संपादकीय: टेंडर्स का बढ़ता आकार, सीमित होती प्रतिस्पर्धा
क्या वर्तमान मॉडल दक्षता और प्रतिस्पर्धा के बीच सही संतुलन बना रहा है?
टेंडरों का आकार बढ़ने से प्रतिस्पर्धा सीमित हो रही है—यह गंभीर नीतिगत चिंता का विषय है। बड़े प्रोजेक्ट्स के साथ निष्पक्षता, पारदर्शिता और व्यापक भागीदारी भी आवश्यक है। निष्पक्ष बाजार सुनिश्चित करने में संबंधित संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है!
वर्ष 2014 से 2026 के बीच भारत ने सड़क, रेलवे, मेट्रो, बुलेट ट्रेन, एक्सप्रेसवे, टनल्स और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में अभूतपूर्व निवेश देखा है। बड़े बजट की ढ़ाँचागत परियोजनाओं ने देश के विकास को नई गति दी है। लेकिन इसी दौर में एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उभरता है—क्या टेंडर्स का आकार और पात्रता इतनी बड़ी होती जा रही है कि प्रतिस्पर्धा सीमित हो रही है?
आज National Highways Authority of India, Ministry of Road Transport and Highways, National Highways and Infrastructure Development Corporation Limited, Indian Railways, Bullet Train Project, National Capital Region Transport Corporation तथा कई सार्वजनिक उपक्रमों में बड़ी मूल्य (High-Value) की परियोजनाओं का महत्व लगातार बढ़ा है। साथ ही, छोटे और मध्यम आकार के टेंडर भी मौजूद हैं, लेकिन कई प्रमुख परियोजनाएँ बड़े #EPC पैकेजों में जारी की जाती हैं। इनमें पारदर्शिता और इनकी सफलता पर जानकारों ने पहले से ही प्रश्न उठाए हैं।
नीति-निर्माताओं के सामने मूल प्रश्न यह है कि क्या बड़े पैकेज दक्षता और समयबद्ध निष्पादन बढ़ाते हैं, या फिर इससे पात्र बोलीदाताओं की संख्या सीमित हो जाती है?
यदि किसी टेंडर की वित्तीय और तकनीकी शर्तें ऐसी हों कि केवल कुछ ही बड़ी कंपनियाँ उसमें पात्र बन सकें, तो यह सार्वजनिक नीति पर बहस का विषय होना चाहिए। भारत जैसे 140 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि जहाँ संभव हो, प्रतिस्पर्धा व्यापक रहे और योग्य नए प्रतिभागियों को भी अवसर मिलें।
यह बहस किसी एक कंपनी के पक्ष या विपक्ष की नहीं, बल्कि सार्वजनिक खरीद की संरचना पर है। बड़े प्रोजेक्ट आवश्यक हैं, लेकिन पारदर्शिता, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और अधिकतम भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि सत्ता किसके पास है, बल्कि यह है कि क्या एक मजबूत और प्रभावी विपक्ष मौजूद है। जब विपक्ष कमजोर होता है, तो सत्तारूढ़ दल स्वाभाविक रूप से अधिक राजनीतिक और संगठनात्मक बढ़त हासिल कर लेता है। ऐसे में लोकतंत्र की मजबूती के लिए जवाबदेही, बहस और संस्थागत संतुलन पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
मजबूत लोकतंत्र के लिए जितनी मजबूत सरकार आवश्यक है, उतना ही मजबूत विपक्ष भी आवश्यक है। यही प्रश्न नीति-निर्माताओं, खरीद एजेंसियों और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (#CCI) के सामने विचारणीय है—क्या वर्तमान मॉडल दक्षता और प्रतिस्पर्धा के बीच सही संतुलन बना रहा है, अथवा अब इसकी समीक्षा का समय आ गया है!
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