हिंदी पखवाड़े में पिछड़ती हिंदी

क्या केवल हिंदी पखवाड़ा, हिंदी दिवस, प्रवासी साहित्य, विदेश में हिंदी के प्रचार-प्रसार सम्मेलन और उस पर करोड़ों खर्च करने से हिंदी को कोई प्रतिष्ठा मिल सकती है?

क्या बिना अपनी भाषा के कोई भी शिक्षा संपूर्ण कहीं जा सकती है!

हर वर्ष की तरह हर तरफ सरकारी राजभाषा पखवाड़े की धूम मची है।लेकिन इस बीच दिल्ली विश्वविद्यालय से आई एक खबर ने सबको चौंका दिया है। दिल्ली के 30 मशहूर कॉलेजो में साढ़े सात हजार सीट अभी भी खाली हैं। उस केंद्रीय विश्वविद्यालय में जो अपने कॉलेज के बूते इतराते फिरता है और राष्ट्रीय सर्वेक्षण में दिल्ली के ही कॉलेज ऊपर नीचे उत्कृष्टता का दावा करते रहते हैं। सबसे दुखद पक्ष है हिंदी संस्कृत में सबसे ज्यादा सीट खाली रहना। दशकों से हिंदी और संस्कृत में दाखिला लेने वालों के अंक सबसे कम होते हैं। कई बार आस-पास के राज्यों के बच्चे दाखिला इसलिए ले लेते हैं कि दिल्ली यूनिवर्सिटी का नाम है और आगे पीछे हॉस्टल भी मिल जाएगा। जैसे जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में रूसी स्पेनिश कोरियन भाषा में सबसे फिसड्डी बच्चों को भी दाखिला मिल जाता है ।और फिर हॉस्टल दिल्ली में रहने की सुविधा। लेकिन अब दलित पिछड़े गांव के गरीब भी दाखिला नहीं ले रहे। उन्हें भी यह बताया गया है कि अंग्रेजी यानि शेरनी का दूध पीने से ही आप आगे बढ़ेंगे।

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आजादी के बाद से ही संविधान में लिखित हिंदी को आगे बढ़ाने की कोशिश जारी है। कभी राष्ट्रपति के आदेश, कभी राजभाषा अधिनियम, कभी धारा 341.. न जाने कितने डंडे मार-मारकर हर विभाग को हिंदी में काम करने के लिए कहा जाता है। संसदीय राजभाषा समिति भी गर्मियों में शिमला ऊटी कश्मीर में हिंदी की प्रगति का मुआयना करती है तो सर्दियों में तमिलनाडु पुडुचेरी अंडमान गोवा का दौरा बनता है। उनकी निष्ठा देखने लायक होती है और इस निष्ठा का प्रमाण होता है उनको मिले हुए गिफ्ट। लेकिन पूरे देश में सबसे ज्यादा लोकप्रिय हिंदी है कि सरकार के अंदर बढ़ने का नाम नहीं लेती। अरबों रुपया खर्च करने के बावजूद, क्योंकि ना स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जा रही है, न कॉलेजों में। माध्यम भाषा के रूप में तो लगभग समाप्ति की तरफ है। पूरा माहौल ही ऐसा बना दिया है कि हिंदी पढ़ने से क्या होगा?

हिंदी के कवि  लेखक और भी निराश करते हैं जब वह कहते हैं कि मेरा दुर्भाग्य कि मैं हिंदी में लिखता हूँ! जिनकी रोजी-रोटी हिंदी से आगे बढ़ी, अमेरिका इंग्लैंड भी घूमे, पुरस्कार भी मिले देसी विदेशी लेकिन बावजूद इसके वह हिंदी को कोसते हैं। जब ऐसा माहौल हो तो हिंदी पढ़ने के लिए विद्यार्थी क्यों आगे आयेंगे।

मौजूदा भारत सरकार भारतीय भाषाओं समेत हिंदी के लिए भी लगातार कोशिश कर रही है। नई शिक्षा नीति में भी प्राथमिक शिक्षा में अपनी भाषाओं को अनिवार्य किया गया है और यह भी कहा है कि कोशिश होनी चाहिए कि स्कूली शिक्षा अपनी भाषा के माध्यम से हो। लेकिन 5 वर्ष बीतने के बावजूद अभी इसे जमीन पर उतरना बाकी है वरना दिल्ली जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में हिंदी विषय में इतने कम लोग दाखिला नहीं लेते। कॉमन एंट्रेंस परीक्षा में बच्चे सबसे ज्यादा अंग्रेजी विषय चुनते हैं और क्यों नहीं चुनें जब एयरपोर्ट रेलगाड़ी से लेकर संसद के प्रवेश द्वार तक केवल अंग्रेजी से काम चलाया जा सकता है।

निश्चित रूप से इस सरकार ने पुरानी सरकारों के मुकाबले भारतीय भाषाओं और हिंदी के लिए बेहतर काम किया है। पुरानी सरकार ने यूपीएससी द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा के प्रथम चरण में ही  अंग्रेजी थोप दी थी और इससे भारतीय भाषाएं बिल्कुल बाहर हो गई थीं। विद्यार्थी सड़कों पर उतरे, कोर्ट भी गए, और फैसला उनके पक्ष में आया इस टिप्पणी के साथ कि कोठारी कमेटी ने वर्ष 1979 में भारतीय भाषाओं को जो छूट दी थी, उससे चयनित उम्मीदवारों में क्या कोई कभी पाई गई? कोर्ट के ऑर्डर से 2014 में नई सरकार ने उसे हटाया।

मेडिकल के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षा नीट भी अब तेरह भाषा में हो गई है और आईआईटी में प्रवेश परीक्षा भी। स्टाफ सेलेक्शन कमीशन जरूर अभी अंग्रेजी के पक्ष में हैं, लेकिन सरकार ने नीतिगत फैसला तो किया ही है कि वहां भी सभी भारतीय भाषाओं में परीक्षा ली जाएगी।

भारतीय रेल पहले ही कई भाषाओं में परीक्षा ले रही है। सुप्रीम कोर्ट के भी लगभग 70,000 महत्वपूर्ण निर्णय हिंदी और सभी भाषाओं में उपलब्ध कराए गए हैं। मध्य प्रदेश ने मेडिकल पढ़ाई भी सभी कॉलेजों में शुरू कर दी है और पूरे देश में 30 से ज्यादा इंजीनियरिंग कॉलेज भी अपने राज्य की भाषा में पढ़ने की छूट दे रहे हैं। जोधपुर आईआईटी ने भी हिंदी में पढ़ने की शुरुआत की है।

सरकार ने तो अपनी भाषाओं का महत्व समझ लिया है भले ही देर से सही, पर समाज इस बीच पूरी तरह अंग्रेजी भक्त हो चुका है। उसे हिंदी बोलने में भी शर्म आती है। इसी पखवाड़े में ऐसे ही एक आयोजन में जाना हुआ। बच्चों ने कविताएं सुनाईं। जब उनसे अपना परिचय बताने को कहा गया तो एक रटी हुई भाषा में बोल रहे थे—माय नेम इज.. उनसे विषयों के नाम बताने के लिए कहा गया तो भी समाजशास्त्र नहीं कहेंगे—सोशियोलॉजी कहेंगे। इतिहास कभी नहीं कहेंगे—हिस्ट्री कहेंगे। एक और दिल्ली के नामी पब्लिक स्कूल में उपस्थित बच्चों से पूछा कि कोर्स के अलावा किसी हिंदी की किताब का नाम बताइए। तो सन्नाटा।कई बार कहने के बावजूद भी जब कोई नहीं उठा तो उनकी शिक्षिका ने नाराज परेशान होकर एक बच्चे से कहा हिंदी की किताब का नाम बसंत है। पाठ्यक्रम के अलावा शायद शिक्षिका ने भी हिंदी की कोई किताब इधर मुश्किल से पढ़ी हो!

क्या दिल्ली में बैठे नौकरशाहों-राजनेताओं को इसका एहसास नहीं है? खूब है ! लेकिन वे हिंदी अकादमी मैथिली अकादमी भोजपुरी संस्कृत अकादमी उर्दू अकादमी बनाने की कोशिश करेंगे स्कूलों में हिंदी विषय या माध्यम में पढ़ने के बारे में कभी नहीं। इन अकादमियों के बनने से तो उनको या उनके चापलूसों को घोड़ा-गाड़ी मिल जाएगी बच्चों को तो उनका अंग्रेजी ही पढ़नी है। और वे दबे स्वर में कहते भी हैं कि अंग्रेजी आ जाएगी तो इंग्लैंड अमेरिका कनाडा में नौकरी तो मिल जाएगी। इन स्कूल कॉलेज में पढ़ाने वाले भी शायद उतने ही अज्ञानी हैं। क्या उन्हें नहीं पता कि आप भारतीय भाषाओं हिंदी माध्यम से आईएएस-पीसीएस परीक्षा में भी बैठ सकते हैं। इस देश की प्रांतीय परीक्षाओं में तो अपनी भाषा पूरी तरह से लागू है। बैंकों पत्रकारिता में भी हिंदी है। यदि बच्चों में यह आत्मविश्वास भर जाए तो निश्चित रूप से तस्वीर बदल सकती है।

लेकिन आत्मविश्वास भरे कौन जिनकी अपनी आत्मा ही मर चुकी है? हिंदी विभागों से जुड़े ज्यादातर प्राध्यापक अपनी भाषा-साहित्य को लेकर एक हीनभावना में रहते हैं और यही हाल सभी सरकारी कर्मचारियों का है। यदि बच्चों की संख्या ऐसे ही कम होती रही तो देर सबेर सरकार इन विभागों को बंद भी कर सकती है।

भारतीय रेल में काम करते हुए दक्षिण भारत के अधिकारियों के बीच बातचीत में पता लगा कि हिंदी क्षेत्र के अधिकारी वहां ज्यादा अंग्रेजी बोलते हैं। जबकि वहां के अधिकारियों का कहना था कि हम चाहते हैं कि उनके साथ हम हिंदी में बात करें तो हमारी हिंदी ठीक हो जाएगी। उत्तर भारत के यह लोग दक्षिण पर अपनी भाषा तो ठोकना चाहते हैं, लेकिन खुद उनसे और उनकी भाषा से दूर रहते हैं और अपने बच्चों को भी दूर रखते हैं। उनके घर शायद ही कोई हिंदी की किताब मिले धार्मिक किताबों को छोड़कर।

जबकि दक्षिण भारत में अपनी भाषाओं का ज्यादा सम्मान है और इसी का असर उनके पूरे समाज की प्रगति पर है। चाहे स्त्री शिक्षा हो या उद्योग, संस्कृति के प्रति निष्ठा। ज्यादातर दक्षिण और पश्चिम भारत के लोग तीन-चार भाषाएं जानते हैं हिंदी अंग्रेजी और अपनी भाषा, जबकि हिंदी क्षेत्र में मुश्किल से उन्हें हिंदी लिखना आती है।

उत्तर भारत में शिक्षकों की एक भर्ती में मैंने एक प्रश्न रखा कि आप सारे विषयों के नाम हिंदी और अंग्रेजी में लिख दीजिए। न उनको हिंदी में नाम लिखने आए, न अंग्रेजी में। विषय की जानकारी को तो छोड़ ही दीजिए। नतीजा सरकारी पखवाड़े के बावजूद भी हिंदी पिछड़ रही है और बुरी तरह। अपनी भाषा में ज्ञान विज्ञान की पुस्तक तभी लिखी जाएगी जब उस भाषा के माध्यम से पढ़ेंगे। यहां तो माध्यम भाषा में पढ़ना तो दूर उस विषय में पढ़ने वालों का भी टोटा पड़ा हुआ है।

क्या केवल हिंदी पखवाड़ा, हिंदी दिवस, प्रवासी साहित्य, विदेश में हिंदी के प्रचार-प्रसार सम्मेलन और उस पर करोड़ों खर्च करने से हिंदी को कोई प्रतिष्ठा मिल सकती है? नहीं ! यदि हमें शिक्षा को बेहतर बनाना है, नई पीढ़ी की रचनात्मकता को सहज रूप से सामने लाना है और सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भर लोकतंत्र बनाना है, तो अपनी भाषा को सम्मान देना होगा।

क्या बिना अपनी भाषा के कोई भी शिक्षा संपूर्ण कहीं जा सकती है! हिंदी पखवाड़े के बीच दिल्ली विश्वविद्यालय से ऐसी खबर चिंता में डालती है। अब तो दिल्ली में तीन इंजनों की सरकार है। वाइस चांसलर भी उनके हैं और ज्यादातर प्राध्यापक भी। नई शिक्षा नीति के आईने में उन्हें इस पक्ष पर विशेष ध्यान देना होगा।

#प्रेमपालशर्मा, सेवानिवृत्त कार्यकारी निदेशक, रेलवे बोर्ड, दिल्ली Mob. 99713 99046

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