भाषा नीति में सही सुधार—सही दिशा में बढ़ती सरकार!

अगर इस देश को सांस्कृतिक और प्रशासनिक रूप से बेहतर बनाना है, और सामाजिक सौहार्द बढ़ाना है, तो विविध भाषाई फार्मूला अपनाना ही होगा!

बिना देरी किए इस नीति पर अमल होना चाहिए, और जो लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी के साथ दूसरी विदेशी भाषाएं भी सिखाना चाहते हैं—उनके लिए आसमान खुला है!

दो-तीन विदेशी भाषाएं पढ़ाना उन्हें अपने बच्चों पर अतिरिक्त बोझ नहीं लगता, लेकिन अपनी मातृभाषा और भारतीय भाषाएं सीखने के नाम पर वे सड़कों पर उतरने के लिए तैयार हो रहे जाते हैं—यह देश के साथ गद्दारी है, और सरकार को किसी भी हालत में झुकना नहीं चाहिए!

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सीबीएसई और सरकार के ताजा निर्णय की प्रशंसा की जानी चाहिए, जिसमें नौवीं कक्षा में दो भारतीय भाषाओं को अनिवारित किया गया है। यह “नई शिक्षा नीति-2020” के कार्यान्वयन का अगला कदम है। सीबीएसई के 15 मई के नए आदेश के अनुसार पहली जुलाई से नवीं कक्षा में तीन भाषाएँ पढ़ाई जाएंगी, जिनमें दो अनिवार्य रूप से भारतीय भाषाएं होंगी। जैसा कि पूरे देश का हाल है—पहली भाषा मान लीजिए अंग्रेजी (आर-1), और उत्तर भारत में या पूरे देश में दूसरी भाषा हिंदी (आर-2) या अपनी मातृ भाषा। तीसरी भाषा (आर-3) में आप आठवीं अनुसूची की कोई भी भाषा चुन सकते हैं।

इसका उद्देश्य बहुभाषी समाज की तरफ बढ़ना है, जो इस देश की हकीकत भी है। साठ के दशक में कोठारी आयोग ने भी जो त्रिभाषा सूत्र (फार्मूला) दिया था—उसकी आत्मा भी यही थी कि उत्तर भारत के बच्चे दक्षिण की कोई भाषा सीखें और दक्षिण के बच्चे अपनी मातृभाषा के अलावा उत्तर भारत की हिंदी। लेकिन कुछ क्षेत्रीय राजनीतिक स्वार्थों के चलते इसे हिंदी थोपने के रूप में दुष्प्रचार किया गया और हिंदी विरोधी आंदोलन चलाया।

उत्तर भारत की शिक्षा नीति में भी यह कमी रही कि उन्होंने दक्षिण की किसी भाषा को सीखने के बजाय तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत से यह काम चलाकर खानापूर्ति कर ली। उम्मीद है, ऐसी गलती उत्तर भारत अब नहीं करेगा। दक्षिण का इसीलिए आज तक यह विरोध जारी है कि जब उत्तर भारत—दक्षिण की कोई भाषा नहीं सिखाता, तो दक्षिण के राज्य भी हिंदी क्यों सीखें। इसीलिए त्रिभाषा फार्मूला अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाया। अब सरकार की नई सुविचारित नीति और नए आदेश के अनुसार यह सही कदम है।

उत्तर भारत में विशेषकर अधिकांश पब्लिक स्कूलों में नवीं क्लास में तो एक भी भारतीय भाषा नहीं पढ़ाई जा रही। इनमें से कुछ स्कूल ऐसे भी हैं जिनमें 12वीं में हिंदी का सेक्शन ही नहीं है, जबकि अंग्रेजी के अलावा बच्चों के लिए दो-तीन और विदेशी भाषाओं के विकल्प हैं। वे अंग्रेजी लेते हैं और उसके साथ जर्मन फ्रेंच जापानी स्पेनिश आदि भी सीखते हैं। सरकारी स्कूलों में गनीमत है कि हिंदी बची हुई है! लेकिन अधिकतर विज्ञान के विद्यार्थी सरकारी स्कूलों में भी 11वीं में हिंदी नहीं पढ़ रहे हैं या कहें कि उन्हें नहीं पढ़ाई जा रही।

भाषा नीति के नए आदेश का सबसे ज्यादा विरोध यही महंगे निजी स्कूल कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट तक भी चले गए हैं! और अंग्रेजी का मीडिया भी उनके पक्ष और सरकार के विरोध में खड़ा हो गया है। उनकी कुछ बचकानी शिकायतें है, जैसे इस सेशन में ही करना था तो पहली अप्रैल से क्यों नहीं किया गया! अप्रैल में सेशन अवश्य आरंभ हो जाता है, लेकिन पूरे देश में शिक्षा पहली जुलाई से ही शुरू होती है। इसलिए देरी की इस बात में कोई दम नहीं है। उनका दूसरा आरोप है कि हमने फ्रेंच जर्मन भाषाओं की किताबें खरीद ली हैं और बच्चे कई वर्षों से इन भाषाओं को पढ़ रहे हैं, अब और भारतीय भाषाएं पढ़नी पड़ेंगी तो बच्चों पर अतिरिक्त बोझ हो जाएगा। यह उनकी दसवीं के रिजल्ट को प्रभावित करेगा।

उनसे बस यही कहना है कि हे अमीरों ! अंग्रेजी तो आप जन्म से सीख रहे हैं। जर्मन और फ्रेंच भी आपके लिए कभी अतिरिक्त बोझ नहीं लगतीं। लेकिन अपनी मातृभाषा हो या देश की दूसरी भाषाओं का नाम लेते ही आपको बोझ लगने लगता है। क्या हमारा संविधान गलत है जिसने हिंदी और सभी क्षेत्रीय भाषाओं को आगे बढ़ाने और उसमें प्रशासन और शिक्षा देने की बात कही गई है। और यह सब आजादी के लिए संघर्ष करने वाले पूरे देश की हकीकत को जानने वाले महात्मा गांधी, डॉ अंबेडकर, सुभाषचंद्र बोस, राजगोपालाचारी जैसे मनीषियों ने एक मत से सुझाया और यह संविधान में भी शामिल किया गया है!

आज यूरोप, अमेरिका से लेकर चीन, जापान इसलिए विकसित हैं कि उनकी शिक्षा और प्रशासन अपनी भाषा में होता है, अंग्रेजी और दूसरी विदेशी भाषा में नहीं। क्या बच्चे अपनी मर्जी से जर्मन और दूसरी भारतीय भाषा सीखते हैं? बिल्कुल नहीं ! यह अभिभावकों का, स्कूलों का उन पर जबरदस्ती लादा हुआ बोझ है। अगर इस देश को सांस्कृतिक और प्रशासनिक रूप से बेहतर करना चाहते हैं तो भाषाओं में आपसी लेन-देन अवश्य ही होना चाहिए।

तीसरी भाषा के लिए सरकार ने बहुत अच्छा रास्ता सुखाया है कि इसमें बोर्ड की परीक्षा नहीं होगी और पाठ्यक्रम भी बहुत हल्का होगा, और उसका मूल्यांकन भी आंतरिक। उद्देश्य साफ है जिससे उत्तर भारत के लोग दक्षिण की भाषाओं को जानें-सीखें और दक्षिण के उत्तर भारत की। इससे दक्षिण का हिंदी और उत्तर भारतीय भाषाओं का विरोध भी निर्मूल हो जाएगा और भाषाई-एकता तो बढ़ेगी ही। यह पूरे देश के लिए बहुत शुभ और सुखद होगा।

वैश्विक (ग्लोबल) होती दुनिया में उत्तर भारत के इंजीनियर डॉक्टर एक बड़ी संख्या में इस समय मुंबई पुणे बेंगलुरु हैदराबाद चेन्नई तक फैले हुए हैं, और केवल पढ़े-लिखे इंजीनियर ही नहीं बिहार बंगाल असम के मजदूर कारपेंटर जिग वर्कर भी खुशी से काम कर रहे हैं। यह देश की एकता और समन्वय का प्रतीक है। कई बार दूसरे प्रदेश में जाने पर भाषा की समस्याएं रोजाना के व्यवहार में खड़ी होती हैं। नई शिक्षा-भाषा-नीति से इसका भी समाधान सहज हो जाएगा और आपसी कटुता कम होगी कि उत्तर भारतीय उनकी भाषा क्यों नहीं सीखते।

तो तीसरी भाषा कौन सी चुनी जाए ! अच्छा तो यही रहेगा संस्कृत के नाम पर पुरानी गलती न दोहराई जाए। स्कूल या प्रशासन बच्चों के विकल्प से भाषा का चुनाव करें। पंजाबी मराठी परिवार की भाषाएं देवनागरी परिवार की हैं। कुछ मेहनत अवश्य करनी पड़ेगी, लेकिन क्या यही मेहनत दक्षिण के राज्यों को हिंदी सीखने के लिए नहीं करनी पड़ती? इसलिए बिना देरी किए इस नीति पर अमल होना चाहिए और जो लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी के अलावा दूसरी विदेशी भाषाएं भी सिखाना चाहते हैं—उनके लिए आसमान खुला है।

बिना परीक्षा में शामिल किये यदि संभव हो तो स्कूल सिखाएं या कोई और इंतजाम करें। सब कुछ स्कूल ही नहीं सिखाता। हमारे चारों तरफ ऐसे हजारों लोग मिल जाएंगे जिन्होंने जॉब के लिए व्यवसाय के लिए अपनी आवश्यकता के हिसाब से विदेशी भाषाएं सीखी हैं। इसलिए सरकार पर आरोप लगाना—उसे कटघरे में खड़ा करना या सुप्रीम कोर्ट जाना—किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। सही बात यह है कि अब सुप्रीम कोर्ट भी संभवतः इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा! और उसे करना भी नहीं चाहिए!

आश्चर्य की बात यह है कि दो-तीन विदेशी भाषाएं पढ़ाना उन्हें अपने बच्चों पर अतिरिक्त बोझ नहीं लगता, लेकिन अपनी मातृभाषा और भारतीय भाषाएं सीखने के नाम पर वे सड़कों पर उतरने के लिए तैयार हो जाते हैं। यह देश के साथ गद्दारी है और सरकार को किसी भी हालत में झुकना नहीं चाहिए। उम्मीद है स्कूल और उनके अभिभावक समझेंगे, और शिक्षा को बेहतर बनाने के प्रयास में पूरा सहयोग करेंगे।

#प्रेमपालशर्मा (पूर्व संयुक्त सचिव भारत सरकार)
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