ECR में सिग्नलिंग अव्यवस्था: ‘परफेक्शन; के दावों की पोल खोलती ‘परफेक्टो’ की नाकामी और रेलवे की प्रशासनिक विफलता

पूर्व मध्य रेल के पंडित दीन दयाल उपाध्याय मंडल के अंतर्गत आने वाले सामरिक रूप से अतिसंवेदनशील दिल्ली-हावड़ा रूट के सोननगर-गया जीसी सेक्शन पर गत तीस अक्टूबर से उत्पन्न गंभीर रेलव ट्रैफिक संकट ने एक बार फिर भारतीय रेल की कार्यप्रणाली और लचर ठेका प्रबंधन प्रणालियों को कटघरे में ला खड़ा किया है। इस विकट स्थिति के मूल में सिग्नलिंग क्षेत्र की कुख्यात फर्म मेसर्स परफेक्टो इलेक्ट्रिकल्स की घोर लापरवाही और लचर कार्यशैली बताई जा रही है, जिसने एक बार फिर अपनी पुरानी आदतों के अनुरूप रेल प्रशासन को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है।

प्राप्त अंदरूनी जानकारियों के अनुसार, उक्त सिग्नलिंग ठेकेदार द्वारा रफीगंज-इस्माइलपुर और गुरहारू ब्लॉक सेक्शन के मध्य आटोमैटिक सिग्नलिंग के निर्धारित कार्यों को समयानुसार पूरा करने में पूरी तरह विफल रहने के कारण पूरे रेल खंड की कमर टूट गई, जिसके फलस्वरूप यार्ड री-कनेक्शन का कार्य चौबीस घंटे की भारी देरी से संपन्न हुआ और सैकड़ों की संख्या में महत्वपूर्ण एक्सप्रेस एवं मालगाड़ियां अनिश्चितकाल के लिए विलंबित होकर पटरियों पर खड़ी रहीं। इस गंभीर व्यवधान ने न केवल यात्री सुविधाओं को गहरे संकट में डाला, बल्कि राष्ट्रीय परिवहन के इस अति व्यस्त मार्ग पर माल ढुलाई को भी बुरी तरह प्रभावित किया, जिसका पूरा और सीधा उत्तरदायित्व संबंधित ठेकेदार फर्म पर ही बनता है।

पूर्व मध्य रेल के कई वर्तमान और सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारियों ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि यह कोई पहला अवसर नहीं है जब इस विशेष फर्म के कारण पूर्व मध्य रेलवे को इस तरह की भारी प्रशासनिक और परिचालन संबंधी आपदा का सामना करना पड़ा हो। इतिहास के पन्नों को पलटने पर यह तथ्य सामने आता है कि वर्ष 2012 में भी पटना जंक्शन पर रूट रिले इंटरलॉकिंग यानी आरआरआई प्रणाली के आधुनिकीकरण और स्थापना के दौरान इसी फर्म द्वारा किए गए घटिया एवं त्रुटिपूर्ण कार्यों के कारण भारी अराजकता फैल गई थी, जिससे दानापुर मंडल के विभिन्न स्टेशनों पर ट्रेनों का पहिया थम गया था और यात्रियों को भीषण कठिनाईयों का सामना करना पड़ा था।

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बताते हैं कि उस समय स्थिति इतनी अधिक विस्फोटक हो गई थी कि संकट के इस दौर से उबरने और परिचालन को सुचारू बनाने के लिए रेलवे बोर्ड के शीर्ष अधिकारियों तथा पश्चिम रेलवे के तत्कालीन महाप्रबंधक को लगभग एक महीने तक पटना में ही कैंप करना पड़ा था, ताकि युद्ध स्तर पर सुधार कार्य किए जा सकें। इस गंभीर विफलता के लिए उत्तरदायी पूर्व मध्य रेल के तत्कालीन मुख्य सिग्नल एवं दूरसंचार इंजीनियर/निर्माण का तुरंत तबादला कर दक्षिण पश्चिम रेलवे भेज दिया गया था, जो इस बात का प्रमाण है कि इस फर्म के कार्यों का इतिहास हमेशा से संदेह के घेरे में रहा है।

विडंबना यह है कि यह वही ब्लैकलिस्टेड फर्म है जिस पर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो द्वारा भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के गंभीर मामलों में आपराधिक षड्यंत्र का मामला दर्ज किए जाने के बाद, रेलवे बोर्ड ने सख्त रुख अपनाते हुए 23 अप्रैल 2018 से पांच वर्षों की लंबी अवधि के लिए भारतीय रेल तथा समस्त उत्पादन इकाईयों में व्यावसायिक गतिविधियों से पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया था। इस बहुचर्चित रिश्वतखोरी प्रकरण में फर्म के साझीदार और अन्य संलिप्त अधिकारियों को कानून के शिकंजे में कसते हुए जेल की हवा तक खानी पड़ी थी, जिससे रेलवे के ठेका तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की कलई खुल गई थी।

हालांकि, जैसे ही वर्ष 2023 में इस पांच वर्षीय प्रतिबंध की अवधि समाप्त हुई, इस फर्म ने अपनी पुरानी कार्यसंस्कृति के साथ एक बार फिर रेलवे के सिग्नलिंग अनुबंधों को हथियाने का सिलसिला शुरू कर दिया और आरोप यह है कि बिना किसी धरातलीय प्रगति या वास्तविक कार्य के ही मनमाने ढंग से भुगतानों के लिए दबाव बनाया जाने लगा। इस पर त्वरित कार्रवाई करते हुए पूर्व मध्य रेल के मुख्य सिग्नल एवं दूरसंचार इंजीनियर/निर्माण/नार्थ ने काम में अपेक्षित प्रगति न होने और उदासीनता बरतने के कारण इस फर्म के अनुबंध को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया था, जिससे इसकी कार्यशैली पर एक बार फिर मुहर लग गई थी।

तमाम पूर्ववर्ती काली करतूतों, गंभीर अनियमितताओं और प्रतिबंधों के इतिहास को ताक पर रखते हुए, वर्ष 2023 में एक बार फिर इसी फर्म को पंडित दीन दयाल उपाध्याय मंडल के सोननगर-मानपुर खंड के मध्य ऑटोमैटिक सिग्नलिंग का संवेदनशील कार्य सौंप दिया गया, जिसे वर्ष 2025 तक पूरा करने की समय-सीमा निर्धारित की गई थी। एक बार फिर अपने पुराने आचरण को दोहराते हुए यह फर्म निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने और समय पर कार्य पूरा करने में पूरी तरह विफल साबित हुई है, जिससे पूर्व मध्य रेल प्रशासन के समक्ष एक विकट प्रशासनिक और परिचालन चुनौती खड़ी हो गई है।

इस गंभीर विलंब के कारण अब रेलवे के अति महत्वाकांक्षी और सुरक्षा केंद्रित कवच परियोजना के क्रियान्वयन पर भी सीधा और प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, क्योंकि ऑटोमैटिक सिग्नलिंग का कार्य अधूरा रहने से कवच प्रणाली की स्थापना का रास्ता अवरुद्ध हो गया है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए अब रेल प्रशासन द्वारा यह विचार किया जा रहा है कि ऑटोमैटिक सिग्नलिंग के कार्य के पूरा होने की प्रतीक्षा किए बिना ही कवच परियोजना को आगे बढ़ाया जाए, किंतु इसके साथ ही यह गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक प्रश्न भी मुंह बाए खड़ा है कि यदि अधूरे छोड़े गए सिग्नलिंग हिस्से को बाद में दोबारा किया जाता है, तो उस पर होने वाले अतिरिक्त और बेहिसाब खर्च का बोझ कौन वहन करेगा? #RailSamachar इस गंभीर मामले पर और जानकारी जुटा रहा है। क्रमशः