विशेष रिपोर्ट: भारतीय रेल में ‘डाटा-मैनेजमेंट’ बनाम ‘फील्ड-मैनेजमेंट’—सुधार या प्रशासनिक भ्रम?

रेलवे बोर्ड द्वारा जारी पत्र (2026/E&R/10(10)/1, दि. 22.04.2026, विषय: “Asset Failure Analysis of Divisions”) ने रेल प्रशासन के भीतर एक नई बहस और गहरी चिंता को जन्म दे दिया है। यह पत्र न केवल रेलवे बोर्ड की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि शीर्ष प्रबंधन और फील्ड की वास्तविकता के बीच की खाई गहरी होती जा रही है।

जानकारों का मानना है कि यह एक अत्यंत गंभीर और संवेदनशील विषय है। रेलवे बोर्ड का पत्र ऊपर से देखने में एक प्रशासनिक सुधार जैसा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे छिपी कुटिल मानसिकता और प्रशासनिक विसंगतियों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

1. रूट कॉज एनालिसिस: अनिवार्य प्रक्रिया या विफलता की स्वीकृति?

बोर्ड के इस निर्देश में विस्तृत Root Cause Analysis (#RCA) को अनिवार्य करने और CRB/CEO द्वारा सीधे रैंडम समीक्षा (VC के माध्यम से) की बात कही गई है। यहाँ सबसे बड़ा बुनियादी प्रश्न यह है कि—क्या अब तक रेलवे में विफलता का विश्लेषण नहीं किया जा रहा था?

Advertisements
  • यदि RCA की यह प्रक्रिया पहले से मौजूद थी, तो इन नए और सख्त निर्देशों की आवश्यकता क्यों पड़ी?
  • और यदि यह पहले नहीं हो रहा था, तो यह दशकों पुराने स्थापित तंत्र की एक बहुत बड़ी प्रशासनिक और संरक्षा/सुरक्षा संबंधी विफलता है!

2. कागजी आंकड़ों में उलझता फील्ड वर्क (PPT बनाम कार्यक्षमता)

वर्तमान निर्देशों के अनुसार, #DRM से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे प्रत्येक छोटी-बड़ी विफलता का सूक्ष्म विश्लेषण करें और उसकी विस्तृत प्रस्तुति तैयार करें।

  • परिणाम: फील्ड में सुधार करने के बजाय पूरा तंत्र ‘कागजी कार्यवाही’ और ‘PPT संस्कृति’ में उलझ जाएगा। अधिकारी मनगढ़ंत आंकड़े जुटाने और गूगल शीट्स भरने में अधिक समय बिताएंगे, जैसा अभी हो रहा है—उसी कार्यप्रणाली को विस्तारित किया जा रहा है।
  • जिम्मेदारी का स्थानांतरण: RCA तकनीकी रूप से जोनल मुख्यालय और आरडीएसओ का कार्य है। डिवीजन का प्राथमिक दायित्व ट्रेन संचालन, ट्रैक/ओएचई/रोलिंग स्टॉक का मेंटेनेंस, यात्री सुविधाएं और कर्मचारी कल्याण है। जब मेंटेनेंस करने वाली इकाई (#Division) ही डेटा एनालिसिस में जुट जाएगी, तो वास्तविक सुरक्षा (#Safety) का क्या होगा? और जोनल मुख्यालय एवं आरडीएसओ में बैठे वरिष्ठ अधिकारीगण क्या करेंगे?

3. नेतृत्व का संकट: अनुभवहीनता और ‘Safe Postings’ का प्रभाव

रेलवे के वर्तमान प्रशासनिक ढ़ांचे में नेतृत्व की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं:

  • DRM चयन की 52 वर्षीय सीमा: इस आयु सीमा के कारण वे अनुभवी अधिकारी नेतृत्व से बाहर हो जाते हैं जिनके पास ‘ओपन लाइन’ का वास्तविक और पर्याप्त अनुभव होता है।
  • फील्ड अनुभव की कमी: कई अधिकारी ऐसे पदों पर पहुँच रहे हैं, जिन्होंने अपने करियर का बड़ा हिस्सा ‘सेफ पोस्टिंग’ या प्रतिनियुक्ति अथवा वातानुकूलित मुख्यालयों में बिताया है। जब ऐसे अधिकारी पहली बार चुनौतीपूर्ण मंडलों की कमान संभालते हैं, तो वे तकनीकी सुधार के बजाय ‘प्रशासनिक दबाव’ (Fear Psychosis) का सहारा लेते हैं।
  • भय का वातावरण: बोर्ड के पत्र का टोन “ऊपर से दबाव” पैदा करने और “धमकी देने” वाला है। जब DRM खुद अपने मातहत अधिकारियों (JS/SS/JAG) पर नियंत्रण नहीं रख पाते हैं, तब CRB को तानाशाही या दादागीरी के अंदाज में सीधे मैदान में उतरना पड़ता है, जो यह दर्शाता है कि कमांड चेन (Chain of Command) टूट चुकी है। और यह स्थिति शीर्ष स्तर पर कॉन्ट्रैक्ट नियुक्ति के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई है।

4. ट्रांसफर-पोस्टिंग: रोटेशन नीति की धज्जियां और ‘जुगाड़’ तंत्र

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जहाँ बोर्ड ‘जवाबदेही’ की बात कर रहा है, वहीं शीर्ष पदों पर #रोटेशन नीति का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है, जिस पर रेलवे बोर्ड मौन है अथवा सिस्टम में जातीय/बिरादरी पक्षपात को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके कुछ ठोस उदाहरण (प्रमाण: ircep.gov.in) निम्नलिखित हैं:

  • मामला-1 (विवेक सक्सेना): CAO/C-1/NFR से सीधे CAO/C/NWR नियुक्त। मात्र एक वर्ष पहले दक्षिण रेलवे से पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे गए थे और इससे पूर्व उत्तर रेलवे (दिल्ली) में लंबा समय बिताया। यह रोटेशन के बजाय ‘मनपसंद जोन’ का खेल लगता है।
  • मामला-2 (सुरेश सप्रा): मात्र 6 महीने के भीतर PCE/NFR से हटाकर CAO/C-1/NFR जैसे मलाईदार पद पर नियुक्ति। DRM/LKO सहित लंबे समय तक लगातार लखनऊ में रहे। पुनः CAO/C/दिल्ली से पोस्ट सहित लखनऊ ट्रांसफर कराने की तिकड़मबाजी भी की, जो रोटेशन की इस विसंगति को दर्शाती है।
  • मामला-3 (राजीव गुप्ता): अप्रैल 2025 से अब तक (लगभग एक वर्ष) के भीतर तीन प्रमुख पदों पर स्थानांतरण (NFR से SR, फिर CR और अब ECR)। एक साल में तीन महत्वपूर्ण पदों का बदलाव—रेल प्रशासन की मानसिक अस्थिरता और पक्षपातपूर्ण व्यवहार को उजागर करता है।

ये उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि रेलवे में ‘मलाईदार पदों’ के लिए “रोटेशन नीति” को किनारे रखकर “जुगाड़” और “पहुँच” की संस्कृति हावी है।

5. कार्य संस्कृति में गिरावट और VRS का बढ़ता चलन

रेलवे की वर्तमान कार्य संस्कृति से त्रस्त होकर कई अधिकारी या तो बड़े शहरों (दिल्ली-मुंबई) में पोस्टिंग के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाते हैं या फिर समय से पहले VRS लेकर निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों (Contractors/Builders) का रुख कर रहे हैं। इससे रेलवे का वह ‘इंटीग्रेटेड ट्रेनिंग सिस्टम’ ध्वस्त हो रहा है जो कभी युवाओं को अनुभवी अधिकारियों के सानिध्य में निखारता था।

निष्कर्ष और मांग

“रूट कॉज एनालिसिस” महत्वपूर्ण है, लेकिन यह डिवीजन का काम नहीं है और न ही इसे ‘सजा’ या ‘डर’ का हथियार बनाया जाना चाहिए। फील्ड पर सुधार तब होगा जब अधिकारी फाइलों के बजाय पटरियों पर होंगे। रेलमंत्री जी से वरिष्ठ अधिकारियों का अनुरोध है कि:

  1. स्थानांतरण और रोटेशन नीति में न केवल शत-प्रतिशत पारदर्शिता लाई जाए, बल्कि इसे सख्ती के साथ लागू भी किया जाए।
  2. DRM चयन में आयु सीमा के बजाय ‘फील्ड अनुभव’ को प्राथमिकता दी जाए।
  3. प्रशासनिक सुधारों को ‘डाटा-मैनेजमेंट’ के बजाय ‘जवाबदेही’ पर आधारित किया जाए।

तभी भारतीय रेल की साख, संरक्षा और सुरक्षा सुरक्षित रह पाएगी।

प्रस्तुति: #RailSamachar