विदाई का ‘महा-उत्सव’: रेल भवन की कुंभकर्णी नींद और पूर्व मध्य रेल का खुला दरबार
“भ्रष्टाचार–मुक्त रेल” का सब्जबाग दिखाकर अंततः इसे पूरी तरह “भ्रष्टाचार–युक्त रेल” में परिवर्तित करने के लिए सरकार, माननीय मंत्री जी और उनके सिपहसालार निःसंदेह बधाई के पात्र हैं!
हाजीपुर: सोनपुर और धनबाद में ‘वसूली एवं उगाही महाभियान’ की अप्रत्याशित और चमत्कारी सफलता के बाद सेवानिवृत्ति की कगार पर खड़े पूर्व मध्य रेलवे (#ECR) के महाप्रबंधक महोदय का हौसला सातवें आसमान पर है। हौसला बुलंद हो भी क्यों न? जब उन्हें भली-भाँति ज्ञात है कि दिल्ली के रेल भवन की दूसरी और तीसरी मंजिल के वातानुकूलित कमरों में विराजमान ‘परम पूज्य महान आत्माओं’ को सब कुछ साफ़-साफ़ दिखाई भी दे रहा है और सुनाई भी पड़ रहा है। विडंबना यह है कि उन आत्माओं के भीतर इतनी भी न्यूनतम नैतिक चेतना या रीढ़ की हड्डी बची ही नहीं है कि वे इस तरह के खुले कदाचार, संस्थागत लूट और पतन पर नकेल कस सकें या कम से कम एक अदद सवाल ही पूछने की जहमत उठा सकें।
बीते पंद्रह दिनों में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (#CBI) ने लगातार छापे मारकर भारतीय रेल की कार्यप्रणाली, तथाकथित पारदर्शिता और आकंठ रिश्वतखोरी में डूबे तंत्र की पूरी कलई खोलकर जनता के सामने रख दी है। इसके बावजूद रेल भवन की मोटी चमड़ी वाले हुक्मरानों की सेहत पर रत्ती भर भी कोई असर नहीं पड़ रहा। आम रेलकर्मियों और जनता के बीच अब यह निराशाजनक स्वर गूँजने लगा है कि मौजूदा व्यवस्था से किसी शुचिता की उम्मीद रखना ही सबसे बड़ा मुगालता है। जो तंत्र अपनी आँखों के ठीक सामने पनपते सुनियोजित भ्रष्टाचार को देखकर भी अनदेखा कर दे, और लगातार होते सीबीआई छापों के बाद भी जिसके कानों पर जूँ तक न रेंगे, उससे किसी सुधार की आशा करना पूरी तरह बेमानी और आत्मघाती है।
रेलवे जोनों में महाप्रबंधक और विभाग प्रमुखों (#PHOD) जैसे शीर्ष पदों पर आसीन साहबान सरकारी मशीनरी और संसाधनों का जिस निर्लज्जता से निजी जागीर की तरह दुरुपयोग कर रहे हैं, वह अभूतपूर्व है। गरीब जनता की गाढ़ी कमाई और करदाताओं के पैसे को अपनी विदाई पार्टियों, विलासिता और ऐशो-आराम पर पानी की तरह बहाया जा रहा है। यदि शीर्ष स्तर पर बैठा रेल प्रशासन इसे गंभीर कदाचार और अपराध की श्रेणी में नहीं गिनता, तो यह मान लेने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि पूरी व्यवस्था का नैतिक और प्रशासनिक पतन पूर्ण रूप से हो चुका है।
अब इस सुव्यवस्थित ‘उगाही यात्रा’ का अगला पड़ाव समस्तीपुर मंडल बनने जा रहा है। समस्तीपुर मंडल में अभी कुछ ही दिन पहले सीबीआई ने एक अधिकारी को रंगेहाथ धर दबोचा था। यह मामला अपने आप में अनोखा और चौंकाने वाला इसलिए था, क्योंकि यहाँ किसी बाहरी ठेकेदार ने नहीं, बल्कि अपने ही विभाग के एक पीड़ित कर्मचारी ने त्रस्त होकर अधिकारी की शिकायत सीधे सीबीआई से कर दी थी।
कार्मिक विभाग का चरित्र तो ऐसा बन चुका है मानो कफन से पैसे चुराने और बेबस-लाचार कर्मचारियों की खाल तक नोच लेने में ही इनकी सार्थकता बची हो। पूर्व मध्य रेल में इस विभाग की दुर्दशा का परिदृश्य यह है कि इसका मुख्य कार्य केवल कर्मचारियों का मानसिक और आर्थिक शोषण करना और समय-समय पर नाच-गाने तथा जलसों का आयोजन कर डीआरएम और जीएम का दिल बहलाना ही रह गया है। हाजीपुर मुख्यालय के शीर्ष कार्मिक अधिकारियों से लेकर मंडलों में कुंडली मारकर बैठे ब्रांच अधिकारियों तक—पूरी मंडली दिन-रात केवल इस चिंतन-मंथन में जुटी रहती है कि शोषण के नए-नए कौन-से रास्ते खोजे जाएँ, धनार्जन के कौन-से अनूठे तरीके गढ़े जाएँ और फिर पूरी धूर्तता से उन्हें अमल में लाकर जेबें कैसे भरी जाएँ।
समस्तीपुर में भी वही चिर-परिचित तमाशा दोहराया जाएगा। महाप्रबंधक सपरिवार पधारेंगे, विभाग प्रमुख अपनी-अपनी लुगाईयों के साथ लाव-लश्कर लेकर पिकनिक, दावत और आमोद-प्रमोद के लिए सरकारी तंत्र, गाड़ियों और कर्मचारियों को झोंक देंगे। उनके दुस्साहस का चरम पर होना स्वाभाविक है, क्योंकि उन्हें बखूबी पता है कि रेलवे बोर्ड में बैठे रीढ़विहीन और लाचार नीति-नियंताओं में न तो सच सुनने का माद्दा है और न ही कुछ बोलने का साहस।
पूर्व मध्य रेलवे में भ्रष्टाचार अब कोई अपराध नहीं, बल्कि एक अनिवार्य ‘शिष्टाचार’ और परंपरा बन चुका है; यहाँ नियमबद्ध और ईमानदार काम होना घोर आश्चर्य का विषय माना जाता है। अब देखना बस यह बाकी है कि विदाई के नाम पर स्थापित ‘लूट और चढ़ावे’ के पुराने कीर्तिमान ध्वस्त हो पाते हैं या नहीं, हालांकि इसकी संभावना भी नगण्य ही है।
यह पूरा तमाशा रेलवे बोर्ड, नीति-निर्माताओं और शीर्ष नेतृत्व की नीतिगत बेचारगी और नैतिक शून्यता का जीता-जागता प्रमाण है। “भ्रष्टाचार-मुक्त रेल” का सब्जबाग दिखाकर अंततः इसे पूरी तरह “भ्रष्टाचार-युक्त रेल” में परिवर्तित करने के लिए सरकार, माननीय मंत्री जी और उनके सिपहसालार निःसंदेह बधाई के पात्र हैं!

