यूपीएससी की प्रतिष्ठा पर प्रश्न
यह प्रश्न नए नहीं हैं, लेकिन अब विकराल रूप ले चुके हैं, और विज्ञान की भाषा में कहा जाए, तो प्रश्न करना एक जीवंत समाज के लिए बहुत आवश्यक है—अब यह देश के शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है कि तुरंत इनका हल खोजे!
दौलत सिंह कोठारी कमेटी ने जिस तरह समग्र रूप से प्रशासनिक सेवाओं के ढ़ाँचे का आधार तैयार किया था, उस पर पुनर्विचार किया जाए—आप बहुत दिनों तक इन प्रश्नों से नहीं बच सकते!
बड़ा प्रश्न इन सफल उम्मीदवारों के अंदर कार्य के प्रति निष्ठा, सादगी ईमानदारी और सच्चे जनसेवक बनाने की जमीन भी तैयार करना है। हालांकि जिस जमीन में बेईमानी चारों तरफ फल-फूल रही हो, वहां उससे बचे रहना आसान नहीं है, लेकिन यूपीएससी की प्रतिष्ठा और देश के शासन-प्रशासन के लिए इसे अब और नहीं टाला जा सकता!

देश के प्रशासनिक ढ़ाँचे में अफसरों की भर्ती करने वाली सर्वोच्च संस्था यूपीएससी के हालिया रिजल्ट ने पिछले वर्षों के मुकाबले ज्यादा हल्ला और हलचल पैदा की है। सोशल मीडिया और सूचना के अधिकार ने तथ्यों को पारदर्शी भी बनाया है और इसीलिए कई गंभीर प्रश्न भी पैदा हो रहे हैं। पहले दो दिन तो सफल उम्मीदवारों में एक ही नाम—आकांक्षा सिंह—की न्यूज में छाई रही। अभी उसकी जांच पड़ताल चल ही रही थी कि उत्तर प्रदेश के शामली की रहने वाली एक और उम्मीदवार ने पूरे देश का ध्यान खींचा है।
इस उम्मीदवार को 2024 में जनरल केटेगरी से इंडियन पुलिस सर्विस मिली थी। 2025 में उन्होंने अपनी कैटेगरी जनरल के बजाय ईडब्ल्यूएस घोषित की, यानि आर्थिक सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जिस देश में जहां जात कभी नहीं बदली जा सकती, वहां आईपीएस बनने के बाद ऐसा कैसे हो सकता है? पिछले 5 वर्षों में ऐसे सैकड़ो मामले यूपीएससी, कोर्ट और कार्मिक मंत्रालय के अधीन हैं। कहीं न कहीं नियमों में लचीलापन या उनमें स्पष्टता न होना और स्थानीय प्रशासन में भ्रष्टाचार के चलते ऐसा हो रहा है।
तीन वर्ष पहले महाराष्ट्र की पूजा खेड़कर का मामला याद होगा कि कैसे सारे नियमों को धता बताते हुए वे आईएएस बनी, मेडिकल विकलांग लिया, क्रीमी लेयर से बाहर आई और रोल नंबर और फोन भी बदलती रही। फर्जी एससी-एसटी सर्टिफिकेट के भी सैकड़ो मामले यूपीएससी के सामने आ चुके हैं। पिछले महीने यूपीएससी ने ऐसी गड़बड़ियों को देखते हुए आवेदन पत्र में कुछ सुधार इसीलिए किए हैं।
इस बार के रिजल्ट में एक और तथ्य ने ध्यान खींचा है और वह है, आदिवासी कोटे में राजस्थान के अकेले मीणा जाति के लगभग 35% लोगों का चुना जाना। यह भी कोई नई बात नहीं है। ऐसा पिछले दसियों वर्ष से हो रहा है। ऐसे किसी उम्मीदवार से अगर पूछा जाए कि दिल्ली में ही पैदा हुई और अंग्रेजी माध्यम के सबसे महंगे स्कूल में पढ़े हैं, सारी सुविधाओं के साथ, तो आदिवासी के कौन से लक्षण से आप सचमुच के सैकड़ो आदिवासी का हक मार रहे हो?
और हर साल की तरह अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं का प्रश्न तो उतना ही बड़ा अभी भी है कि सारे दावों के बावजूद भारतीय भाषाओं के पांच प्रतिशत मुश्किल से ही क्यों चुने जाते हैं? पंचान्नबे प्रतिशत अंग्रेजी माध्यम वाले क्यों? इस बीच गरीब बच्चे उनकी कठिनाईयों की एकाध कहानी भी सभी अखबारों में छपती जरूर है, लेकिन इस देश के लोकतंत्र में असमानताओं के चलते उनकी भागीदारी अभी भी लगभग नगण्य है।
लेकिन इस बार एक और बड़ा प्रश्न पैदा हुआ है और वह है, इंटरव्यू के नंबर। लिखित मुख्य परीक्षा 1750 अंकों की होती है और इंटरव्यू के नंबर होते हैं 275। इस बार के रिजल्ट के आंकड़े बताते हैं कि लिखित परीक्षा में टॉपर्स समेत किसी के भी 50% से ज्यादा नहीं आए। कमजोर वर्गों को भी जोड़ लिया जाए तो सफल उम्मीदवारों को लिखित परीक्षा में 45 से 50% तक अंक मिले हैं। यह पिछले वर्षों की तरह ही है। लेकिन इंटरव्यू में इस बार 65% से ज्यादा अंक पाने वालों की संख्या पिछले वर्षों की तुलना में कई गुना ज्यादा है। यानि लिखित परीक्षा से 20% ज्यादा।
275 में से 200 नंबर या उससे ज्यादा पाने वाले बड़ी संख्या में हैं और यह भयानक विसंगति है। पिछले वर्ष भी कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ है। इसके और भी निष्कर्ष हैं कि यह ज्यादा नंबर पाने वाले उनकी पृष्ठभूमि ज्यादातर सामाजिक आर्थिक रूप से बेहतर है, समृद्ध है, और यह सभी अंग्रेजी माध्यम और देश के सबसे महंगे स्कूलों में पढ़ने वाले हैं। यह पूरे देश के लोकतंत्र के लिए बेचैनी पैदा करने की बात है। सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसे मामलों पर आपत्ति उठाई है।
अच्छा तो यह रहे कि यदि लिखित परीक्षा में 50% तक अंक आ रहे हैं, तो जब तक कोई विशेष रूप से प्रतिभाशाली न हो, तब तक लिखित और इंटरव्यू के मार्क्स का अंतर 5-10% से ज्यादा नहीं होना चाहिए। यानि 200 छूने वाले चुनिंदा दो-चार हो सकते हैं। इस बार तो यह अंतर 20% को भी पार कर गया है। जिस परीक्षा में एक-एक नंबर से जीवन-मरण का प्रश्न होता हो, वहां यूपीएससी का यह रिजल्ट कई प्रश्न पैदा करता है।
यह प्रश्न भी बार-बार उठ रहा है कि इस बार का टॉपर एमबीबीएस डॉक्टर है और ऐसे डॉक्टर लगातार सिविल सेवाओं की तरफ आकर्षित क्यों हो रहे हैं! जबकि दुनिया भर में हमारे देश की जनता के लिए उपलब्ध डॉक्टरों की संख्या सबसे कम है। इसका परिणाम आप समझ सकते हैं कि कितनी बड़ी आबादी की कार्य क्षमता मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध न होने की वजह से देश के निर्माण में भाग नहीं ले पाती।
आईआईटी और देश के सबसे अच्छे इंजीनियर संस्थानों से पढ़े हुए इंजीनियर तो पिछले 20 सालों में लगभग 80% इन सेवाओं में आ रहे हैं। भारत सरकार ने प्योर साइंस यानि फिजिक्स केमिस्ट्री बॉटनी जूलॉजी जैसे विषयों में अध्ययन, शोध को बढ़ावा देने के लिए किशोर वैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना से लेकर कई योजनाएं शुरू की हैं। उन योजनाओं का कुछ लाभ इन सभी बच्चों ने अपनी प्रतिभा के बूते लिया है, लेकिन उसके बाद उधर शोध की तरफ नहीं जा पाए। यहां दोष बच्चों का नहीं है, उस पूरी व्यवस्था का है, जो बहुत निष्पक्षता से शोध और दूसरे कामों में अड़ंगे ज्यादा लगाती है।
आर्थिक पक्ष तो सबसे महत्वपूर्ण है ही। लेकिन दुर्भाग्य की बात ये है कि इतनी कठिन जॉइंट इंजीनियरिंग परीक्षा से आईआईटी जाने वाले बच्चे सिविल सेवाओं में इंजीनियरिंग यानि मैकेनिक सिविल ऐसा कोई विषय नहीं लेते। 80% उम्मीदवारों का विषय इंजीनियरिंग मेडिकल छोड़कर एंथ्रोपोलॉजी पॉलिटिकल साइंस सोशियोलॉजी होता है और कभी-कभी तो संस्कृत मैथिली या दूसरी भारतीय भाषाएं भी।
यह सभी प्रश्न नए नहीं हैं, लेकिन अब विकराल रूप ले चुके हैं, और विज्ञान की भाषा में कहा जाए, तो प्रश्न करना एक जीवंत समाज के लिए सबसे आवश्यक है। अब यह देश के शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है कि तुरंत इनका हल खोजे। अच्छा तो यह होगा कि जैसे वर्ष 1979 में दौलत सिंह कोठारी कमेटी ने जिस तरह समग्र रूप से प्रशासनिक सेवाओं के ढ़ाँचे का आधार तैयार किया था और जो कुछ परिवर्तन के साथ अभी भी लागू है, उस पर पुनर्विचार किया जाए। आप बहुत दिनों तक इन प्रश्नों से नहीं बच सकते।
उतना ही बड़ा प्रश्न इन सफल उम्मीदवारों के अंदर कार्य के प्रति निष्ठा, सादगी ईमानदारी और सच्चे जनसेवक बनाने की जमीन भी तैयार करना है। हालांकि यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि आखिर जिस जमीन में बेईमानी चारों तरफ फल-फूल रही हो, वहां उससे बचे रहना आसान नहीं है, लेकिन यूपीएससी की प्रतिष्ठा और देश के शासन-प्रशासन के लिए इसे अब और नहीं टाला जा सकता!
#प्रेमपालशर्मा (पूर्व संयुक्त सचिव भारत सरकार)
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