विकास के दावों के बीच ढ़हती रेल संरक्षा: चारबाग स्टेशन हादसा रेल प्रशासन की आपराधिक लापरवाही का प्रत्यक्ष प्रमाण

“जब सार्वजनिक बुनियादी ढ़ांचे के निर्माण में पारदर्शिता और गुणवत्ता की जगह कमीशनखोरी, भ्रष्टाचार और कदाचार ले लेता है, तब चारबाग और कोटा जैसी त्रासदियों का जन्म होता है!”

उत्तर रेलवे के प्रतिष्ठित और व्यस्ततम लखनऊ चारबाग रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर-5 पर हुआ ताजा हादसा भारतीय रेल के बुनियादी ढ़ांचे के विकास और यात्रियों एवं रेलकर्मियों की सुरक्षा के दावों पर एक बड़ा और गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। रेलवे लैंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (#RLDA) द्वारा कराए जा रहे निर्माण कार्यों के दौरान प्लेटफार्म शेल्टर यानि कवर ओवर प्लेटफार्म (#COP) का अचानक ताश के पत्तों की तरह भरभराकर ढ़ह जाना कोई सामान्य तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर घोर लापरवाही और घटिया निर्माण प्रबंधन का जीवंत उदाहरण है।

घटना से संबंधित प्राप्त हुए वीडियो और तस्वीरों के दृश्य स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि भारी-भरकम टिन शेड और उसका लोहे का ढ़ांचा किस कदर टूटकर प्लेटफार्म पर आ गिरा है। यह दृश्य किसी बड़े युद्ध क्षेत्र या विनाशकारी आपदा जैसा प्रतीत होता है, जिसने चलती-फिरती जिंदगी को पल भर में मलबे के नीचे दबा दिया।

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इस भयावह हादसे ने ऑन-ड्यूटी रेलकर्मियों और आम यात्रियों की सुरक्षा को ताक पर रखने की प्रशासनिक उदासीनता को उजागर कर दिया है। घटना के समय ड्यूटी पर तैनात टीटीई भूपेंद्र इस घटिया निर्माण की भेंट चढ़ गए, जिनके पैर में गंभीर फ्रैक्चर हुआ है, जबकि अभिषेक और साहिल नाम के दो यात्री इस मलबे की चपेट में आकर लहूलुहान हो गए।

वीडियो विजुअल्स में क्रेन के जरिए मलबे को हटाने और रेलवे सुरक्षा बल (#RPF) द्वारा किए जा रहे रेस्क्यू ऑपरेशन की तस्वीरें यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि जमीनी स्तर पर स्थिति कितनी विकट थी। घायल साहिल की जांघ मलबे के नीचे दबने से उन्हें अत्यंत गंभीर चोटें आई हैं, वह अस्पताल में जिंदगी और दर्द से जूझ रहे हैं। यह हादसा इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि विकास कार्यों के नाम पर साइट पर संरक्षा-सुरक्षा के न्यूनतम मानकों (Safety Protocols) का भी पालन नहीं किया जा रहा था।

सबसे चौंकाने वाला और चिंताजनक पहलू यह है कि इस भारी-भरकम ढ़ांचे के गिरने के दौरान ही हावड़ा-देहरादून एक्सप्रेस ट्रेन उसी प्लेटफार्म की तरफ बढ़ रही थी। यह तो मात्र एक संयोग और सतर्कता थी कि ट्रेन को समय रहते रोक लिया गया, अन्यथा यह हादसा भारतीय रेल के इतिहास की एक बेहद दर्दनाक और बड़ी मानवीय त्रासदी में बदल सकता था। यदि चलती ट्रेन उस ढ़हते शेड की चपेट में आ जाती, तो हताहतों की संख्या का अंदाजा लगाना भी आत्मा को कंपा देने वाला है।

अधिकारियों द्वारा आनन-फानन में क्रेन मंगवाकर मलबा हटवाने और डीआरएम सहित अन्य अधिकारियों का मौके पर पहुंचना केवल एक पारंपरिक ‘डैमेज कंट्रोल’ की कवायद जैसा ही है, क्योंकि वास्तविक प्रश्न हादसे के बाद की सक्रियता का नहीं, बल्कि हादसे से पहले बरती गई आपराधिक लापरवाही का है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे गंभीर आरोप खुद आरएलडीए (RLDA) के आंतरिक तंत्र से ही निकलकर सामने आ रहे हैं। आरएलडीए लखनऊ के कर्मचारियों के अनुसार, यह पूरी संस्था एक “सफेद हाथी” साबित हो रही है, जहां भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। जब सार्वजनिक बुनियादी ढ़ांचे के निर्माण में पारदर्शिता और गुणवत्ता की जगह कमीशनखोरी, भ्रष्टाचार और कदाचार ले लेता है, तब चारबाग और कोटा जैसी त्रासदियों का जन्म होता है।

बिना किसी सुरक्षा घेरे (Safety Netting) या यात्रियों की आवाजाही को नियंत्रित किए बिना इतने संवेदनशील और व्यस्त प्लेटफार्म पर ऐसा भारी निर्माण कार्य जारी रखना यह साबित करता है कि ठेकेदारों और जिम्मेदार अधिकारियों के लिए लोगों जान की कीमत कौड़ियों के भाव भी नहीं है।

यह दुर्घटना रेलवे बोर्ड और नागरिक उड्डयन एवं रेल मंत्रालय के लिए एक कड़ा अलार्म है। केवल आधुनिक स्टेशनों के थ्री-डी मॉडल दिखाना और कागजों पर संरक्षा के लंबे-चौड़े दावे करना तब तक निरर्थक है, जब तक जमीन पर मजदूरों, यात्रियों और अग्रिम पंक्ति के रेलकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती। चारबाग रेलवे स्टेशन के इस हादसे की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और आरएलडीए के भ्रष्ट अधिकारियों सहित दोषी ठेकेदारों पर गैर-इरादतन हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज होना चाहिए।

यदि अब भी रेलवे ने अपने निर्माण विंग में फैले इस संस्थागत भ्रष्टाचार और लापरवाही के दीमक को साफ नहीं किया, तो भविष्य में किसी बड़े जानमाल के नुकसान की पूरी जिम्मेदारी सीधे तौर पर रेल प्रशासन की होगी।