरण 3: तकनीकी स्टाफ का शोषण (शिव शंकर, तकनीशियन-1 का मामला) — अस्पताल के तकनीशियन-1 शिव शंकर द्वारा प्रस्तुत लिखित दस्तावेज पीसीएमओ डॉ. कमल किशोर द्वारा किए जा रहे मानसिक और प्रशासनिक उत्पीड़न की पराकाष्ठा को उजागर करते हैं। ड्यूटी रोस्टर में मनमाने बदलाव, झूठे आरोपों में फंसाने की धमकी और बुनियादी कर्मचारी अधिकारों से वंचित करना पीसीएमओ की कार्यशैली का हिस्सा बन चुका है, जिससे निचले संवर्ग के कर्मचारियों में भारी रोष और भय व्याप्त है।
- प्रकरण 4: एससी/एसटी संवर्ग के कर्मचारियों का उत्पीड़न (अशोक चौधरी का मामला) — स्टेनोग्राफर अशोक चौधरी का मामला प्रशासनिक द्वेष और सेवा नियमों के उल्लंघन का अनुठा उदाहरण है। अशोक चौधरी मूल रूप से हिंदी भाषा के स्टेनोग्राफर हैं, किंतु एडीजी काजी ने जानबूझकर उन्हें प्रताड़ित करने के उद्देश्य से उनकी अंग्रेजी स्टेनोग्राफी के री-टेस्ट का आदेश जारी कर दिया। इस सीधे उत्पीड़न के विरुद्ध एसटी/एससी एसोसिएशन ने भी आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई है। नियमानुसार इस पर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग को तत्काल संज्ञान लेना चाहिए था, परंतु उच्च स्तरीय संरक्षण के कारण अब तक कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई है।
- प्रकरण 5: व्यक्तिगत शत्रुता के कारण ‘बंगलो प्यून’ के मेडिकल परीक्षण में जानबूझकर विलंब — वर्तमान में रेलवे बोर्ड में पदस्थ डॉ. संगीता सागर के बंगलो प्यून (#TADK) के अनिवार्य मेडिकल परीक्षण को पीसीएमओ डॉ. कमल किशोर ने व्यक्तिगत रंजिश के चलते महीनों तक लंबित रखा। नियमानुसार इस प्रकार के प्रशासनिक दायित्वों को समयबद्ध सीमा में पूरा करना अनिवार्य होता है। इस मामले में जब वर्तमान महानिदेशक (RDSO) ने कड़ा रुख अपनाते हुए लिखित आदेश जारी किया, तब जाकर विवश होकर पीसीएमओ ने उक्त कर्मचारी का मेडिकल परीक्षण संपन्न किया, जो इनके हठधर्मी रवैये को सिद्ध करता है।
- प्रकरण 6: सरकारी वाहन (Official Contract Vehicle) का घोर दुरुपयोग एवं ठेकेदार को धमकी — प्रशासनिक भ्रष्टाचार का एक और प्रत्यक्ष प्रमाण डॉ. कमल किशोर द्वारा आवंटित सरकारी अनुबंधित वाहन के व्यक्तिगत उपयोग के रूप में सामने आया है। डॉ. कमल किशोर की पत्नी उन्नाव में पदस्थ हैं और वे प्रतिदिन इस सरकारी वाहन से उन्नाव आती-जाती हैं, जिसके कारण वाहन का मासिक माइलेज 3000 किमी से भी अधिक आ रहा है। जब संबंधित वाहन ठेकेदार ने इस अवैध उपयोग और अत्यधिक वित्तीय नुकसान पर आपत्ति जताई, तो पीसीएमओ ने सुधरने के बजाय एडीजी काजी के प्रशासनिक प्रभाव का दुरुपयोग करते हुए ठेकेदार का टेंडर निरस्त करने की सीधी धमकी दे डाली।
मुख्य प्रशासनिक प्रश्न एवं निष्कर्ष
उपरोक्त सभी छह प्रकरण सामान्य प्रशासनिक त्रुटियां नहीं हैं, बल्कि यह एक सुव्यवस्थित संगठित प्रताड़ना, उत्पीड़न और भ्रष्टाचार का नेटवर्क है, जो आरडीएसओ जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की गरिमा को धूमिल कर रहा है। चिकित्सा क्षेत्र जैसे संवेदनशील विभाग में डॉक्टरों का अवसाद में जाना और 213 से अधिक कर्मियों का सड़कों पर उतरने को मजबूर होना यह दर्शाता है कि स्थानीय प्रबंधन पूरी तरह विफल हो चुका है।
रेलवे बोर्ड (CRB) से सवाल: जब अधीनस्थ कर्मचारियों, मान्यता प्राप्त यूनियनों और स्वयं डॉक्टरों द्वारा साक्ष्यों के साथ शिकायतें भेजी जा चुकी हैं, तो रेलवे बोर्ड के चेयरमैन और महानिदेशक इस अत्यंत गंभीर मानवीय और वित्तीय संकट पर मौन क्यों साधे हुए हैं? क्या आरडीएसओ के इन उच्चाधिकारियों को किसी शीर्ष स्तर का मूक संरक्षण प्राप्त है?
अनुशंसाएँ
- लंबे समय से लगातार लखनऊ में जमे एडीजी काजी और पीसीएमओ डॉ. कमल किशोर के विरुद्ध तत्काल प्रभाव से एक उच्च स्तरीय निष्पक्ष विजिलेंस और प्रशासनिक जांच बैठाई जाए।
- जांच के निष्पक्ष संचालन हेतु दोनों अधिकारियों को वर्तमान पदों से हटाकर किसी गैर-संवेदनशील पद पर अन्यत्र स्थानांतरित किया जाए।
- डॉ. सतीश गुप्ता और डॉ. अनुज सिंह जैसे प्रताड़ित चिकित्सकों को तत्काल प्रशासनिक सुरक्षा प्रदान की जाए और सरकारी वाहन के दुरुपयोग से हुए वित्तीय नुकसान की वसूली डॉ. कमल किशोर के व्यक्तिगत वेतन से की जाए।

