रेलवे का नया ‘चिप’ प्रोजेक्ट: सुरक्षा या संगठित लूट?
दो धुलाई में चिप बेकार, अफसरों की चांदी लगातार!
RFID चिप—सुरक्षा तकनीक या करोड़ों की ‘लूट’ योजना?
डिजिटल निगरानी के नाम पर पब्लिक फंड की खुली लूट: भारतीय रेल के मैकेनिकल अफसरों की ‘चिप’ आधारित नई भ्रष्टाचार योजना का पर्दाफाश
भारतीय रेल के मैकेनिकल एवं स्टोर्स विंग द्वारा तकनीक और डिजिटल निगरानी के नाम पर सार्वजनिक धन की खुली लूट और भ्रष्टाचार का एक नया और बेहद सनसनीखेज हथकंडा अपनाया जा रहा है। हाल ही में मीडिया में प्रसारित एक न्यूज क्लिप, जिसमें ट्रेन के कंबल और चादरों में रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (RFID) चिप लगाने का दावा किया गया है, वास्तव में यह एक सोची-समझी ‘प्लांटेड न्यूज’ प्रतीत होती है। इस प्रायोजित खबर का एकमात्र वास्तविक उद्देश्य आम जनमानस और मीडिया की प्रतिक्रिया को भांपना है, ताकि इसकी आड़ में सरकार, मंत्री और नीति निर्माताओं की आँखों में धूल झोंकी जा सके। नीतिगत स्तर पर इसे एक तकनीकी क्रांति के रूप में पेश करने की तैयारी है, जबकि धरातल पर यह मैकेनिकल अफसरों और कॉन्ट्रैक्ट चेयरमैन रेलवे बोर्ड (सीआरबी) के गठजोड़ से उपजी एक नई लूट योजना के सिवाय कुछ नहीं है, जिसका अंतिम परिणाम केवल और केवल रेल राजस्व को भारी चपत लगाना है।

इस पूरी योजना की वित्तीय विसंगतियों और विशालकाय बजट पर नजर डालें तो भ्रष्टाचार का यह खेल साफ समझ में आता है। भारतीय रेल में प्रतिदिन लगभग ढ़ाई करोड़ लोग यात्रा करते हैं और एसी कोचों में यात्रियों को सालाना कुल लगभग चौदह से सोलह करोड़ लिनन सेट की आपूर्ति की जाती है। इस प्रस्तावित योजना के अनुसार, प्रत्येक लिनन सेट में शामिल पांच वस्तुओं—दो चादर, एक कंबल, एक तकिया कवर और एक छोटी तौलिया—में अलग-अलग चिप लगाई जाएगी। खबर के अनुसार, एक चिप की अनुमानित लागत 20 से 50 रुपये के बीच है। यदि औसतन 35 रुपये प्रति चिप भी मान लिया जाए, तो केवल एक बार में करोड़ों लिनन सामग्री में चिप लगाने की शुरुआती लागत ही अरबों रुपये तक पहुंच जाएगी। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक एसी कोच के चारों निकास द्वारों पर लगभग 20 से 30 हजार रुपये की लागत वाले अदृश्य सेंसर या स्कैनर सिस्टम लगाए जाने की बात कही जा रही है। देश भर में दौड़ रहे लगभग पचास हजार एसी कोचों और करीब पांच हजार छोटे-बड़े टर्मिनल स्टेशनों पर इन स्कैनरों की स्थापना की कुल लागत का यदि मोटा-मोटा अनुमान लगाया जाए, तो यह पूरा प्रोजेक्ट हजारों करोड़ रुपये के सार्वजनिक फंड को निगल जाएगा।
तकनीकी और व्यावहारिक धरातल पर इस योजना का अंतिम परिणाम पूरी तरह शून्य होना तय है। रेलवे के वाशिंग एप्रन और लॉन्ड्री में लिनन की जिस बेरहमी से धुलाई और भारी तापमान पर हाइड्रो-एक्सट्रैक्शन और इस्त्री (प्रेस) की जाती है, उसमें मात्र दो से तीन बार की धुलाई में ही यह नाजुक आरएफआईडी (#RFID) चिप पूरी तरह टूट जाएंगी या निष्क्रिय होकर बेकार हो जाएंगी। ऐसी स्थिति में, लिनन की ट्रैकिंग के नाम पर बार-बार नई चिप खरीदी जाएगी और यह अंतहीन चक्र ठेकेदारों और भ्रष्ट अधिकारियों की जेबें भरता रहेगा। मैकेनिकल अधिकारियों की यह योजना ठीक उसी ढ़र्रे पर आगे बढ़ रही है, जैसे पूर्व में रेलवे सुरक्षा बल (#RPF) के अधिकारियों की कथित ‘मौज’ के लिए प्रत्येक जोन में लगभग डेढ़-डेढ़ सौ करोड़ रुपये फूंककर लगेज स्कैनर, बॉडी स्कैनर और मेटल डिटेक्टर मशीनें स्थापित की गई थीं। आज वे तमाम मशीनें बिना किसी सुरक्षा उपयोग के रेलवे स्टेशनों के कोनों में पड़ी धूल फाँक रही हैं और सड़ चुकी हैं। सुरक्षा और तकनीक का डर दिखाकर जनता की गाढ़ी कमाई को ठिकाने लगाने का यह पुराना और आजमाया हुआ प्रशासनिक हथकंडा है।
सबसे विचारणीय और चौंकाने वाला तथ्य यह है कि रेलवे इस फिजूलखर्ची से बेहद आसानी से बच सकता था, लेकिन जानबूझकर इस ओर आंखें मूंद ली गईं। स्वयं रेलवे के ही कई ईमानदार और वरिष्ठ अधिकारियों ने समय-समय पर रेलवे बोर्ड का ध्यान इस अकाट्य तथ्य की ओर आकर्षित किया है कि यदि वातानुकूलित (#AC) कोचों का तापमान 22, 24 या 26 डिग्री सेल्सियस के बीच नियंत्रित रखा जाए, तो यात्रियों को भारी कंबल या रजाई देने की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। एसी कोच का प्राथमिक उद्देश्य यात्रियों को उमस और पसीने से बचाकर एक आरामदायक यात्रा अनुभव देना होता है, न कि उन्हें कड़ाके की ठंड का अहसास कराकर कंबल ओढ़ने पर मजबूर करना। यदि एसी कोचों के तापमान का सही प्रबंधन किया जाए, तो करोड़ों रुपये की बिजली की सीधी बचत होगी और साथ ही अरबों रुपये के लिनन प्रबंधन, धुलाई, रखरखाव और अब इस नई चिप आधारित लूट के फालतू खर्च से पूरी तरह बचा जा सकता है। परंतु, ऐसा करने पर अधिकारियों को भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी का मौका नहीं मिलेगा, इसलिए जानबूझकर जनता की भावनाओं से खेलते हुए चोरी रोकने का यह फर्जी नाटक रचा जा रहा है।
रेलवे के अंदरूनी सूत्रों और वरिष्ठ रेल अधिकारियों के एक बड़े वर्ग का स्पष्ट मानना है कि यह पूरी कवायद वर्तमान कॉन्ट्रैक्ट चेयरमैन रेलवे बोर्ड (#सीआरबी) के दिमाग की ही खुराफाती उपज है। एक सुनियोजित एजेंडे के तहत पहले लिनन चोरी के आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जा रहे हैं, ताकि इस तथाकथित हाई-टेक सिस्टम को लागू करने का रास्ता साफ किया जा सके। चोरी के कारण रेलवे को सालाना 50 से 60 करोड़ रुपये के नुकसान का जो डर दिखाया जा रहा है, वह हजारों करोड़ के इस नए घोटाले को अमलीजामा पहनाकर बंदरबांट करने के लिए मात्र एक बहाना है। वास्तविकता यह है कि निजी वेंडर वाली ट्रेनों में चोरी गए सामान की भरपाई पहले से ही सहायकों के वेतन से काट ली जाती है, तो फिर इस नए डिजिटल प्रोजेक्ट की क्या आवश्यकता है?
स्पष्ट है कि यह योजना केवल पब्लिक फंड की संगठित लूट, कुछ निजी और फेवरिट कंपनियों को ठीक उसी तरह अवैध लाभ पहुंचाने और भारी कमीशन डकारने के उद्देश्य से तैयार की गई है, जैसे सहकारी समितियों और संस्थाओं से लिनन की खरीद के स्थापित नियम को दरकिनार करके पॉलिएस्टर मिक्स मिल-मेड लिनन (चादरें) बड़ी मात्रा में—कई साल का स्टॉक—खरीदने के टेंडर उत्तर रेलवे और पूर्वोत्तर रेलवे सहित कई अन्य जोनल रेलों से करवाए गए हैं। सुनिश्चित भ्रष्टाचार के इन सभी हथकंडों को तत्काल प्रभाव से खारिज कर उच्च स्तरीय स्वतंत्र जांच के दायरे में लाया जाना चाहिए।

