उत्तर रेलवे: GatiShakti और ABSS के कार्यों पर प्रश्नचिन्ह: खराब निर्माण, अनावश्यक वैरिएशन और भुगतान में कथित भ्रष्टाचार का मामला

दिल्ली मंडल के नौ रेलवे स्टेशनों पर प्लेटफॉर्म सरफेसिंग और फुट ओवर ब्रिज (FOB) फिनिशिंग की गुणवत्ता जांच की मांग

#RailSamachar को मिले वैरिएशन स्टेटमेंट में मूल BOQ के आइटमों में बड़े बदलाव के आरोप

PVC बिल लंबित, जबकि कुछ फाइनल बिलों के भुगतान में कथित रिश्वत और HOD के दबाव की शिकायतें

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विशेष रिपोर्ट | भारतीय रेल में गति शक्ति और अमृत भारत स्टेशन योजना (#ABSS) के तहत रेलवे स्टेशनों के आधुनिकीकरण पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं और किए जा रहे हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य यात्रियों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना, प्लेटफॉर्मों का आधुनिकीकरण करना और रेलवे के बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाना है।

लेकिन इन परियोजनाओं के क्रियान्वयन, निर्माण गुणवत्ता, कॉन्ट्रैक्ट वैरिएशन और भुगतान व्यवस्था को लेकर गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं।

#RailSamachar को रेलवे के एक सेवानिवृत्त अधिकारी, जो प्रोजेक्ट सुपरविजन सर्विसेस एजेंसी (#PSSA) से जुड़े रहे हैं, के माध्यम से इस संबंध में जानकारी और शिकायतें प्राप्त हुई हैं। उन्होंने निर्माण कार्यों की गिरती गुणवत्ता, ठेकेदारों को दिए जा रहे कथित अतिरिक्त लाभ, अनावश्यक वैरिएशन और भुगतान प्रक्रिया में भारी अनियमितताओं को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है।

भरोसेमंद सूत्रों द्वारा उपलब्ध कराए गए वैरिएशन स्टेटमेंट की प्रतियां भी इस मामले को गंभीर बनाती हैं। इन दस्तावेजों में मूल बिल ऑफ क्वांटिटी (#BOQ) की तुलना में विभिन्न आइटमों में बड़े बदलाव किए जाने की बात सामने आई है। इन बदलावों के तकनीकी औचित्य और वित्तीय प्रभाव की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।

यह मामला केवल निर्माण की गुणवत्ता तक सीमित नहीं है। कई ठेकेदारों के #PVC बिल काफी समय तक लंबित रहने और कुछ अन्य मामलों में फाइनल बिलों के भुगतान को कथित रिश्वत तथा विभागीय दबाव के माध्यम से मंजूरी दिलाने के आरोप भी सामने आए हैं।

1. दिल्ली मंडल के 9 स्टेशनों पर प्लेटफॉर्म और FOB कार्यों की गुणवत्ता संदिग्ध

उपलब्ध कार्य विवरण के अनुसार, प्लेटफॉर्म सरफेसिंग और फुट ओवर ब्रिज (FOB) की फिनिशिंग का कार्य निम्नलिखित नौ स्टेशनों पर कराया जा रहा है:

  1. रोहतक जंक्शन (Rohtak Junction)
  2. बहादुरगढ़ (Bahadurgarh)
  3. मानसा (Mansa)
  4. जींद जंक्शन (Jind Junction)
  5. नरवाना जंक्शन (Narwana Junction)
  6. पलवल (Palwal)
  7. बल्लभगढ़ (Ballabgarh)
  8. फरीदाबाद न्यू टाउन (Faridabad New Town)
  9. पटौदी रोड (Pataudi Road)

इन स्टेशनों पर प्लेटफॉर्म सरफेसिंग और FOB फिनिशिंग के कार्यों की गुणवत्ता को लेकर चिंता जताई गई है।

प्लेटफॉर्म की सतह की समतलता, फिनिशिंग, सामग्री की गुणवत्ता और निर्माण के निर्धारित तकनीकी मानकों का पालन होना अत्यंत आवश्यक है। खराब फिनिशिंग न केवल रेलवे की छवि को प्रभावित करती है, बल्कि भविष्य में रखरखाव और मरम्मत का खर्च भी बढ़ा सकती है।

इसलिए यह जाँचना इसलिए भी आवश्यक है कि क्या संबंधित अधिकारियों ने कार्यों का समुचित निरीक्षण किया? क्या गुणवत्ता परीक्षण निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कराए गए? क्या कार्यों को संतोषजनक प्रमाणित करने से पहले तकनीकी मानकों का सत्यापन किया गया?

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या रेलवे में काम की वास्तविक गुणवत्ता को प्राथमिकता दी जा रही है या केवल कागजों में काम पूरा दिखाकर भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है?

2. अनावश्यक और अनुचित वैरिएशन के जरिए ठेकेदारों को अतिरिक्त लाभ देने के आरोप

मामला केवल निर्माण गुणवत्ता तक सीमित नहीं है। रेलवे के विभिन्न निर्माण कार्यों में अनावश्यक, अनुचित और अकारण बदलाव को लेकर भी लगातार भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतें प्राप्त होने की बात सामने आ रही है।

#RailSamachar को कुछ वैरिएशन स्टेटमेंट्स की प्रतियां प्राप्त हुई हैं। इन दस्तावेजों में मूल BOQ की तुलना में विभिन्न आइटम्स की मात्रा और कार्य के स्वरूप में बड़े बदलाव किए जाने के आरोप हैं।

यदि मूल टेंडर में स्वीकृत आइटमों को हटाकर, उनकी मात्रा घटाकर या उनकी जगह दूसरे आइटम शामिल करके ठेकेदारों को अतिरिक्त वित्तीय लाभ पहुंचाया गया है, तो यह रेलवे की टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

यह भी जांच का विषय है कि कहीं टेंडर के समय प्रतिस्पर्धा के आधार पर निर्धारित कार्य और दरों का वास्तविक स्वरूप बाद में वैरिएशन के माध्यम से तो नहीं बदल दिया गया!

इस संबंध में निम्नलिखित प्रश्न महत्वपूर्ण हैं:

  • क्या मूल BOQ के आइटम्स की मात्रा कम करके अधिक दर वाले नए आइटम शामिल किए गए?
  • क्या कुछ मूल आइटम हटाकर उनकी जगह महंगे आइटम जोड़े गए?
  • क्या कार्य की प्रकृति में बदलाव के लिए वास्तविक तकनीकी आवश्यकता मौजूद थी?
  • क्या प्रत्येक वैरिएशन के लिए उचित तकनीकी औचित्य और सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति प्राप्त की गई?
  • क्या वित्तीय स्वीकृति और निर्धारित संविदात्मक सीमाओं का पालन किया गया?
  • क्या वैरिएशन के कारण मूल टेंडर की प्रतिस्पर्धात्मक शर्तों का प्रभाव बदल गया?
  • क्या किसी विशेष ठेकेदार को अनुचित आर्थिक लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से आइटमों में बदलाव किया गया?

टेंडर के समय प्रतिस्पर्धा के आधार पर दरें तय करना और बाद में वैरिएशन के जरिए ठेकेदारों को अतिरिक्त आर्थिक लाभ पहुंचाना—रेलवे में यह एक सोची-समझी प्रक्रिया बन चुकी है। तथापि यदि जांच में यह तथ्य प्रमाणित होता है, तो यह सार्वजनिक खरीद व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

#RailSamachar के पास उपलब्ध वैरिएशन स्टेटमेंट्स का मूल BOQ, स्वीकृत दरों, संशोधित मात्राओं और अंतिम भुगतान के साथ तुलनात्मक ऑडिट कराया जाना चाहिए।

3. PVC बिल लंबित, लेकिन फाइनल बिलों के भुगतान पर गंभीर प्रश्न

रेलवे की भुगतान व्यवस्था को लेकर भी ठेकेदारों के बीच असंतोष और गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं।

कई ठेकेदारों के प्राइस वैरिएशन क्लॉज (#PVC) के अंतर्गत प्रस्तुत बिल काफी समय से लंबित बताए जा रहे हैं।

PVC का उद्देश्य अनुबंध की लागू शर्तों के अनुसार सामग्री की कीमतों में उतार-चढ़ाव का उचित समायोजन करना है। यदि किसी ठेकेदार ने अनुबंध और लागू जनरल कंडीशंस ऑफ कॉन्ट्रैक्ट्स (#GCC) की शर्तों के अनुसार PVC का दावा प्रस्तुत किया है और वह भुगतान के लिए पात्र है, तो उसके बिल को बिना उचित कारण लंबित रखना गंभीर प्रशासनिक और संविदात्मक दायित्व के प्रति लापरवाही का विषय है।

दूसरी ओर, कुछ मामलों में फाइनल बिल भुगतान को कथित रिश्वत, प्रभाव और विभाग प्रमुख (#HOD) स्तर के दबाव के माध्यम से मंजूरी दिलाने के आरोप सामने आए हैं।

यह स्थिति कई गंभीर मुद्दे उपस्थित करती है:

  1. जब कई ठेकेदारों के वैध PVC बिल लंबित हैं, तो कुछ अन्य मामलों में फाइनल बिल तेजी से कैसे मंजूर हो रहे हैं!
  2. क्या भुगतान की मंजूरी में निर्धारित प्रक्रिया और प्राथमिकता का पालन किया जा रहा है?
  3. क्या किसी अधिकारी ने बिल पास करने के बदले रिश्वत की मांग की या स्वीकार की?
  4. क्या HOD अथवा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने नियमों से हटकर भुगतान मंजूर कराने के लिए दबाव बनाया?
  5. क्या रिश्वत नहीं देने वाले ठेकेदारों के बिल जानबूझकर रोके जा रहे हैं?
  6. क्या समान संविदात्मक परिस्थितियों वाले ठेकेदारों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया जा रहा है?

रेलवे में भुगतान का आधार अनुबंध और नियम होने चाहिए, न कि रिश्वत, व्यक्तिगत संबंध, प्रभाव अथवा किसी HOD का दबाव!

यदि रिश्वत लेकर भुगतान मंजूर करने या किसी ठेकेदार को अनुचित लाभ देने की बात प्रमाणित होती है, तो यह गंभीर सतर्कता और भ्रष्टाचार का मामला बनता है।

4. आवश्यक है मेजरमेंट बुक्स और गुणवत्ता नियंत्रण की स्वतंत्र जांच

निर्माण कार्यों में भुगतान का आधार केवल ठेकेदार द्वारा प्रस्तुत बिल नहीं होता। वास्तविक साइट पर निष्पादित कार्य, स्वीकृत BOQ, मेजरमेंट बुक्स (MB) और गुणवत्ता परीक्षण का आपस में मेल होना आवश्यक है।

इसलिए निम्नलिखित दस्तावेजों की जांच होनी चाहिए:

  • मूल BOQ और संशोधित BOQ
  • सभी वैरिएशन स्टेटमेंट्स और वैरिएशन अप्रूवल ऑर्डर्स
  • मेजरमेंट बुक्स (MBs)
  • साइट माप और लेवल रिकॉर्ड।
  • क्वालिटी कंट्रोल एवं लैबोरेटरी टेस्ट रिपोर्ट्स
  • इंस्पेक्शन रजिस्टर्स
  • रनिंग अकाउंट्स बिल और फाइनल बिल
  • PVC दावे और उनके भुगतान की स्थिति
  • सक्षम प्राधिकारी की प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृतियां
  • ठेकेदारों और रेल अधिकारियों के बीच संबंधित पत्राचार

इन दस्तावेजों के तुलनात्मक परीक्षण से यह पता लगाया जा सकता है कि वास्तविक निर्माण, माप, स्वीकृत वैरिएशन और भुगतान के बीच कोई असामान्य अंतर तो नहीं है।

5. भुगतान और वैरिएशन व्यवस्था पर व्यापक चिंता

यदि विभिन्न रेल परियोजनाओं में अनावश्यक वैरिएशन, भुगतान में देरी और कथित रिश्वत की शिकायतें लगातार प्राप्त हो रही हैं, तो यह केवल कुछ अधिकारियों या ठेकेदारों का मामला नहीं रह जाता।

यह रेलवे की पूरी संविदात्मक निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।

टेंडर जारी करने से लेकर कार्य आवंटित करने, वैरिएशन मंजूर करने, माप दर्ज करने और अंतिम भुगतान तक हर स्तर पर पारदर्शिता आवश्यक है।

रेलवे बोर्ड को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि:

  • टेंडर की मूल प्रतिस्पर्धात्मक शर्तें सुरक्षित रहें, बाद में उनमें कोई बदलाव न हो।
  • वैरिएशन केवल वास्तविक तकनीकी आवश्यकता पर आधारित हों।
  • PVC के पात्र दावों का समयबद्ध निस्तारण हो।
  • फाइनल बिल और PVC भुगतान में भेदभाव न हो।
  • किसी अधिकारी को भुगतान रोकने या मंजूर करने की मनमानी शक्ति न मिले।
  • भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों की स्वतंत्र जांच हो।

6. विजिलेंस से स्वतंत्र जांच की मांग

इन सभी शिकायतों को देखते हुए उत्तर रेलवे के वरिष्ठ उप-महाप्रबंधक (#SDGM) तथा रेलवे बोर्ड के मुख्य सतर्कता अधिकारी(#CVO) के साथ रेलवे बोर्ड विजिलेंस से स्वतंत्र संयुक्त जांच कराने की मांग की जा रही है।

जांच में निम्नलिखित विषय शामिल होने चाहिए:

A. तकनीकी गुणवत्ता ऑडिट
  • सभी नौ स्टेशनों पर प्लेटफॉर्म और FOB कार्यों का स्वतंत्र निरीक्षण।
  • स्वीकृत तकनीकी मानकों और वास्तविक निर्माण की तुलना।
  • दोषपूर्ण कार्यों की पहचान और अनुबंध के अनुसार सुधार।
B. वैरिएशन ऑडिट
  • मूल और संशोधित BOQ का आइटम-वाइज परीक्षण।
  • मात्रा, दर और कार्य के स्वरूप में बदलाव का विश्लेषण।
  • प्रत्येक वैरिएशन के तकनीकी औचित्य और स्वीकृति की जांच।
  • संभावित अनुचित वित्तीय लाभ का आकलन।
C. पीवीसी और भुगतान ऑडिट
  • सभी लंबित PVC बिलों की स्थिति और भुगतान में देरी का कारण।
  • फाइनल बिल की मंजूरी की तारीख और प्रक्रिया।
  • समान परिस्थितियों वाले ठेकेदारों के भुगतान में भेदभाव की जांच।
  • रिश्वत और दबाव संबंधी शिकायतों की स्वतंत्र जांच।
D. अधिकारियों की जवाबदेही
  • संबंधित JE, SSE, ADEN, XEN और HOD की भूमिका की जांच।
  • वैरिएशन की स्वीकृति और भुगतान प्रमाणित करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करना।
  • जहां अनियमितता प्रमाणित हो, वहां संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई।

7. प्राप्त जानकारी से उठे मुद्दे

#RailSamachar को उपरोक्त विषय की समस्त जानकारी रेलवे के एक सेवानिवृत्त अधिकारी के माध्यम से प्राप्त हुई है, जो PSSA से जुड़े रहे हैं।

सूत्र ने रेल निर्माण कार्यों में गुणवत्ता नियंत्रण, वैरिएशन, ठेकेदारों को कथित अतिरिक्त वित्तीय लाभ और भुगतान प्रक्रिया में अनियमितताओं को लेकर चिंता व्यक्त की है।

सूत्र द्वारा उपलब्ध कराए गए वैरिएशन स्टेटमेंट की प्रतियों को मूल BOQ, स्वीकृत दरों और भुगतान रिकॉर्ड के साथ मिलाकर जांचना आवश्यक है।

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सूत्र की पहचान गोपनीय रखी जा रही है।

#RailSamachar का मानना है कि किसी भी आरोप को अंतिम निष्कर्ष मानने के बजाय मूल दस्तावेजों, वित्तीय रिकॉर्ड और स्वतंत्र तकनीकी जांच के आधार पर तथ्यों को सत्यापित और स्थापित किया जाना चाहिए।

8. रेलवे बोर्ड के सामने सबसे बड़ा मुद्दा

भारतीय रेल देश के सबसे बड़े सार्वजनिक अवसंरचना संगठनों में से एक है। गति शक्ति और अमृत भारत स्टेशन योजना जैसी परियोजनाओं का उद्देश्य यात्रियों को बेहतर सुविधाएं देना और रेलवे के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है।

लेकिन यदि एक ओर निर्माण की गुणवत्ता पर प्रश्न उठें, दूसरी ओर वैरिएशन के जरिए ठेकेदारों को अतिरिक्त लाभ पहुंचाने के आरोप लगें और तीसरी ओर वैध पीवीसी बिल लंबित रहने के साथ भुगतान में कथित रिश्वत और दबाव की शिकायतें सामने आएं, तो पूरी संविदात्मक और निगरानी व्यवस्था की समीक्षा आवश्यक हो जाती है।

  • क्या रेलवे में टेंडर केवल काम आवंटित करने का माध्यम बनकर रह गए हैं और वास्तविक वित्तीय लाभ बाद के वैरिएशन तथा भुगतान की प्रक्रिया में तय हो रहा है?
  • क्या रेलवे बोर्ड के पास ऐसी प्रभावी व्यवस्था है जो सुनिश्चित कर सके कि हर ठेकेदार को समान संविदात्मक अधिकार मिलें और हर अधिकारी अपने निर्णयों के लिए जवाबदेह हो?
  • क्या रेलवे की विजिलेंस व्यवस्था इन शिकायतों की निष्पक्ष जांच कर पाएगी?

निष्कर्ष: सार्वजनिक धन, निर्माण गुणवत्ता और जवाबदेही सर्वोपरि

रेलवे के आधुनिकीकरण पर खर्च होने वाला प्रत्येक रुपया जनता की गाढ़ी कमाई (टैक्स) से आता है। इसलिए निर्माण की गुणवत्ता, टेंडर की पारदर्शिता, वैरिएशन की वैधता और भुगतान की निष्पक्षता सुनिश्चित करना रेल प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

केवल कार्य पूरा दिखाना, बिल पास करना और बजट खर्च कर देना-किसी परियोजना की सफलता का प्रमाण नहीं हो सकता!

रेलवे में गति शक्ति का अर्थ केवल काम की गति नहीं, बल्कि निर्माण की गुणवत्ता, वित्तीय पारदर्शिता और अधिकारियों की जवाबदेही भी होना चाहिए!

रेलवे बोर्ड और उत्तर रेलवे को इन शिकायतों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय निर्माण गुणवत्ता, वैरिएशन और भुगतान व्यवस्था के व्यापक ऑडिट के रूप में देखना चाहिए!

अब देखना यह है कि रेलवे बोर्ड और उसका विजिलेंस इन गंभीर मुद्दों पर स्वतंत्र जांच करवाते हैं या फिर शिकायतें विभागीय फाइलों में ही सिमटकर रह जाती हैं।

#RailSamachar की प्रमुख मांगें

  1. दिल्ली मंडल के नौ स्टेशनों पर स्वतंत्र तकनीकी गुणवत्ता ऑडिट।
  2. सभी संदिग्ध वैरिएशन स्टेटमेंट्स की मूल BOQ से तुलना कर जांच।
  3. अनावश्यक और अनुचित वैरिएशन के माध्यम से दिए गए संभावित अतिरिक्त वित्तीय लाभ का आकलन।
  4. लंबित पीवीसी बिलों का अनुबंध के अनुसार समयबद्ध निस्तारण।
  5. फाइनल बिल पेमेंट्स में कथित रिश्वत और HOD के दबाव की स्वतंत्र जांच।
  6. मेजरमेंट बुक्स, क्वालिटी रिपोर्ट्स और पेमेंट रिकॉर्ड्स का फॉरेंसिक एवं वित्तीय परीक्षण, जहां आवश्यक हो।
  7. दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों की जवाबदेही तय करना।
  8. जांच के निष्कर्ष और की गई कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक करना।

#RailSamachar को यह जानकारी रेलवे के एक ऐसे सेवानिवृत्त अधिकारी से प्राप्त हुई है, जो PSSA से जुड़े रहे हैं। अधिकारी ने अपनी पहचान और नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर रेलवे के विभिन्न निर्माण कार्यों, कॉन्ट्रैक्ट वैरिएशन और भुगतान प्रक्रिया से संबंधित कुछ अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज भी उपलब्ध कराए हैं।

इन दस्तावेजों में वैरिएशन स्टेटमेंट्स की प्रतियां भी शामिल हैं, जिनमें मूल BOQ की तुलना में विभिन्न मदों और उनकी मात्राओं में बड़े बदलाव किए जाने का दावा किया गया है। इस रिटायर्ड अधिकारी ने इन बदलावों, निर्माण गुणवत्ता और ठेकेदारों के भुगतान से जुड़े मामलों पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं।

सूत्र की पहचान की गोपनीयता बनाए रखते हुए #RailSamachar भी इन दस्तावेजों और इनसे जुड़े तथ्यों की स्वतंत्र पड़ताल कर रहा है। इन दस्तावेजों की मूल रिकॉर्ड, स्वीकृतियों और भुगतान विवरणों से स्वतंत्र पुष्टि कराना आवश्यक है। मामला गंभीर सार्वजनिक हित से जुड़ा होने के कारण रेलवे बोर्ड और विजिलेंस विभाग से निष्पक्ष जांच की अपेक्षा है।