आरपीएफ की विशिष्ट कार्यप्रणाली पर भारी पड़ता ‘टीएमएम’: अटके तबादलों से संकट में बल सदस्यों के बच्चों का भविष्य
रेलसमाचार ब्यूरो, नई दिल्ली: रेलवे सुरक्षा बल (#RPF) में पारदर्शिता लाने और स्थानांतरण प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के उद्देश्य से लागू किया गया डिजिटल ‘ट्रांसफर मैनेजमेंट मॉड्यूल’ (#TMM) अब बल के धरातलीय यथार्थ और प्रशासनिक तालमेल के अभाव के कारण स्वयं एक गंभीर संकट का रूप ले चुका है। फरवरी और मार्च 2026 में प्रस्तावित वार्षिक टेन्योर (कार्यकाल) स्थानांतरण जून 2026 की शुरुआत तक भी पूरे नहीं हो सके हैं। इस अभूतपूर्व प्रशासनिक देरी ने न केवल बल सदस्यों को गंभीर मानसिक और आर्थिक दुविधा में डाल दिया है, बल्कि अप्रैल से नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के कारण उनके बच्चों के भविष्य पर भी गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
अर्धसैनिक ढ़ांचे का अंधानुकरण: आरपीएफ की व्यावहारिक जरूरतों की अनदेखी
बल के जानकारों और कर्मचारियों का स्पष्ट मानना है कि वर्तमान ट्रांसफर मैनेजमेंट मॉड्यूल (TMM) का बुनियादी सिस्टम मुख्य रूप से सीमा सुरक्षा बल (#BSF) और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (#CRPF) जैसे अर्धसैनिक बलों की संगठनात्मक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। अर्धसैनिक बलों में स्थानांतरण की प्रक्रिया सामान्यतः पूरी बटालियन के स्तर पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर होती है, जो कि अपेक्षाकृत सरल और सामूहिक होती है।
इसके विपरीत, आरपीएफ की संरचना, कार्यप्रणाली और परिचालन की जिम्मेदारियां पूरी तरह से भिन्न और अत्यधिक जटिल हैं। एक पुलिस संगठन के समरूप कार्य करने वाले आरपीएफ को रेल परिचालन के समानांतर जोन, मंडल, पोस्ट, चौकी, एस्कॉर्टिंग ड्यूटी, क्राइम इंटेलिजेंस ब्रांच (#CIB), स्पेशल इंटेलिजेंस और रिजर्व लाइन जैसे संवेदनशील और विविध स्तरों पर मानव संसाधन का प्रबंधन करना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर अपराध नियंत्रण, कानून-व्यवस्था बनाए रखना, खुफिया सूचनाओं का संकलन और करोड़ों रेल यात्रियों के साथ-साथ रेल संपत्ति की सुरक्षा जैसे कार्यों के लिए अत्यंत व्यावहारिक और त्वरित निर्णय लेने की आवश्यकता होती है।
यही कारण है कि पूर्व में कई स्तरों पर ऑनलाइन स्थानांतरण सिस्टम को लेकर लंबी चर्चाएं हुईं, परंतु धरातलीय व्यावहारिकताओं के कारण इसे टाल दिया गया। वर्तमान में टीएमएम लागू होने के बाद से लगातार आ रही तकनीकी बाधाएं, डेटा विसंगतियां और स्थानांतरण सूचियों में बार-बार किए जा रहे संशोधन यह स्पष्ट प्रमाणित करते हैं कि यह सिस्टम आरपीएफ की विशिष्ट संगठनात्मक संरचना के अनुकूल नहीं बैठ पा रही है।
शैक्षणिक सत्र की शुरुआत और परिवारों पर दोहरी आर्थिक मार
देशभर में अधिकांश स्कूलों और कॉलेजों का नया शैक्षणिक सत्र अप्रैल 2026 से प्रारंभ हो चुका है। स्थानांतरण आदेशों में हो रहे अत्यधिक विलंब और अनिश्चितता के कारण आरपीएफ कर्मियों को विवश होकर अपने बच्चों का दाखिला वर्तमान कार्यस्थल के विद्यालयों में ही कराना पड़ा है। इसके लिए कर्मचारियों ने अपनी सीमित आय से प्रवेश शुल्क, वार्षिक विकास शुल्क, पुस्तकें, यूनिफॉर्म और अन्य आवश्यक शैक्षणिक मदों में भारी धनराशि व्यय कर दी है।
यदि अब इस बीच सत्र में स्थानांतरण आदेश जारी किए जाते हैं, तो कर्मचारियों को तत्काल सरकारी आवास खाली करना होगा। नए स्थानों पर जाने पर सबसे बड़ी चुनौती बच्चों की पढ़ाई के बीच में बाधित होने की होगी। अधिकांश प्रतिष्ठित और केंद्रीय विद्यालयों में सीटें सीमित होने के कारण इस समय प्रवेश प्रक्रिया बंद हो चुकी है। ऐसे में नए स्थान पर उपयुक्त विद्यालयों में दाखिला मिलना लगभग असंभव है। कई मामलों में विवश माता-पिता से भारी ‘डोनेशन’ या अत्यधिक शुल्क की मांग की जा रही है, जो एक मध्यमवर्गीय रेल सुरक्षाकर्मी की आर्थिक क्षमता से परे है। इसके अतिरिक्त, वर्तमान स्कूलों द्वारा जमा की जा चुकी भारी-भरकम फीस वापस नहीं की जाती, जिससे कर्मचारियों पर दोहरी आर्थिक मार पड़ रही है।
बढ़ता प्रशासनिक और वित्तीय बोझ
प्रशासनिक विशेषज्ञों का आकलन है कि जून का महीना शुरू होने और नया शैक्षणिक सत्र पूर्णतः स्थापित हो जाने के बाद यदि बल सदस्यों का स्थानांतरण किया जाता है, तो यह निर्णय न केवल कर्मचारियों के परिवारों को उजाड़ेगा, बल्कि सरकारी खजाने पर भी भारी वित्तीय बोझ डालेगा। इसके कारण रेलवे को करोड़ों रुपये का अतिरिक्त ट्रांसफर अलाउंस (TA), यात्रा व्यय, और आकस्मिक प्रशासनिक खर्च वहन करना पड़ेगा, जिसे समय पर निर्णय लेकर पूरी तरह से बचाया जा सकता था।
मनोबल और मानवीय दृष्टिकोण का अभाव: नीतिगत सुधार की आवश्यकता
सुरक्षा बलों के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, किसी भी अनुशासित संगठन का मनोबल केवल उसकी ड्यूटी की परिस्थितियों से नहीं, बल्कि कर्मचारियों के पारिवारिक स्थायित्व और मानसिक शांति से तय होता है। यदि 24 घंटे संवेदनशील ड्यूटी पर तैनात रहने वाला जवान अपने बच्चों की शिक्षा और परिवार के बिखरने की चिंताओं से घिरा रहेगा, तो इसका सीधा और गंभीर प्रभाव उसकी कार्यक्षमता और बल की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ना तय है।
डिजिटल और पारदर्शी व्यवस्थाएं निश्चित रूप से स्वागत योग्य कदम हैं, लेकिन किसी भी प्रशासनिक सुधार की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह मानवीय संवेदनाओं और धरातलीय यथार्थ के प्रति कितनी संवेदनशील है। आरपीएफ के त्रस्त बल सदस्यों ने शीर्ष प्रशासन से गुहार लगाई है कि टीएमएम सिस्टम को केवल एक सॉफ्टवेयर न मानकर इसे व्यावहारिक, समयबद्ध और संवेदनशील बनाया जाए, ताकि भविष्य में यह प्रक्रियाएं हर हाल में शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले ही संपन्न कर ली जाएं।
न्यायोचित समाधान: इस वर्ष के तबादले स्थगित करने की मांग
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए कर्मचारी हित, प्रशासनिक व्यावहारिकता और राजकोषीय मितव्ययिता (वित्तीय बचत) की मांग है कि एक ठोस और संवेदनशील निर्णय लिया जाए। चूंकि सत्र काफी आगे निकल चुका है, अतः वर्ष 2026 के इन लंबित टेन्योर स्थानांतरणों को आगामी 6 महीने अथवा अगले पूरे शैक्षणिक सत्र तक के लिए तत्काल प्रभाव से स्थगित या निरस्त किया जाना ही एकमात्र न्यायसंगत और व्यावहारिक उपाय प्रतीत होता है। रेलवे बोर्ड और आरपीएफ महानिदेशालय को इस गंभीर विसंगति पर तत्काल संज्ञान लेते हुए एक स्पष्ट और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, ताकि बल सदस्यों का संगठन पर विश्वास बना रहे और वे बिना किसी मानसिक तनाव के देश की जीवनरेखा की सुरक्षा में अपना योगदान दे सकें।

