अविवेकी ट्रांसफर पर कैट का स्टे—पीसीपीओ और जीएम के मुंह पर पुती कालिख
यदि लखनऊ मंडल के सीनियर डीपीओ और मुख्यालय के डिप्टी सीपीओ/गज्टेड को एक-दूसरे की जगह शिफ्ट कर दिया गया होता, तो इतना रायता ही नहीं फैलता!
जब अपने विभाग प्रमुखों (#PHODs) की मनमानियों पर अंकुश लगाने में कोई जीएम असफल रहता है, तो केवल जीएम की ही फजीहत नहीं होती है, बल्कि सिस्टम पर इसका बहुत गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है!
जब किसी विभाग प्रमुख (#PHOD) के मनमाने और विवादास्पद निर्णय पर जनरल मैनेजर (#GM) द्वारा अपना दिमाग नहीं लगाया जाता, अपने विवेक का उपयोग नहीं किया जाता, या फिर मौन रहकर की PHOD की सिफारिशों को संस्तुति प्रदान कर दी जाती है, तो ऐसा ही विवाद पैदा होता है, जैसा पूर्वोत्तर रेलवे के तीन जेएजी स्तर के कार्मिक अधिकारियों के ट्रांसफर पर पैदा हुआ।
अब केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (#CAT) इलाहाबाद ने अभिनव कुमार सिंह, #SrDPO/BSB—जिनको #DyCPO/Gaz बनाकर गोरखपुर भेजा जा रहा था—के ट्रांसफर को रेलवे के वकील की जोरदार दलीलों के बावजूद फिलहाल अगली तारीख तक के लिए स्टे कर दिया है। कैट ने रेलवे के वकील की इस दलील पर यह अंतरिम आदेश दिया है कि अप्लीकेंट का ट्रांसफर नियम के अनुसार हुआ है और इस संबंध में वह प्लेसमेंट कमेटी की मिनिट्स प्रस्तुत कर सकते हैं। कैट ने रेलवे के वकील की दलील मानते हुए अगली तारीख पर सारा रिकॉर्ड प्रस्तुत करने का आदेश दिया है और तब तक के लिए ट्रांसफर को स्टे कर दिया है।
अप्लीकेंट अभिनव सिंह के वकील ने दलील दी कि अपीलकर्ता को अभी हाल ही में SrDPO/BSB के पद पर पदोन्नति दी गई है और उसे इस पद पर कार्य करते हुए मात्र छह माह ही हुआ है, फिर ऐसी क्या अर्जेंसी या एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सीजेंसी हुई कि अप्लीकेंट को टेन्योर पूरा होने से पहले ही ट्रांसफर किया जा रहा है। उनकी इस दलील पर कैट ने सारा रिकॉर्ड मांगा है कि आखिर किस आधार पर यह ट्रांसफर किया गया है? ट्रांसफर के लिए #PCPO द्वारा जो फाइल पर टिप्पणी की गई है उसमें ट्रांसफर का क्या आधार रहा है? और इस पर जीएम की क्या टिप्पणी और सहमति रही है।
कैट द्वारा ट्रांसफर संबंधी प्रक्रिया और टिप्पणी का सारा रिकॉर्ड मांगा गया है। इस मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल को होगी। ये सही है कि सरकारी संगठनों में अधिकारियों और कर्मचारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग प्रशासनिक निर्णयों के अनुसार होती है और इस पर किसी अन्य तंत्र को दखल देने का अधिकार नहीं है, लेकिन रेलवे जैसी सबसे बड़ी सरकारी संस्था में किसी मंडल के ब्रांच अधिकारी की ट्रांसफर-पोस्टिंग उस समय चैलेंज बन जाती है जब कोई पीड़ित अधिकारी इस आधार पर चैलेंज करे कि उसके साथ अन्याय किया गया है और वह उसका उचित कारण भी प्रस्तुत करता है, तब विभाग प्रमुख और जीएम के ऐसे निर्णय प्रशासनिक कदाचार और फेवर की श्रेणी में आ जाते हैं, जिसमें किसी को ऐडजस्ट करने या फेवर करने के लिए किसी निर्दोष की बलि चढ़ाई जाती है।
PCPO/NER द्वारा जो ट्रांसफर ऑर्डर निकाला गया, वह इसी तरह का संदेह पैदा करता है। जानकारों का मानना है कि यदि लखनऊ मंडल के सीनियर डीपीओ और मुख्यालय के डिप्टी सीपीओ/गज्टेड को एक-दूसरे की जगह शिफ्ट कर दिया गया होता, तो इतना रायता ही नहीं फैलता। उनका ये भी कहना है कि ऐसा क्या कारण था कि पीसीपीओ वाराणसी मंडल के सीनियर डीपीओ को बदलना चाहते थे, जिसका कार्यकाल अभी एक तिहाई भी पूरा नहीं हुआ था और उसकी जगह सीनियर डीपीओ/लखनऊ को ही क्यों पदस्थ करना था, जिन्होंने लखनऊ मंडल में पहले ही तीन साल से कुछ अधिक का कार्यकाल ब्रांच अधिकारी के तौर पर पूरा कर लिया था?
उन्होंने कहा कि जब कोई बात उठती है तो दूर तक जाती है, और इस संदेह की आंच में जोनल के मुखिया अर्थात् जीएम की जवाबदेही भी रहेगी कि आखिर उन्हें ये भेदभाव क्यों नहीं दिखाई दिया? क्या बुद्धिमानी इसी को कहते हैं कि विभाग प्रमुख कुछ भी मनमानी करता रहे, लेकिन जीएम चुप रहेंगे? चुप्पी साधे रहेंगे? चुप्पा बने रहेंगे? अगर चुप ही रहना था, तो फिर ओपन लाइन की पोस्टिंग क्यों ली? क्यों एक जोनल रेलवे का प्रशासनिक/अनुशासनिक वातावरण खराब कर रहे हैं? अगर ऐसा ही रहा तो अगली बगावत का सुर मंडल प्रमुखों (DRMs) के स्तर से भी आ सकता है, क्योंकि कहीं न कहीं इस अव्यवस्था से उन लोगों के मंडलों की परफॉर्मेंस खराब हो रही है।
अब अगर कैट ने सीनियर डीपीओ/वाराणसी की दलील को स्वीकार करते हुए उन्हें फिलहाल उसी पद पर बनाए रखने का आदेश दिया है, तो उनकी दलील में पुख्ता दम है और इसके चलते विभाग प्रमुख और जीएम के ही मुंह पर कालिख पुती है! जब अपने विभाग प्रमुखों (#PHODs) की मनमानियों पर अंकुश लगाने में कोई जीएम असफल रहता है, तो केवल जीएम की ही फजीहत नहीं होती है, बल्कि सिस्टम पर इसका बहुत गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
Order of The Tribunal, Dtd. 23.04.2026
The instant original application has been filed by the applicant challenging the order dated 13.04.2026 passed by the respondent no 2 through which the applicant has been transferred from the post of SrDPO, Varanasi Division, North Eastern Railway to the post of Deputy Chief Personnel Officer / Gazetted at Gorakhpur on the same pay and allowances.
Stressing on interim relief, learned counsel for the applicant argues that the transfer order dated 13.04.2026 is illegal and arbitrary because it has been effected in mid-academic session. It is further argued that the transfer order is also non-speaking and unreasonable because no ground whatsoever for effecting the transfer has been recorded in it nor it has been recorded as to whether the transfer has been effected due to any administrative exigency. It is also argued that the applicant has not completed the minimum tenure at the present place of posting and also on the particular post and thus the transfer order is in violation of the respondents’ own rules and provisions. Thus, prayer was made to stay the effect and operation of the transfer order otherwise the applicant shall suffer irreparable loss and injury.
Learned counsel for the respondents vehmently opposes the prayer of the applicant’s counsel and referring to the instructions received from the department, he argues that the transfer has been effected consequent to the approval of the competent authority of the department and has been made in administrative exigency. There is absolutely no malafide or resentment against the applicant. The order dated 13.04.2026 has been passed in accordance with law and in conformity with the extant rules of the department and no illegalilty or infirmity can be attributed to the same. Thus, it was argued to reject the applicant’s prayer for interim relief.
I have considered the rival contentions and perused the records.
Referring to the instructions, the respondents’ counsel has argued that the transfer under challenge has been made in administrative exigency and there is no any malafide or violation of statutory rules. The respondents’ counsel has also stated that he will bring on record the minutes of the meeting of the Transfer Placement Committee in this regard.
Thus, as per the aforesaid submissions of the respondents’ counsel, list this matter on 29.04.2026. However, it is made clear that the effect and operation of the impugned transfer order in respect of the applicant, if has not already been given effect to, is stayed and will not be given effect to till the next date of listing.

