होटगी प्रकरण: आत्महत्या का प्रयास—ये कैसी लड़ाई वर्चस्व की?
AISMA का आरोप है कि DRM, ADRM, Sr.DSO और ADSO ने दबाव बनाया। हमने चारों नाम जाँचे। जो निकला, वह आरोप की पुष्टि नहीं करता!
जिस मंडल का ऑपरेटिंग विभाग न मिट्टी के तेल का इंडेंट लगाता है, न पीने के पानी का, वहाँ दबाव अधिकारियों का है या व्यवस्था का?
मध्य रेलवे, सोलापुर मंडल के होटगी रेलवे स्टेशन के सुपरवाइजर स्टेशन मास्टर सत्येंद्र नारायण सिंह 11 तारीख को घर से सोलापुर ड्यूटी के लिए निकले थे। उन्हें एक हफ्ते की ट्रेनिंग पर जाना था। वे सोलापुर नहीं पहुँचे। वे होटगी में ही कवच (#Kavach) के टावर पर चढ़ गए। मंडल रेल प्रबंधक (#DRM) स्वयं मौके पर पहुँचे, उनके परिवार से बात की, फिर सत्येंद्र नारायण सिंह से बात की, और तब जाकर वे नीचे उतरे।
अखिल भारतीय स्टेशन मास्टर संघ (#AISMA) के एक सदस्य ने हमें इस घटना का फीडबैक भेजा और निष्पक्ष जाँच की माँग की। फीडबैक में नाम भी थे: DRM, अपर मंडल रेल प्रबंधक (#ADRM), वरिष्ठ मंडल संरक्षा अधिकारी (Sr.DSO) और सहायक मंडल संरक्षा अधिकारी (#ADSO), आरोप यह कि इन्हीं चारों अधिकारियों के दबाव ने नौबत यहाँ तक पहुँचाई। मामला गंभीर था। हमने मध्य रेल के विभिन्न ऑपरेटिंग, इलेक्ट्रिकल (#TRD) और इंजीनियरिंग विभागों के अधिकारियों तथा पर्यवेक्षकों से बात की और चारों नाम अलग-अलग जाँचे। इस तरह जो परिदृश्य सामने आया, वह एक आदमी के टूटने का भी है, और एक विभाग के कामकाज करने के तरीके का भी।
होटगी: छोटा स्टेशन, बड़ा भार
सोलापुर मंडल का होटगी रेलवे स्टेशन परिचालन की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्टेशन है। यहाँ कई सीमेंट साइडिंग हैं, #NTPC का एक बड़ा बिजलीघर है, और दक्षिण पश्चिम रेलवे (#SWR) से इंटरचेंज भी यहीं होता है। यानि जो स्टेशन नक्शे पर छोटा दिखता है, वह लोडिंग, अर्निंग और इंटरचेंज तीनों में मंडल के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
ट्रेनिंग की जड़: वह रात, जब होटगी अंधेरे में डूबा
कुछ हफ्ते पहले होटगी स्टेशन में पूर्ण अंधकार हो गया। इस घटना का संज्ञान स्वयं रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष (#CRB) ने लिया और सीधे जवाब तलब कर लिया। पता चला कि स्टेशन की प्रांतीय पावर सप्लाई में लंबी फेलियर हुई, #UPS की बैटरी डिस्चार्ज हो गई, आईटी उपकरण बंद हो गए और कॉशन ऑर्डर तक नहीं छप पाए।
आगे जो पता चला, वह और गंभीर है। इसी स्थिति के लिए होटगी स्टेशन पर मिट्टी के तेल का एक छोटा जनरेटर रखा गया था। लेकिन स्टेशन के ऑपरेटिंग सुपरवाइजर का मानना था कि जनरेटर चलाना उनकी जिम्मेदारी ही नहीं है। और तो और, मंडल के इस महान ऑपरेटिंग सुपरवाइजर ने मिट्टी के तेल का इंडेंट ही नहीं दिया था। आनन-फानन में इंडेंट बना, निकटवर्ती कुर्दुवाडी वर्कशॉप से मिट्टी का तेल पहुँचा, और जनरेटर चलाकर दिखाया गया।
ऑपरेटिंग सुपरवाइजर को मंडल के शीर्ष अधिकारियों से डाँट सुननी पड़ी कि छोटे स्टेशनों पर छोटे जनरेटर चलाने की जिम्मेदारी ऑपरेटिंग की ही है, क्योंकि निकटस्थ इलेक्ट्रिकल जनरल वाले को पहुँचने में घंटों लग सकते हैं। मामला #CRB और महाप्रबंधक (#GM) के संज्ञान में था, इसलिए बात समझ ली गई। ADRM की नाराजगी इसी बात पर रही कि Sr.DOM ने समय पर इंडेंट क्यों नहीं डाले और होंडा जनरेटर—मंडल में छोटे जनरेटर को होंडा ही कहा जाता है—चलाने के निर्देश क्यों नहीं दिए।
सेफ्टी इंस्पेक्शन और आइसोलेटर का पुराना झगड़ा
जून के आखिरी हफ्ते में ADSO ने होटगी स्टेशन का औचक निरीक्षण किया, जिसमें गंभीर अनियमितताएँ पाई गईं—चिंता इस बात की थी कि पॉवर ब्लॉक देने और कैंसिल करने की तय प्रक्रिया का पालन नहीं हो रहा था। उसी दिन ब्लॉक इंस्ट्रूमेंट के अनसेफ ऑपरेशन का मामला भी सामने आ गया।
उन्हीं दिनों मंडल के ऑपरेटिंग सुपरवाइजरों के व्हाट्सऐप ग्रुपों में एक सवाल घूम रहा था: क्या पॉइंट्समैन को आइसोलेटर ऑपरेट करना चाहिए? स्टेशन वर्किंग रूल देखने वाले एक ट्रैफिक इंस्पेक्टर (टीआई), जो मंडल मुख्यालय में दशकों से जमे हैं, का कहना था कि ऑपरेटिंग स्टाफ इसे केवल इमरजेंसी में ही ऑपरेट करेगा। पता चला कि यह विषय कुछ नेता-टाइप टीआई और स्टेशन मास्टर हर नए Sr.DOM की पोस्टिंग पर उठाते रहे हैं, और हर बार इन्हें समझाया गया कि यह पोजीशन #G&SR और #ACTM के अनुरूप नहीं है।
#RailSamachar ने जब इसकी जानकारी ली तो यही निकला। यह कहना कि ऑपरेटिंग स्टाफ केवल इमरजेंसी में आइसोलेटर ऑपरेट करेगा, नियम के अनुसार नहीं है। S.R. 17.03-4(2)(सी) और S.R. 17.02-10(11) इस स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट कर देते हैं।
चार्जशीट नहीं, छह दिन की ट्रेनिंग
इसी परिप्रेक्ष्य में मंडल के अधिकारियों ने तय किया कि इन सीनियर सुपरवाइजरों को “a structured refresher on RE operating procedures, with specific focus on isolator operation, planned power block working, and the hierarchy of extant instructions” कराया जाए। Sr.DSO, Sr.DEE/TRD और Sr.DOM की सहमति तथा ADRM के अनुमोदन से छह दिन का थ्योरी और प्रैक्टिकल कोर्स चालू करवाया गया।
और फिर, ट्रेनिंग के तीसरे दिन
दो में से एक सुपरवाइजर ऐब्सकांडिंग हो गए, यानि फरार। दूसरे, सत्येंद्र नारायण सिंह, तीसरे दिन कवच टावर पर चढ़ गए। इससे पहले कि बात अधिकारियों तक पहुँचती, वह स्थानीय मीडिया तक पहुँच चुकी थी। मौके पर #RPF, स्थानीय पुलिस, #CISF, फायर ब्रिगेड, एम्बुलेंस और डॉक्टर, सब पहुँच गए। सत्येंद्र नारायण सिंह ने न Sr.DOM की बात मानी, न DSC/RPF की सुनी। अंततः DRM स्वयं पहुँचे, परिवार और सत्येंद्र सिंह से बात की, और उन्हें नीचे उतारा। ये पता चला कि सत्येंद्र और कई स्टेशन मास्टर इरिटम लखनऊ में DRM के स्टूडेंट रहे हैं और इस नाते इनका आपस में सीधा संवाद भी रहा है।
इस प्रकरण में AISMA का पुणे चैप्टर बहुत सक्रिय हुआ और होम सिग्नल पर सभी गाड़ियाँ पाँच मिनट रोकने की जिद करने लगा। खैर, सत्येंद्र सिंह टावर से उतर गए।
आरोप और जाँच: लड़ाई सेफ्टी और ऑपरेटिंग की
अब उस आरोप पर आइए, जिससे यह पूरी बात शुरू हुई। पता चला कि सोलापुर मंडल मुख्यालय में ऑपरेटिंग विभाग—सेफ्टी इंस्पेक्शन से सख्त नाराज है।
यह भी पता चला कि Sr.DSO हर जगह पहुँच जाते हैं। उनकी टीम ने सॉफ्टवेयर के जरिए पूरे मंडल के इंस्पेक्शन और कमियों का अच्छा-खासा डेटाबेस बना रखा है। इससे रेल की उस पुरानी बीमारी का इलाज हो गया, जिसे यहाँ हर कोई जानता है: आज कहानी सुना दो, कल कौन याद रखेगा। पहले इंजीनियरिंग और S&T, और अब ऑपरेटिंग, सभी उनसे या तो डरते हैं या नाराज रहते हैं। जानकारों का कहना है कि यदि सेफ्टी के अधिकारी यारी-दोस्ती में नहीं हैं और लोगों को खुश रखने में व्यस्त नहीं हैं, तो वे अपना काम ठीक से कर रहे हैं।
लेकिन बताया गया कि Sr.DOM इसे अपनी हेठी समझते हैं। ADSO—जो स्वयं ट्रैफिक से हैं और जिनके विरुद्ध AISMA ने भी नाराजगी जाहिर की है—को वे बुलाकर कई बार डाँट चुके हैं कि ज्यादा इंस्पेक्शन कर ऑपरेटिंग की कमियाँ न निकाली जाएँ—क्योंकि ये फिर महाप्रबंधक की सेफ्टी मीटिंग में आ जाती हैं और DRM के संज्ञान में भी। इस बात पर पहले विवाद भी हो चुका है। सूत्रों का कहना है कि सेफ्टी ब्रांच को DRM का पूरा संरक्षण है, इसीलिए सेफ्टी काउंसलर और ADSO खुलकर काम करने की कोशिश करते हैं। होटगी प्रकरण ने सेफ्टी और ऑपरेटिंग को फिर आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया है।
सूत्र बताते हैं कि इंस्पेक्शन में पाई गई कमियों अर्थात गलतियों को डेटाबेस में डालकर उनका फॉलोअप करना पुराने चावलों को बहुत अखरता है। ऑपरेटिंग के कई सुपरवाइजरों का कहना है कि उनका कैडर पढ़ने-लिखने वालों का है, इसलिए ईर्ष्यावश उन्हें टारगेट किया जाता है।
हमने जब इस बारे में जाँच-पड़ताल की, तो पता चला कि सेफ्टी ब्रांच ने ऑपरेटिंग की बनिस्बत इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रिकल जनरल की ज्यादा कमियाँ निकाली हैं। यानि टारगेट किए जाने का आरोप तथ्यों के सामने टिक नहीं पाया।
DRM/ADRM पर लगे आरोप कहाँ टिकते हैं?
यह भी पता चला कि भाई लोगों ने DRM की भी शिकायत की है। लेकिन इस पर लगभग सभी एक सुर में थे: DRM ने जॉइन करने के बाद एक भी त्यौहार या पार्टी न घर पर मनाई, न क्लब में। हर बार वे उन्हीं स्टेशनों पर गए, जहाँ उनके स्टेशन मास्टर छुट्टी के दिन ड्यूटी कर रहे थे। ऐसे में DRM द्वारा स्टेशन मास्टरों को टारगेट किए जाने की बात भी ठीक प्रतीत नहीं होती।
ADRM का मामला भी देख लें। CRB द्वारा जनरेटर न चलने पर संज्ञान लिए जाने के बाद उन्होंने व्यवस्था टाइट की, तेल का तत्काल इंडेंट डलवाया, निकटवर्ती वर्कशॉप से तेल भेजा गया, और सूत्र बताते हैं कि इस दौरान संबंधित लोगों की क्लास भी ली गई। ब्लॉक की मीटिंग वे रोज लेते हैं। कॉरिडोर ब्लॉक को इम्प्लीमेंट करने का उनका प्रयास मंडल और जोन, दोनों के ऑपरेटिंग अधिकारियों को नहीं भाता। सूत्रों ने तो यह भी बताया कि जब महाप्रबंधक ने स्वयं कॉरिडोर ब्लॉक न दिए जाने पर नाराजगी जताई, तब जाकर स्थिति थोड़ी सुधरी। ADRM ऑपरेटिंग में अपनी ब्लॉक मीटिंग और इंजीनियरिंग मशीन वर्किंग के कारण अनपॉपुलर हैं। उनके इस काम को ऑपरेटिंग को टारगेट करने से जोड़कर देखना, वेरिफिकेशन में गलत निकला है।
हमारा निष्कर्ष यह है कि इंस्पेक्शन से कोई दबाव नहीं बनता। दबाव तब बनता है, जब कमी पकड़े जाने पर उसे सुधारने के बजाय पकड़ने वाले को बुलाकर डाँटा जाए।
पृष्ठभूमि: छाया ऑपरेटिंग विभाग की है!
पूरे प्रकरण में ऑपरेटिंग विभाग की गहरी छाया दिखाई देती है। मंडल की ऑपरेटिंग ब्रांच में तेजी से हो रहा श्रेणी-अंतरण (#decategorisation) इस विभाग की कार्यशैली और संस्कृति पर बड़े प्रश्न खड़े करता है।
सत्येंद्र सिंह के परिवार ने अधिकारियों को बताया कि वे तीव्र सिरदर्द के लिए अक्सर इंजेक्शन लेते थे। उन्हीं के नीचे एक और स्टेशन मास्टर दमे के मरीज हैं, और होटगी में कोयले तथा सीमेंट की धूल के कारण उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता। पता चला कि DRM ने Sr.DOM से जवाब तलब किया कि दमे के मरीज को सीमेंट साइडिंग में कैसे रखा जा सकता है?
स्टाफ की पोस्टिंग की स्थिति को भी देखें। सोलापुर मंडल में पिछले एक साल में तीन Sr.DOM बने हैं। इस विषय को मंडल रेल प्रबंधक ने मुख्यालय के समक्ष काफी कड़ाई से उठाया भी था। हमने जब यह पूछा तो उनका कहना था कि यह प्रशासनिक मैटर है, हेडक्वार्टर पूरे जोन को देखते हुए नियोजन करता है, इसमें कोई विशेष बात नहीं है। हालाँकि यह एक डिप्लोटिक जवाब है, जबकि हमारे सूत्रों ने बताया कि इस बात पर काफी कहा-सुनी हुई थी।
यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि मध्य रेल के ऑपरेटिंग और कमर्शियल विभागों में एक ही जगह लंबे समय से जोंक की तरह चिपके अधिकारियों और सुपरवाइजरों पर हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं:
08.02.2026: “सरकार किसी की भी, पर सिस्टम उनका—की उक्ति को चरितार्थ करते हैं ऐसे पोस्टिंग ऑर्डर”
06.02.2026: “रेल की खराब मोबिलिटी और गलत प्लानिंग के लिए सीधे जवाबदेह और जिम्मेदार है ऑपरेटिंग विभाग”
ऐसे नेतृत्व में, और सभी मंडलों में रोटेशन के अभाव में, पुराने ट्रैफिक इंस्पेक्टर और मूवमेंट इंस्पेक्टर पोस्टिंग को अपने पाश में जकड़े रहते हैं। ये अपने अधिकारियों को या तो अपनी जेब में रखते हैं, या उन्हें अपने बगल में लेकर चलते हैं। नया अधिकारी यदि दूसरे विभाग से समन्वय की इच्छा रखता भी है, तो आग लगाने के लिए ये पुराने जमे हुए लोग काफी होते हैं।
और वही कहानी, दोबारा: इंडेंट ही नहीं लगा
यह भी सुनने में आया कि स्टेशन मास्टर लंबे समय से साफ पानी की माँग कर रहे हैं। मंडल के इंजीनियरिंग के एक सूत्र ने बताया कि सभी विभागों ने अपने-अपने #RO लगवा लिए हैं, लेकिन ऑपरेटिंग का इंडेंट ही नहीं हुआ। यह कहानी कुछ मिट्टी के तेल जैसी ही है। न तेल का इंडेंट, न पानी का इंडेंट। यह किसी एक सुपरवाइजर की नाकामी नहीं, पूरा का पूरा विभागीय फेलियर है।
बात डिग्निटी की, यानि स्वाभिमान की
हमारा मानना है कि सभी का सम्मान और सभी के स्वाभिमान का आदर होना चाहिए। इंजीनियरिंग के एक सुपरवाइजर का कहना था कि जब उन्हें कई सौ लेबर के साथ घंटों धूप में खड़ा कर दिया जाता है और फिर ब्लॉक भी नहीं मिलता, तो क्या उनकी कोई इज्जत नहीं? लगभग सभी टेक्निकल विभागों के सुपरवाइजर इससे सहमत मिले। उनका कहना है कि उनके अधिकारी ऑपरेटिंग के सामने झुक जाते हैं, और उनके #PHOD मुख्यालय में #PCOM के सामने बात नहीं रखते।
निष्कर्ष
प्रशासन यदि चार्जशीट की जगह ट्रेनिंग देता है, तो इसका स्वागत होना चाहिए। यदि चार्जशीट ही उत्तर होती, तो रेल में हजारों की संख्या में रोज जारी हो रही हैं, फिर भी सेफ्टी की स्थिति यथावत है। वरिष्ठ अधिकारी इसे सकारात्मक मानते हैं। उनका कहना है कि गलत करने की सजा तो दे दी जाती है, लेकिन सही क्या है, यह कौन बताएगा? सोलापुर जैसे मंडल, जहाँ इलेक्ट्रिफिकेशन नया है, वहाँ रिफ्रेशर बेहद जरूरी हैं, खासकर तब जब पावर ब्लॉक और आइसोलेटर ऑपरेशन जैसी मूलभूत बातों पर सुपरवाइजरों में कन्फ्यूजन हो।
AISMA का चारों अधिकारियों पर दबाव बनाने का आरोप, हमारी जाँच-पड़ताल में टिका नहीं। इंस्पेक्शन को दबाव कहना और ट्रेनिंग को सजा बताना—दोनों ही गलत हैं। असली दबाव कहीं और से आता है: उस विभागीय संस्कृति से, जो न तेल का इंडेंट लगाती है, न पानी का, जो दमे के मरीज को धूल-धक्कड़ वाली सीमेंट साइडिंग पर बैठा देती है, और जो अपने ही स्टाफ को मरने के लिए अकेला छोड़ देती है।
यह भी पता चला कि मंडल के संपूर्ण विद्युतीकरण के बाद अनुशासन की आवश्यकता और बढ़ गई है। नए इलेक्ट्रिफाइड सेक्शनों में TRD में यार्डस्टिक से बहुत कम कर्मचारी, सुपरवाइजर और अधिकारी हैं। ऐसे में काम रोक देने से देश को रेल में इतने बड़े निवेश का पूरा लाभ नहीं मिलेगा। और सरकार की silo-less कार्यशैली के लिए आवश्यक है कि सब मिलकर काम करें। यह सभी विभाग प्रमुखों की सीधी जिम्मेदारी है।
नोट: उपरोक्त वस्तुस्थिति को पढ़ने के बाद भी यदि आप या आपके परिचित कैडर-बिरादर का मानसिक तनाव कम नहीं हुआ है, तो टेली-मानस हेल्पलाइन नंबर 14416 पर तुरंत संपर्क करें!

