गति के फेर में बुनियादी सुरक्षा से समझौता: कंक्रीट के मलबे से बेहतर है स्टील गर्डर्स की दीर्घकालिक मजबूती!
देश में पिछले कुछ वर्षों से बुनियादी ढ़ांचे के विकास, बड़े पुलों, मेट्रो वायडक्ट्स और एलिवेटेड कॉरिडोर्स के निर्माण में आधुनिक और त्वरित कंक्रीट तकनीकों का अंधाधुंध और व्यापक उपयोग किया जा रहा है। सरकारें और निर्माण एजेंसियां इसे विकास की गति के रूप में प्रचारित करती हैं, लेकिन जब भी किसी आधुनिक संरचना के गिरने-ढ़हने, असमय गंभीर क्षति होने या करोड़ों रुपये की लागत से महंगे पुनर्निर्माण की खबरें सामने आती हैं, तो व्यवस्था के इस मॉडल पर गंभीर सवाल उठने लगते हैं। सिविल इंजीनियरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर के विशेषज्ञ अब यह सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि दीर्घकालिक सुरक्षा, विश्वसनीयता और व्यावहारिकता के पैमाने पर कौन सी संरचनात्मक प्रणाली देश के भविष्य के लिए सबसे सुरक्षित है। आज जब भारतीय रेल और सड़क परिवहन तंत्र अपनी गति बढ़ा रहे हैं, तब प्रारंभिक निर्माण लागत को कम दिखाने की होड़ में पूरी जीवनचक्र लागत (Life Cycle Cost) की अनदेखी की जा रही है, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ा संकट खड़ा हो रहा है।
अगर इतिहास और टिकाऊपन के पन्नों को पलटें तो भारत में स्टील गर्डर आधारित पुलों का इतिहास सौ वर्ष से भी अधिक पुराना और बेहद शानदार रहा है। देश के अनेक महत्वपूर्ण रेलवे और सड़क पुल आज भी दशकों और सदियों की सेवा के बाद पूरी मजबूती से खड़े हैं और यातायात का भार संभाल रहे हैं। स्टील संरचनाओं की सबसे बड़ी तकनीकी और व्यावहारिक विशेषता यह है कि इनमें किसी भी क्षतिग्रस्त हिस्से या ‘मेंबर’ को अपेक्षाकृत बेहद आसानी और कम खर्च में बदला जा सकता है। यदि किसी गर्डर या जोड़ में कोई तकनीकी समस्या आती है, तो पूरे के पूरे पुल को जमींदोज करने या यातायात को महीनों बाधित करने की आवश्यकता नहीं होती; बल्कि केवल प्रभावित हिस्से को हटाकर नया स्टील पार्ट वहां स्थापित कर दिया जाता है। इसके विपरीत, आज की आधुनिक कंक्रीट आधारित लंबी स्पैन संरचनाओं (Concrete Long Span Structures) में यदि कोई एक प्रमुख तत्व या सेगमेंट क्षतिग्रस्त हो जाए, तो उसकी मरम्मत की प्रक्रिया अत्यंत जटिल, अधिक समय लेने वाली और अत्यधिक महंगी साबित होती है। अधिकांश मामलों में तो मरम्मत संभव ही नहीं होती और पूरी संरचना को ढ़हाकर नए सिरे से बनाना ही एकमात्र विकल्प बचता है, जो सीधे तौर पर जनता के पैसे की बर्बादी है।
तकनीकी और सुरक्षा ऑडिट के दृष्टिकोण से भी स्टील गर्डरों का दूसरा सबसे बड़ा लाभ उनकी प्रत्यक्ष निरीक्षण क्षमता (Inspectability) है। स्टील में यदि समय के साथ जंग, आकार में विकृति, बारीक दरारें या धातु की थकान (Fatigue) विकसित होती है, तो उसे केवल आंखों से देखकर या सामान्य उपकरणों के जरिए आसानी से पकड़ा जा सकता है। समय-समय पर सही कोटिंग, पेंटिंग और नियमित रखरखाव के माध्यम से स्टील के पुलों की सेवा आयु को कई गुना बढ़ाया जा सकता है। इसके विपरीत, आधुनिक कंक्रीट संरचनाओं के भीतर पैदा होने वाली तकनीकी कमियां, जैसे कि कंक्रीट के भीतर सरिया में लगने वाली जंग या आंतरिक दरारें, लंबे समय तक बाहर से दिखाई ही नहीं देतीं। जब तक इन समस्याओं का बाहर से पता चलता है, तब तक आंतरिक क्षति इतनी बढ़ चुकी होती है कि संरचना अचानक भरभरा कर गिर जाती है, जिससे बालासोर या कोटा जैसी त्रासदियों का अंदेशा और अधिक बढ़ जाता है।
पर्यावरण और भविष्य के संसाधनों के पुनः उपयोग (Reuse) के दृष्टिकोण से भी स्टील आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जब किसी पुराने स्टील पुल को सेवा से हटाया जाता है, तो उसके गर्डरों और अन्य मजबूत लोहे के हिस्सों को किसी अन्य छोटे मार्ग पर पुनः उपयोग में लाया जा सकता है, या फिर उन्हें पूरी तरह से रीसायकल (Recycling) किया जा सकता है। यह प्रक्रिया वैश्विक स्तर पर अपनाए जा रहे परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) के सिद्धांतों के बिल्कुल अनुकूल है, जहां संसाधनों की बर्बादी न्यूनतम होती है। इसके ठीक उलट, कंक्रीट की बड़ी-बड़ी संरचनाओं को जब ध्वस्त किया जाता है, तो उसका अधिकांश हिस्सा केवल मलबे और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कचरों के रूप में बचता है, जिसका कोई दोबारा इस्तेमाल नहीं हो पाता। आर्थिक दृष्टि से भी स्टील संरचनाओं का एक बहुत बड़ा और अचूक फायदा उसका स्क्रैप मूल्य (Scrap Value) यानि कबाड़ का अवशिष्ट मूल्य होता है। एक निश्चित जीवनकाल समाप्त होने के बाद भी स्टील की संरचना करोड़ों रुपये का अवशिष्ट मूल्य समेटे रहती है, जबकि कंक्रीट की संरचनाएं अपने अंत में केवल भारी-भरकम ध्वस्तीकरण लागत (Demolition Cost) और मलबे का बोझ छोड़कर जाती हैं।
किसी भी अप्रत्याशित आपदा, प्राकृतिक संकट या दुर्घटना की स्थिति में भी स्टील गर्डर आधारित प्रणालियां कंक्रीट के मुकाबले कई गुना अधिक लचीली और अनुकूल सिद्ध होती हैं। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी भारी वाहन की टक्कर, भयानक आगजनी या स्थानीय क्षति के कारण पुल का कोई एक भाग प्रभावित भी होता है, तो केवल क्षतिग्रस्त गर्डर को बदलकर यातायात को बहुत ही कम समय में पुनः बहाल किया जा सकता है। दुनिया के तमाम विकसित देशों में पुलों और रणनीतिक मार्गों के रखरखाव के लिए आज भी इसी दूरदर्शी रणनीति को प्राथमिकता दी जा रही है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि स्टील संरचनाएं पूरी तरह से कमियों से मुक्त हैं; उनमें भी जंग लगना और निरंतर पेंटिंग की आवश्यकता जैसी चुनौतियां अवश्य हैं, लेकिन इंजीनियरिंग समर्थकों का स्पष्ट तर्क है कि स्टील की कमियां सतह पर दिखाई देती हैं और उनका समय रहते इलाज पूरी तरह संभव है, जबकि कंक्रीट की प्रणालियों में आंतरिक और अदृश्य क्षति को पहचानना किसी अंधेरे कुएं में तीर चलाने जैसा है। इसके अलावा कंक्रीट संरचना की लाइफ स्पैन भी बहुत सीमित अवधि तक ही होती है।
आज जब भारत अपने इतिहास के सबसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण के दौर से गुजर रहा है, तब नीति-नियंताओं, रेलवे बोर्ड और मंत्रालयों को केवल तात्कालिक वाहवाही लूटने वाले ‘प्रारंभिक निर्माण लागत’ के आंकड़ों से बाहर निकलना होगा। देश को अब दीर्घकालिक स्थिरता, परिसंपत्ति प्रबंधन (Asset Management), रखरखाव की सुगमता और प्रतिस्थापन की सरलता को नीतिगत प्राथमिकता देनी होगी। विकास का वास्तविक और ईमानदार अर्थ केवल मशीनों के जरिए तेजी से कंक्रीट का ढ़ांचा खड़ा कर देना नहीं है, बल्कि ऐसी सुरक्षित और टिकाऊ संरचनाएं बनाना है जिन्हें आने वाली पीढ़ियां बिना किसी खौफ के दशकों तक उपयोग कर सकें। संसाधनों की न्यूनतम बर्बादी और सुधार की अधिकतम गुंजाइश ही देश के बुनियादी ढ़ांचे को मजबूत कर सकती है, और स्टील गर्डरों की सौ साल पुरानी पारंपरिक ताकत में आज भी यही सबसे बड़ा भरोसा छिपा हुआ है।

