क्रू बीट विवाद और मुख्यालय का अनावश्यक हस्तक्षेप: मध्य रेल में बढ़ता अंदरूनी टकराव

मुंबई | रेल मंडलों के बीच क्रू बीट आवंटन और प्रशासनिक हस्तक्षेप का विवाद गहराता जा रहा है। पहले बेंगलुरु-मुंबई स्लीपर वंदे भारत के मार्ग को लेकर राजनीतिक उठापटक देखने को मिली थी, और अब मध्य रेलवे विद्युत मुख्यालय के अनावश्यक और मूर्खतापूर्ण हस्तक्षेप के चलते यह विवाद प्रशासनिक स्तर पर तूल पकड़ता जा रहा है। यूनियन सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्तमान में यह संघर्ष इस बात पर केंद्रित हो गया है कि किस मंडल का लोको रनिंग स्टाफ इस प्रीमियम वंदे भारत ट्रेन का संचालन करेगा।

जानकारों और रेलवे सूत्रों के अनुसार इस प्रकार के क्रू आवंटन का निर्णय पारंपरिक रूप से इस आधार पर किया जाता है कि किस मंडल के पास कितनी किलोमीटर की बीट उपलब्ध है, जिससे किसी भी मंडल के क्रू को नुकसान न हो और परिचालन में उचित संतुलन बना रहे। इस स्थापित सिद्धांत को भारतीय रेल की अर्थव्यवस्था और स्वस्थ औद्योगिक संबंधों दोनों के लिए ही अत्यंत आवश्यक माना गया है।

हाल ही में प्रीमियम ट्रेनों को लेकर जिस प्रकार की प्रशासनिक बहस छिड़ी है, उसे लेकर रेलवे हलकों में यह चर्चाएँ होने लगी हैं कि जिस भारतीय रेल परिचालन में मालगाड़ियों के संचालन को सर्वोच्च प्राथमिकता और प्रीमियम दर्जा दिया जाता है, वहाँ इस प्रकार की अनर्गल और आधारहीन बातों का क्या औचित्य है। इसी परिप्रेक्ष्य में मध्य रेल विद्युत मुख्यालय का क्रू आवंटन में हस्तक्षेप अनावश्यक और अनौचित्यपूर्ण माना जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि कुछ अधिकारी अपनी होशियारी दिखाने के चक्कर में व्यवस्था को दुविधा में डाल देते हैं।

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उल्लेखनीय है कि रनिंग स्टाफ की यह किलोमीटर बैलेंसिंग और कार्य व्यवस्था हमेशा से मंडल स्तर पर समझदारी और आपसी समन्वय के साथ तय की जाती रही है, जिसमें जोनल मुख्यालयों के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश कभी नहीं रही। परंतु मध्य रेल विद्युत मुख्यालय ने हाल ही में दो मंडलों के कामकाज में सीधा और अनावश्यक हस्तक्षेप करके अपनी प्रशासनिक अक्षमता का परिचय दिया है, जिसका कि कोई तार्किक आधार भी नहीं था। अब दोनों यूनियनें इस कदम को मुख्यालय द्वारा किया गया पक्षपातपूर्ण और अनावश्यक हस्तक्षेप मानकर उद्वेलित हो रही हैं।

यूनियनों का कहना है कि एक मंडल से ट्रेन की बीट छीनकर दूसरे मंडल को केवल एक और वंदे भारत थमाकर उसे कुल चार वंदे भारत की बीट सौंपने का कोई विधिक या तार्किक औचित्य नहीं बनता, वह भी तब जब किलोमीटर बैलेंसिंग का संतुलन पहले से ही चार वंदे भारत प्राप्त करने वाले मंडल के पक्ष में झुक रहा था। जैसे ही मुख्यालय का यह विवादास्पद पत्र सार्वजनिक हुआ, वैसे ही दूसरे जोन के मंडल भी इस स्लीपर वंदे भारत के संचालन को लेकर आंदोलित होने लगे हैं। रेलवे मामलों के जानकारों का स्पष्ट रूप से यह कहना है कि जब बिना किसी ठोस तर्क या नियम के मुख्यालय द्वारा इस प्रकार का अनावश्यक हस्तक्षेप किया जाएगा और ऐसे अव्यवहारिक निर्णय लिए जाएंगे, तो इस तरह के प्रशासनिक विवाद उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है।

बिना किसी स्पष्ट तर्क और तार्किक औचित्य के लिए गए इन निर्णयों के परिणामस्वरूप श्रमिक संगठन अब मुखर होकर आंदोलन के रास्ते पर उतर आए हैं। रेलवे के गलियारों में यह चर्चा है कि उत्तर मध्य रेलवे से स्थानांतरित होकर आए अधिकारी यह मानकर संतुष्ट हो रहे हैं कि उन्होंने पूर्व में आगरा और कोटा मंडल जैसे मामलों को संभाल लिया था, किंतु उनकी ऐसी अहंकारपूर्ण सोच ही अपने आप में हास्यास्पद है, क्योंकि वे मध्य रेल जैसी ऐतिहासिक और प्रशासनिक शुचिता से संचालित होने वाली व्यवस्था को बिना किसी कारण के संकट में डाल रहे हैं। वे शायद यह भूल जाते हैं कि प्रत्येक जोनल रेलवे की अपनी एक कार्यसंस्कृति और स्थापित परिपाटी होती है, और मध्य रेलवे जैसी पुरानी तथा प्रतिष्ठित रेल प्रणाली में लोको पायलट एवं रनिंग स्टाफ स्वभाव से ही अनुशासित हैं।

#RailSamachar का यह स्पष्ट मत है और कई वरिष्ठ रेल अधिकारी भी इस बात से सहमत हैं कि मेल-एक्सप्रेस गाड़ियों के क्रू बीट निर्धारण में किलोमीटर बैलेंसिंग के सिद्धांत का पालन करने से ही परिचालन लागत नियंत्रित रहती है, वर्क फोर्स के साथ औद्योगिक संबंधों में संतुलन बना रहता है और किसी भी प्रकार के भेदभाव का कोई आरोप या भय उत्पन्न नहीं होता। यदि मध्य रेल विद्युत मुख्यालय के अधिकारी इस प्रकार के अदूरदर्शी निर्णय बिना सोचे-समझे और जल्दबाजी में लागू करने का प्रयास करते रहेंगे, तो रेल कर्मचारी स्वाभाविक रूप से आंदोलित होंगे और इस प्रकार की प्रशासनिक अराजकता की संपूर्ण जवाबदेही उन अधिकारियों पर ही आएगी जो बिना सोचे-समझे और बिना किसी दूरदर्शिता के ऐसे निर्णय लेते हैं।