भोपाल मंडल में प्रशासनिक अनियमितता एवं यूनियन के अनुचित दबाव का मामला
पश्चिम मध्य रेल के भोपाल मंडल में कार्मिक विभाग के एक कार्यालय अधीक्षक (OS-Personnel) को 1 मई 2026 को मंडल रेल प्रबंधक (#DRM) भोपाल के आदेशानुसार निलंबित किया गया था। यह कार्रवाई एक पीड़ित रेल कर्मचारी द्वारा साक्ष्यों के साथ सीधे मंडल रेल प्रबंधक से की गई शिकायत के बाद की गई। शिकायत के अनुसार, उक्त कार्यालय अधीक्षक द्वारा एक आधिकारिक कार्य के बदले ₹30,000 की रिश्वत मांगी गई थी, जिसमें से ₹18,000 की राशि का भुगतान उन्हें पहले ही किया जा चुका था। मंडल रेल प्रबंधक ने इस संवेदनशील मामले की अपने स्तर पर अत्यंत गोपनीय जांच करवाई, जिसमें आरोपों की पुष्टि होने के बाद आरोपी कार्यालय अधीक्षक के निलंबन के आदेश जारी किए गए।
चूंकि यह कार्यालय अधीक्षक रेलवे की एक मान्यता प्राप्त यूनियन के पदाधिकारियों में शामिल हैं, इसलिए मंडल के वरिष्ठ मंडल कार्मिक अधिकारी (#SrDPO) और आरोपी कर्मचारी के स्तर पर इस निलंबन की बात को कथित तौर पर दबाए रखा गया। निलंबन आदेश के बावजूद उक्त कार्यालय अधीक्षक लगातार कार्यालय आकर अपनी ड्यूटी करता रहा। कार्यालय आदेश संख्या: 454-2026 EO(P), दिनांक 20-05-2026 के अनुसार, निलंबन के 14 दिन बाद एक पुनः शिकायत होने पर, उनका निलंबन समाप्त कर प्रशासनिक आधार पर (रोटेशनल प्रशासनिक स्थानांतरण) उनका स्थानांतरण आरटीआई शाखा में कर दिया गया।
उक्त कार्यालय आदेश जारी होने के बाद भी, आरोपी कार्यालय अधीक्षक ने आज तक अपनी नई पदस्थापना (RTI अनुभाग) पर कार्यभार ग्रहण नहीं किया है। वह नियमों को ताक पर रखकर वर्तमान में भी अपने पुराने पद/सीट पर ही कार्य कर रहा है, जो सीधे तौर पर रेल प्रशासन पर यूनियन के अनुचित दबाव और प्रशासनिक शिथिलता को उजागर करता है। उल्लेखनीय है कि उक्त कर्मचारी ने यूनियंस की मान्यता के चुनाव से ठीक पहले अपनी व्यक्तिगत सुविधा के अनुसार #WCREU और #WCRMS यूनियनों के बीच कई बार दलबदल भी किया है।
आरोपी कार्यालय अधीक्षक की कार्यशैली पर पूर्व में भी गंभीर आरोप लगते रहे हैं। जब वह सेटलमेंट (समापन) सेक्शन में पदस्थ था, तब उसके द्वारा प्रत्येक माह सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारियों से कथित तौर पर 4,000 से 5,000 रुपये की अवैध मांग की जाती थी। एक अन्य गंभीर मामले में, एक रेल कर्मचारी की प्रथम पत्नी के स्थान पर दूसरी पत्नी का नाम रिकॉर्ड में जोड़ने के एवज में ₹50,000 की डील हुई थी, जिसमें से ₹25,000 उसके द्वारा एडवांस ले लिए गए थे। सेवानिवृत्ति के दिन पीपीओ में पहली पत्नी का ही नाम होने पर जब पीड़ित कर्मचारी ने तत्कालीन वरिष्ठ मंडल कार्मिक अधिकारी के समक्ष विरोध प्रदर्शन किया, तो मामले को नियमानुसार निपटाने या चार्जशीट देने के बजाय, यूनियन के दबाव में केवल पैसे वापस करवाकर मामले को रफा-दफा कर दिया गया। इसके बाद बिना किसी दंडात्मक कार्रवाई के उन्हें सेटलमेंट सेक्शन से हटाकर पे-शीट अनुभाग में भेज दिया गया था।
लगातार मिल रहे कथित राजनीतिक और यूनियन संरक्षण के कारण उक्त कार्यालय अधीक्षक के हौसले बुलंद हैं और वह इस लचर प्रशासनिक तंत्र का भरपूर अनुचित लाभ उठा रहा है। मंडल के अधिकारियों में यूनियन के गतिरोध से बचने और शांतिपूर्वक अपना कार्यकाल पूरा करने की मानसिकता के कारण ऐसे तत्वों के विरुद्ध ठोस दंडात्मक कार्रवाई नहीं हो पा रही है। वर्तमान स्थिति यह है कि जिस रेल कर्मचारी ने हाल ही में इस भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई थी, उसे आरोपी द्वारा डराया-धमकाया जा रहा है, जिससे मंडल के अन्य कर्मचारियों में भी भय का माहौल है और वे शिकायत करने से कतरा रहे हैं। यह संपूर्ण प्रकरण भोपाल मंडल और वहां की यूनियनों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

