बीकानेर रेलवे स्टेशन का मेजर अपग्रेडेशन प्रोजेक्ट कानूनी विवाद में फँसा
ठेकेदार द्वारा अदालत में दस्तावेजों के माध्यम से लगाए गए बड़े आरोप
परियोजना स्थल समय पर बाधा-मुक्त उपलब्ध नहीं कराया गया
रेलवे क्वार्टर, GRP बैरक, बिजली लाइनें और अन्य संरचनाएँ लंबे समय तक साइट पर बनी रहीं
बार-बार ड्रॉइंग, डिजाइन और कार्यक्षेत्र में बदलाव किए गए
आवश्यक तकनीकी अनुमोदन एवं ड्रॉइंग समय पर जारी नहीं की गईं
रेलव अधिकारियों द्वारा कई बैठकों में बाधाओं को स्वीकार करने के बावजूद समाधान नहीं किया गया
कार्य प्रारंभ होने के बाद भी साइट के कई हिस्से ठेकेदार को नहीं सौंपे गए
EPC अनुबंध की मूल शर्तों से हटकर अतिरिक्त कार्य और नई व्यवस्थाएँ थोपी गईं
GRP बैरक एवं अन्य भवनों के स्थान परिवर्तन से मूल योजना प्रभावित हुई
कार्य में देरी के बावजूद रेल प्रशासन ने समय विस्तार पर उचित निर्णय नहीं लिया
रेल प्रशासन ने पत्राचार और स्पष्टीकरणों पर निष्पक्ष विचार नहीं किया
रेल प्रशासन पर मनमाने तरीके से अनुबंध रद्द करने का आरोप लगाया गया
अंतिम जिम्मेदारी तय किए बिना ही बैंक गारंटी जब्त करने की कार्रवाई शुरू की गई
याचिका में रेलवे की कार्रवाई को “मनमानी, दुर्भावनापूर्ण और शक्ति का दुरुपयोग” बताया गया
ठेकेदार ने दावा किया कि देरी का मुख्य कारण विभागीय अव्यवस्था और साइट संबंधी बाधाएँ थीं, न कि कार्य करने की अनिच्छा
अदालत में यह भी कहा गया कि रेल अधिकारियों की आंतरिक समन्वय की कमी से परियोजना प्रभावित हुई
बीकानेर रेलवे स्टेशन के मेजर अपग्रेडेशन प्रोजेक्ट को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट में एक बड़ा विवाद सामने आया है, जिसमें यह प्रश्न उठ रहा है कि आखिर परियोजना में देरी के लिए जिम्मेदार कौन है — ठेकेदार या सरकारी व्यवस्था। वीपीआरपीएल-केएसआईपीएल बीकेएन जेवी नामक कंपनी ने उत्तर पश्चिम रेलवे पर आरोप लगाया है कि रेल प्रशासन ने बिना पूरी साइट उपलब्ध कराए और लगातार बाधाओं को दूर किए बिना ही ठेका रद्द कर दिया।
कंपनी का कहना है कि परियोजना स्थल पर रेलवे क्वार्टर, विद्युत लाइनें, बैरक और अन्य अवरोध लंबे समय तक बने रहे, जिससे निर्माण कार्य प्रभावित हुआ। इसके अलावा बार-बार ड्रॉइंग-डिजाइन और कार्यक्षेत्र (Scope of Work) में बदलाव, नई शर्तें और मंजूरियों में की गई देरी ने भी काम की गति को धीमा किया। कंपनी ने दावा किया कि उसने कई बार पत्र लिखकर समस्याओं की जानकारी रेल प्रशासन को दी, लेकिन रेल अधिकारियों ने समय पर उनका समाधान नहीं किया। ठेकेदार के अनुसार विभाग ने पत्राचार और स्पष्टीकरणों पर निष्पक्ष भाव से विचार नहीं किया।
दूसरी ओर रेल प्रशासन का कहना है कि ठेकेदार परियोजना की निर्धारित गति से काम नहीं कर रहा था और कार्य प्रगति बेहद धीमी थी। कार्य में देरी के बावजूद रेल प्रशासन ने समय विस्तार (Extension of Time) पर उचित निर्णय नहीं लिया। रेलवे के अनुसार कई चेतावनियों और निर्देशों के बावजूद निर्माण कार्य तय समयसीमा के अनुरूप नहीं बढ़ा, जिसके कारण 11 मई 2026 को अनुबंध रद्द करना पड़ा और बैंक गारंटी जब्त करने की प्रक्रिया शुरू की गई।
याचिका में ठेकेदार ने रेलवे की कार्रवाई को “मनमानी, अन्यायपूर्ण और शक्ति का दुरुपयोग” बताया है। कंपनी का तर्क है कि जब रेल प्रशासन स्वयं बाधा-मुक्त साइट उपलब्ध नहीं करा सका, तब देरी का पूरा दोष केवल ठेकेदार पर डालना गलत है। वहीं रेलवे का पक्ष है कि सार्वजनिक परियोजना में समय पर काम पूरा करना ठेकेदार की जिम्मेदारी थी। अब यह मामला अदालत में है और अंतिम फैसला हाईकोर्ट करेगा कि वास्तव में गलती ठेकेदार की थी या फिर सिस्टम की लापरवाही और प्रशासनिक अव्यवस्था ने इस परियोजना को संकट में डाल दिया।
सामान्य तौर पर देखा जाए तो रेलवे की EPC परियोजनाओं में इस प्रकार के विवाद लगातार सामने आते रहे हैं और इसकी लागत एवं कार्य प्रगति दोनों ही विवादित रही हैं। कई मामलों में साइट उपलब्धता, बार-बार डिजाइन परिवर्तन, प्रशासनिक मंजूरियों में देरी और फील्ड स्तर की बाधाओं के कारण ठेकेदार एवं विभाग के बीच टकराव की स्थिति बनती रही है। यही कारण है कि अनेक ईमानदार रेल अधिकारी भी बड़े EPC कॉन्ट्रैक्ट्स की तुलना में छोटे एवं MSME आधारित आइटम रेट कार्यों को अधिक सुरक्षित और व्यवहारिक मानते हैं, क्योंकि उनमें जवाबदेही स्पष्ट रहती है और विवाद की संभावना अपेक्षाकृत कम होती है।

