February 15, 2021

सरकार पर मुकदमों के लिए जिम्मेदार हैं कार्मिक अधिकारी

अपने निकम्मेपन के लिए बदनाम हैं भारतीय रेल के कार्मिक अधिकारी

सुरेश त्रिपाठी

भारतीय रेल कार्मिक सेवा (आईआरपीएस) के अधिकांश अधिकारी निकम्मे, कामचोर और काम को लटकाने के लिए जाने जाते हैं। इनके इसी निकम्मेपन के कारण हर साल लाखों मुकदमें सरकार के खिलाफ विभिन्न अदालतों में न्याय पाने और नियमों-आदेशों का पालन करवाने के लिए सरकारी कर्मचारियों द्वारा दायर किए जाते हैं। जबकि ये निकम्मे यदि काम करें, तो अपवादस्वरूप ही कोई कर्मचारी अदालत का दरवाजा खटखटाने जाएगा।

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भारतीय रेल में कुछेक को छोड़कर अधिकांश कार्मिक अधिकारी खुद से कोई निर्णय नहीं लेते, और न ही रेलवे बोर्ड द्वारा जारी आदेशों, दिशा-निर्देशों का अक्षरशः पालन करने में सक्षम हैं। बल्कि कई तो ऐसे भी हैं जो स्पष्ट आदेश-निर्देश के बावजूद उल्टे बोर्ड से ही स्पष्टीकरण (क्लेरिफिकेशन) इसलिए मांग लेते हैं जिससे कि उन्हें इस जिम्मेदारी से निजात मिल जाए।

कार्मिक अधिकारियों की कामचोरी और नाकारेपन के कुछ उदाहरण

कार्मिक अधिकारियों के इस निकम्मेपन के कारण न सिर्फ सरकार पर मुकदमे होते हैं, बल्कि यूनियन पदाधिकारियों को भ्रष्ट बनाने में इनका सर्वोच्च योगदान है। दूसरे विभागों के अधिकांश अधिकारी जहां उन्हें अक्सर दुत्कार देते हैं, वहीं कार्मिक अधिकारी उनके तलवे चाटने लगते हैं। रस्सी को सांप साबित करने में पुलिस तो इन कार्मिक अधिकारियों से बहुत पीछे है।

सर्वोच्च स्तर पर डीजी/एचआर और एएम/स्टाफ के पद पर जो दो लोग बैठे हैं, उन्होंने जिंदगी में कभी काम नहीं किया। परंतु “वेल-कनेक्टेड” रहकर हमेशा प्राइम पोस्टिंग अवश्य लेते रहे। दोनों पति-पत्नी हैं, इसलिए “हम तो भए कोतवाल, हमारी लुगाई भई कोतवालन, अब डर काहे का”। तारीफ यह है कि कोतवाल साहब यूनियन/फेडरेशन के शीर्ष नेताओं की जी-हजूरी और राजनीतिक पहुंच के जरिए हमेशा दिल्ली में रहकर अपने अब तक के सबसे बड़े निकम्मे/भ्रष्ट ओएसडी के भरोसे अपना सेवाकाल अगले महीने मार्च में पूरा कर रहे हैं। कोतवाल साहब काम करना तो पाप समझते हैं!

वहीं उनकी कोतवालन उनके दम पर मौज करती रहीं। वह कभी बीमार-आजार नहीं हुईं, न आज तक कोई छुट्टी ली है। अब ये बात अलग है कि अस्पताल में महीनों भर्ती रहीं, भुगतान रेलवे के खाते से हुआ, पर हाजिरी लगाने हर दिन कार्यालय आती रहीं, वह भी एक-दो घंटे के लिए, जिससे कोई कुछ कह न सके। आज भी उनका यही रूटीन बदस्तूर जारी है। जिंदगी में कभी एक भी पीएनएम नहीं किया। तथापि कोतवाल साहब आजकल अपनी कोतवालन को अपनी जगह डीजी/एचआर बनाकर जाने की उधेड़बुन में लगे हैं। अब इससे ज्यादा अ-कर्मठ कोई नहीं हो सकता! भारत सरकार का शायद ही कोई मंत्रालय होगा जहां ऑफिस में पति बॉस हो और उसकी ही पत्नी उसकी सबार्डिनेट!

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सीनियर डीपीओ/फिरोजपुर, सीनियर डीपीओ/लखनऊ/उ.रे., सीनियर डीपीओ/लखनऊ/पूर्वोत्तर रेलवे आदि कुछ नाम कमाने वाले कार्मिक अधिकारियों के कारनामे अभी बहुत पुराने नहीं हुए हैं। ऐसे हजारों उदाहरण भरे पड़े हैं।

किसी भी कर्मचारी-अधिकारी का सर्विस रिकॉर्ड कभी अप-टू-डेट नहीं रखते ये कार्मिक अधिकारी! रिटायरमेंट के समय हर कागज, सर्कुलर आदि कर्मचारी-अधिकारी से ही लाने को कहा जाता है। तथापि फाइल को आगे बढ़ाने में भी कर्मचारी-अधिकारी को इनकी चिरौरी-विनती करनी पड़ती है या फिर चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है।

कोर्ट/कैट के निर्णय लागू न करने में कार्मिक अधिकारियों को सर्वोच्च महारत हासिल है। एक कैडर के लिए कोर्ट द्वारा दिया गया निर्णय उस पूरे कैडर के कर्मचारियों-अधिकारियों पर लागू होता है, परंतु ये निकम्मे-कामचोर कार्मिक अधिकारी हरेक कर्मचारी से कहते हैं कि “वह भी जाकर पहले अपने फेवर में वैसा ही कोर्ट का आदेश लेकर आए।”

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला संपूर्ण भारत गणराज्य पर लागू होता है, मगर भारतीय रेल के कार्मिक अधिकारी तो सर्वोच्च न्यायालय से भी सर्वोच्च हैं। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि अदालत छोटी है, या बड़ी, वह तो कोर्ट का आदेश ले आओ, जैसा टका सा बेशर्म जवाब देकर छुट्टी पा जाते हैं। तथापि कोर्ट का आदेश लागू करने में भी भयंकर हीलाहवाली करते हैं। एक तरफ कर्मचारियों का पैसा और समय बरबाद होता है, तो दूसरी तरफ इनके नाकारेपन के कारण अदालतों में सरकार के खिलाफ सरकारी कर्मचारियों द्वारा ही लाखों मुकदमों का अंबार लगता जाता है।

नाकारेपन का एक और ताजा उदाहरण

कार्मिक विभाग के इस तमाम निकम्मेपन का एक और ताजा उदाहरण यह है कि पटना कैट ने 24.09.2020 को कैडर मर्जर पर वर्ष 2013 के निर्णय को लागू करने का आदेश दिया था। पूर्व मध्य रेलवे के कार्मिक विभाग की अकर्मण्यता यह है कि पहले तो बोर्ड का निर्णय लागू नहीं किया, जबकि लागू करने में कोई रुकावट नहीं थी, परंतु नहीं किया। अंततः 8-9 कर्मचारी मिलकर कैट से उक्त निर्णय लागू करने के फेवर में आदेश ले आए, फिर भी अब तक उस आदेश का पालन नहीं किया गया है। कर्मचारी न्याय के लिए आखिर अब कहां जाएं?

पूर्व मध्य रेलवे कार्मिक प्रशासन का सौतेला व्यवहार एवं अकर्मण्यता इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि वह कर्मचारियों की बात तो क्या, कोर्ट के निर्णय को भी नहीं मानता। कैट ने मात्र दस दिन में दिए गए फैसले पर दस सप्ताह में निर्णय लेने का आदेश दिया था, जो कि तथाकथित दक्ष कार्मिक अधिकारी आज बीस सप्ताह यानि पांच महीनों में भी नहीं ले पाए हैं। समयावधि बीत गई, लेकिन पूर्व मध्य रेलवे प्रशासन नींद में और क्षेत्रीय जातिवादी राजनीतिक दवाब में मामले को 7 वर्ष (2013) से लटकाया हुआ है। क्रमशः

कैट/पटना का निर्णय

Sanjiv Kr Trivedi & Others Vs UOI & Others

ORDER [ORAL]

Per Sunil Kumar Sinha, Member Admn.):- Heard. It is worth noting that instant OA filed on 14.09.2020 on behalf of eight applicants.

2. Applicants have prayed to direct the respondents to implement their decision, taken in August 2013 for merger of Stenographer cadre at Carriage Repair Workshop (CRVW) Harnaut with the Headquarter office Unit at Hajipur. That said decision of merger regarding other categories has since been implemented but qua Stenographer, it still remained unimplemented despite several representations to the concerned authorities. The applicants have also prayed for directions to the respondents to fix their seniority amongst the employees at Hqr. Office Unit and grant all consequential benefits. 

3. Advance copy of the OA was served upon the counsel for respondents and when the matter came on Board for first time on 22.09.2020, it was pointed out that there is no peroper petition to allow to file joint application and thus, on request matter was adjourned for today.

4. MA No. 119/2020 in the OA was filed on 23.09.2020 to allow the applicants to file the OA jointly. Heard qua MA and the OA. The counsel for respondents has no objection to the MA. Accordingly ative ? inistrat, Admin MA is allowed. Learned counsel for the Patna Benc applicants submits that the decision taken on 16.08.2013 and 18.10.2013 has been implemented for employees of other categories but applicants have been deprived naj and due to this, applicants are suffering from monetary losses as their juniors are promoted and working in Hajipur. In this regard, applicants have submitted representations to respondent no. 1 for redressal of their grievance.

5. Learned counsel for applicants submits that applicants will be satisfied if the respondent no. 1 may be directed to dispose of the pending representation of the applicant annexed as Annexure A/8 by passing a reasoned and speaking order within a time frame stipulated in the order.

6. Learned counsel for the respondents submits that he has no objection if the respondents are directed to decide the pending representation of the applicants. 

7. Considered the submissions of the counsels and material on record. The applicants working as Steno-1/Steno/Confidential Assistant were appointed at different Railway Units and they opted for transfer to the newly created CRW at Harnaut in view of the Administrative notification dated 17.11.2005 and 01.02.2010. The notification mentioned that the seniority and lien of ative dminisg the officers joining CRW Harnaut will be maintained at their parent unit till closure of cadre at CRW. Approaching closure of the cadre at atna Benc CRW, the respondents called a joint meeting of the Railway Officials and Office bearers of the Railway Union (ECRKw) on 16.08.2003 to finalize the status of various cadres. In the meeting, it was inter alia decided that Stenographer cadre would be merged with the Headquarter Office Unit at Hajipur. The minutes of the meeting was approved by the G.M. Office, Hajipur on 18.10.2013. The merger of other cadres as stipulated in the minutes has been effected since then but the merger of Stenographer cadre with the Hqr. (Office) Unit has remained unimplemented despite several representations

by the applicants. As the cadre of CRW has been closed, the lien and seniority maintained with their parent units have also ceased to exist after 30.09.2013 when the CRW cadre got closed. 

8. It is felt that interest of justice will be served if the respondents take an early decision on the representation of the applicants. Accordingly, the OA is disposed of with direction to respondent no. 1 to decide on the pending representation of the applicants dated 06.02.2020 (Annexure A/8 of the OA) by passing a reasoned and speaking order within ten weeks. 

9. OA stands disposed of. No costs.