पीएफए/ईसीआर की बेशर्मी की पराकाष्ठा
बिहार में “जाति” एक ऐसी व्यवस्था है—जो “जाती” ही नहीं। जाति के नाम पर अपराधियों और भ्रष्टाचारियों का संरक्षण इस रेलवे में बहुत ही आम बात है। वैसे तो जाति पूरे देश का चरित्र है, मगर भारतीय रेल का पूर्व मध्य रेलवे जोन इस मामले में बहुत ज्यादा बदनाम है। यहाँ ‘कास्ट’ और ‘कैश’ का खेल सारे नियम-कानून के ऊपर है।
#ECR के हर विभाग में भ्रष्टाचार है, लेकिन लेखा विभाग ‘कैश बेस्ड भ्रष्टाचार’ के साथ-साथ ‘कास्ट बेस्ड भ्रष्टाचार’ के लिए कुख्यात है। यहाँ वर्षों से जमे कर्मचारियों/अधिकारियों का स्थानातंरण भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में एक शुरुआती कदम है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
#CBI की FIR RC0232024A0014 दिनांक 26.10.24 में एक FA&CAO का केवल नाम टाइप होने पर उसको 5 दिनों के अंदर अविलम्ब ट्रांसफर कर दिया जाता है। रेलवे के जानकारों का कहना है कि FA&CAO कभी भी LOA approve नहीं करता है, FIR में दी गई जानकारी फैक्चुअली सही नहीं थी, फिर भी कार्यवाही की गई।
#Railwhispers रेल हित में किए गए सभी कार्यों की सराहना करता है, लेकिन ईसीआर के लेखा विभाग का ‘कास्ट बेस्ड भ्रष्टाचार’ रेलवे के सुधारों में बहुत बड़े व्यवधान पैदा कर रहा है।
#CBI की FIR RC0232026A0005 दिनांक 21.01.26 में लेखा विभाग महेंद्रूघाट, पटना कार्यालय में पैसे लेने की बात स्पष्ट रूप से कही गई है, लेकिन पीएफए की आनाकानी के कारण कर्मचारियों के स्थानातंरण में 50 दिन से अधिक समय लग गया। #PFA की जाति का बिल पासिंग अधिकारी #AFA अभी भी उसी कुर्सी पर जमा हुआ है। यह AFA पहले भी AA और SSO के पद पर लेखा विभाग महेंद्रूघाट, पटना में वर्षों तक पदस्थापित रहा है और ये बताने की आवश्यकता नहीं है कि ये वर्तमान पीएफए के महेंद्रूघाट के पूर्व कार्यकाल में खासमखास था।
जब FIR में नाम या विभाग का नाम आना कार्यवाही का आधार था, तो इस मामले में बिल पासिंग से जुड़े सभी अधिकारियों को हटाने में देरी क्यों की जा रही है! क्या पीएफए जानबूझकर देरी कर रहा है? इस देरी का कारण कहीं कमीशन और लेन-देन तो नहीं है? क्या यह सिस्टमेटिक करप्शन है? इसका स्पष्ट कारण सामने आना चाहिए।
ऐसा पीएफए, जो भ्रष्टाचार की बीमारी को बढ़ावा दे रहा है, उसको तुरंत उखाड़ फेंकना चाहिए। प्रधानमंत्री से आग्रह है कि सिस्टम के ऐसे कलंक को अविलंब हटाया जाना चाहिए। इसमें तनिक भी देरी भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई को कमजोर करेगा और गलत संदेश देगा।
पीएफए/ईसीआर का कुत्सित प्रयास
प्रिंट मीडिया के अधकचरे पत्रकारों को न तो ढ़ंग से नकल करनी आती है—न ही उन्हें रेल सिस्टम की समझ है। ऐसे अधकचरे लोगों को गलत जानकारी देकर जातिवादी पीएफए/ईसीआर ने अपने एक “हम प्याला-हम निवाला” पीएचओडी के साथ मिलकर एक महिला अधिकारी को बदनाम करने का कुत्सित प्रयास किया है। गौर करने वाली बात यह है कि इस तरह इंट्रा जोनल ट्रांसफर का अधिकार केवल पीएफए (कैडर कंट्रोलिंग अथॉरिटी) के पास होता है, इसमें पीएफए/कंस्ट्रक्शन की कोई भूमिका नहीं होती है।

इसकी पूरी जवाबदेही पीएफए/ईसीआर की थी! उन्होंने दायित्व का निर्वहन नहीं किया, उसमें आनाकानी की गई। जीएम/ईसीआर के कड़े रूख के बाद पीएफए/ईसीआर ने स्थानातंरण आदेश निकाला। तथ्यों को तोड़-मरोड़कर इस तरह की गलत और भ्रामक जानकारी देकर किसी भी व्यक्ति के चरित्र पर सवाल खड़े करने वाले ऐसे लोगों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। खासकर महिला अधिकारियों के प्रति इस तरह की घटिया सोच रखने वाले लोगों को व्यवस्था में बने रहने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए।

