खलीलाबाद-बहराइच रेल परियोजना: ₹235 करोड़ के टेंडर और अनियमितताओं के आरोपों की जांच की मांग

पूर्वोत्तर रेलवे में निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, माप पुस्तिकाओं और भुगतान प्रक्रिया पर गंभीर आरोप

क्या मूल ठेकों में ही खेल हुआ और अब बैलेंस वर्क टेंडर्स के माध्यम से नए वित्तीय लाभ का रास्ता बनाया गया?

रेलवे विजिलेंस और सीबीआई से संयुक्त जांच की मांग

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खलीलाबाद–बहराइच नई ब्रॉडगेज रेल लाइन परियोजना में दो मूल टेंडर्स के बाद जारी किए गए तीन बैलेंस वर्क टेंडर्स ने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। वर्ष 2024 में टेंडर नं. DYCE-CON-G-GKP-11-2024 का टेंडर ₹65.38 करोड़ तथा टेंडर नं. DYCE-CON-G-GKP-12-2024 का टेंडर ₹98.22 करोड़ में आमंत्रित किया गया था। इसके बाद वर्ष 2026 में टेंडर नं. DYCE-CON-G-GKP-02-2026 का टेंडर ₹58.92 करोड़, टेंडर नं. DYCE-CON-G-GKP-07-2026 का टेंडर ₹81.38 करोड़ और टेंडर नं. DYCE-CON-G-GKP-09-2026 का स्पेशल लिमिटेड टेंडर ₹94.91 करोड़ में जारी किया गया। इस प्रकार तीनों बैलेंस वर्क टेंडर्स की कुल विज्ञापित राशि लगभग ₹235.21 करोड़ है।

#Ep272: बैलेंस वर्क टेंडर में बड़ा घालमेल!

इस परियोजना को लेकर केवल टेंडर आवंटन ही नहीं, बल्कि मूल कार्यों के निष्पादन के दौरान भारी अनियमितताओं के आरोप भी जांच के दायरे में आने चाहिए। आरोप हैं कि कुछ स्थानों पर लेवल बुक में हेरफेर, वास्तविक ग्राउंड लेवल में बदलाव दिखाने, प्रारंभिक एवं अंतिम स्तरों के रिकॉर्ड में अंतर तथा अर्थवर्क की मात्रा बढ़ाकर भुगतान प्राप्त करने जैसी गड़बड़ियां हुई हो सकती हैं। प्रश्न ये है कि क्या मूल सर्वे के लेवल और बाद में तैयार की गई लेवल बुक का स्वतंत्र मिलान कराया गया? क्या ओरिजनल ग्राउंड लेवल, क्रॉस-सेक्शन, चेनज-वाइज माप और भुगतान की गई मात्रा का मिलान किया गया? यदि लेवल में बदलाव दिखाकर अर्थवर्क की मात्रा बढ़ाई गई है, तो इसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी और ठेकेदार की होगी?

सबसे गंभीर आरोप रिश्वतखोरी और मिलीभगत को लेकर भी लगाए जा रहे हैं। क्या कुछ अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच अनुचित लेन-देन के माध्यम से माप पुस्तिकाओं (MB), बिलों, गुणवत्ता निरीक्षण और भुगतान को प्रभावित किया गया? क्या वास्तविक कार्य से अधिक मात्रा प्रमाणित की गई? क्या साइट पर निष्पादित कार्य और एमबी में दर्ज मात्रा में अंतर है? इन आरोपों की स्वतंत्र जांच, संबंधित अधिकारियों एवं ठेकेदारों के वित्तीय लेन-देन तथा उपलब्ध डिजिटल रिकॉर्ड की जांच आवश्यक है। हालांकि, रिश्वतखोरी या मिलीभगत अभी सिद्ध तथ्य नहीं है। इसकी पुष्टि जांच से ही हो सकती है।

गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर प्रश्न उठते हैं। क्या मिट्टी की गुणवत्ता, ब्लैंकेटिंग मटेरियल, कम्पैक्शन, सीबीआर टेस्ट, आरसीसी, स्टील और सीमेंट की वास्तविक गुणवत्ता के अनुरूप भुगतान किया गया? क्या प्रयोगशाला रिपोर्ट और साइट पर इस्तेमाल किए गए मटेरियल का मिलान हुआ? क्या टेस्ट रिपोर्ट्स केवल कागजों पर तैयार की गईं या वास्तव में प्रत्येक महत्वपूर्ण स्थान पर जांच हुई? क्या कम गुणवत्ता वाले मटेरियल को स्वीकृति देकर पूरा भुगतान किया गया? रेलवे को सभी बिलों के साथ एमटीसी, टेस्ट रिपोर्ट, लैब रजिस्टर और साइट निरीक्षण रिपोर्ट का मिलान कराना चाहिए।

मात्रा (#Quantity) में संभावित हेरफेर भी महत्वपूर्ण जांच का विषय है। अर्थवर्क, ब्लैंकेटिंग, बोल्डर बैकिंग, आरसीसी, और अन्य मदों में वास्तविक निष्पादन की तुलना स्वीकृत BOQ, लेवल बुक, क्रॉस-सेक्शन और रनिंग बिलों से की जानी चाहिए। विशेष रूप से यह जांच हो कि पहले भुगतान किए जा चुके कार्यों को बैलेंस वर्क BOQ में दोबारा शामिल तो नहीं किया गया। क्या एक ही कार्य के लिए दो बार भुगतान की स्थिति बनी? क्या मूल अनुबंध में निष्पादित मात्रा को सही तरीके से घटाए बिना नया टेंडर बनाया गया?

जीएसटी को लेकर भी स्वतंत्र वित्तीय जांच होनी चाहिए। क्या जीएसटी सही दर से लगाया गया? क्या सप्लाई और वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट के वर्गीकरण में कोई गड़बड़ी हुई? क्या इनवॉइस, GSTIN, ई-वे बिल, GSTR-1 और GSTR-3B के रिकॉर्ड वास्तविक सप्लाई एवं भुगतान से मेल खाते हैं? क्या किसी मद में जीएसटी का गलत लाभ लिया गया या रेलवे से अनुचित अतिरिक्त भुगतान प्राप्त किया गया? जीएसटी और आयकर से संबंधित रिकॉर्ड का भी क्रॉस-वेरिफिकेशन होना चाहिए।

अब एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि जब मूल कार्यों के निष्पादन में लेवल बुक, मात्रा, गुणवत्ता और भुगतान को लेकर इतने गंभीर आरोप हैं, तो उन्हीं कार्यक्षेत्रों के बैलेंस वर्क टेंडर जारी करने से पहले रेलवे ने क्या स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया? क्या किसी स्वतंत्र एजेंसी से वास्तविक शेष मात्रा प्रमाणित कराई गई? क्या मूल ठेकेदारों की जवाबदेही तय हुई? क्या रिस्क एंड कॉस्ट, पेनल्टी और अन्य संविदात्मक कार्रवाई की गई?

रेलवे विजिलेंस को इन पांचों टेंडर्स के सभी ठेकेदारों, संयुक्त उपक्रम (JV) सदस्यों, L-1 और L-2 कंपनियों की पहचान कर यह भी जांच करना चाहिए कि क्या मूल और बैलेंस वर्क टेंडर्स में वही कारोबारी समूह बार-बार सामने आए? सभी निविदाओं की तुलनात्मक विवरणियां, रिवर्स ऑक्शन रिकॉर्ड, एलओए, मूल अनुबंध, एमबी, लेवल बुक और भुगतान विवरण सार्वजनिक किए जाने चाहिए।

अब रेलवे बोर्ड, सीएओ/सी/पूर्वोत्तर रेलवे, और रेलवे विजिलेंस से सीधे प्रश्न ये हैं कि—

  • क्या सभी लेवल बुक की फोरेंसिक जांच होगी?
  • क्या मूल और अंतिम ग्राउंड लेवल का स्वतंत्र मिलान होगा?
  • क्या अर्थवर्क और ब्लैंकेटिंग की वास्तविक मात्रा का चेनज-वाइज ऑडिट होगा?
  • क्या गुणवत्ता जांच के लिए स्वतंत्र लैब नियुक्त होगी?
  • क्या जीएसटी रिकॉर्ड का विभागीय ऑडिट होगा?
  • क्या रिश्वतखोरी और अधिकारियों-ठेकेदारों की संभावित मिलीभगत की जांच होगी?
  • क्या मूल और बैलेंस वर्क के सभी भुगतान का मिलान कराया जाएगा?

यह मामला केवल टेंडर जारी करने का नहीं है। यह सरकारी धन, इंजीनियरिंग गुणवत्ता और रेलवे की जवाबदेही का मामला भी है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित ठेकेदारों के साथ-साथ माप प्रमाणित करने वाले इंजीनियरों, बिल पास करने वाले अधिकारियों और स्वीकृति देने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।

बैलेंस वर्क टेंडर रेलवे के लिए मजबूरी हो सकता है, लेकिन मूल कार्यों की माप, गुणवत्ता और भुगतान में कथित गड़बड़ियों पर पर्दा डालने का माध्यम नहीं बनना चाहिए।

रेलवे विजिलेंस के साथ सीबीआई और आवश्यकतानुसार जीएसटी विभाग द्वारा भी स्वतंत्र जांच की मांग की जाती है। जांच रिपोर्ट और जिम्मेदार अधिकारियों के नाम सार्वजनिक किए जाने चाहिए।

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