विशेष रिपोर्ट: EPC टेंडर्स में लिटिगेशन की शर्त: रेलवे स्पष्ट करे—लिटिगेशन और आर्बिट्रेशन की परिभाषा क्या है?
इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट, एंड कॉन्ट्रैक्ट (#EPC) टेंडर में लंबित #आर्बिट्रेशन और #लिटिगेशन मामलों को ठेकेदारों की पात्रता से जोड़ने की व्यवस्था पर प्रश्न उठ रहे हैं। निर्माण क्षेत्र से जुड़े ठेकेदारों की मांग है कि टेंडर्स में ऐसी शर्तें शामिल करने से पहले रेलवे यह स्पष्ट करे कि लिटिगेशन और आर्बिट्रेशन का अर्थ क्या है? किन मामलों को इनके अंतर्गत गिना जाएगा और किन परिस्थितियों में किसी कंपनी को अयोग्य ठहराया जा सकता है?
₹50 करोड़ की नेटवर्थ वाली कंपनी का मामला
यदि किसी कंपनी की नेटवर्थ ₹50 करोड़ है और रेलवे या अन्य सरकारी विभागों से अपने वैध बकाये की वसूली के लिए उसके आर्बिट्रेशन मामले पिछले 10–15 वर्षों से लंबित हैं, तो क्या केवल इन मामलों के लंबित होने के आधार पर उसे ईपीसी टेंडर के लिए अयोग्य ठहराना उचित होगा?
ठेकेदारों का तर्क है कि लंबित विवाद अपने आप में न तो वित्तीय अक्षमता का प्रमाण है और न ही किसी कंपनी के दोषी होने का। सरकारी विभागों के साथ भुगतान, अतिरिक्त कार्य, अनुबंध की व्याख्या और मूल्य वृद्धि जैसे विषयों पर विवाद हो सकते हैं, जिनका निपटारा वर्षों तक लंबित रह सकता है।
रेलवे पहले स्पष्ट करे—लिटिगेशन और आर्बिट्रेशन क्या हैं?
जानकारों का मानना है कि टेंडर दस्तावेजों में केवल लिटिगेशन या आर्बिट्रेशन शब्द लिख देना पर्याप्त नहीं है। रेलवे को स्पष्ट और विस्तृत परिभाषाएँ देनी चाहिए, ताकि सभी बोलीदाता एक ही नियम को समान तरीके से समझ सकें।
रेलवे को निम्न प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर देना चाहिए:
- लिटिगेशन: क्या इसमें केवल न्यायालय में लंबित मुकदमे शामिल होंगे, या अपील, रिट याचिका, वाणिज्यिक विवाद और अन्य न्यायिक कार्यवाही भी शामिल होंगी?
- आर्बिट्रेशन: क्या इसमें केवल शुरू हो चुकी मध्यस्थता कार्यवाही शामिल होगी, या आर्बिट्रेशन के लिए भेजे गए दावे, लंबित मध्यस्थता, पारित अवार्ड के विरुद्ध चुनौती और अवार्ड के निष्पादन की कार्यवाही भी शामिल होगी?
- दावों का प्रकार: क्या सरकारी विभाग से अपना भुगतान प्राप्त करने के लिए दायर मामला और सरकारी विभाग द्वारा ठेकेदार से वसूली के लिए शुरू किया गया मामला—एक ही श्रेणी में गिना जाएगा?
- मामले का परिणाम: क्या केवल लंबित मामले गिने जाएंगे, या अंतिम निर्णय में स्थापित संविदात्मक उल्लंघन और देनदारियाँ भी पात्रता को प्रभावित करेंगी?
- वित्तीय प्रभाव: यदि किसी कंपनी की नेटवर्थ ₹50 करोड़ है, तो क्या उसके विरुद्ध लंबित दावों की पूरी राशि को देनदारी मान लिया जाएगा, भले ही विवाद का अंतिम निर्णय न हुआ हो?
- समय-सीमा: क्या 10–15 वर्ष पुराने मामलों को भी बिना किसी अतिरिक्त कसौटी के पात्रता पर असर डालने दिया जाएगा?
इन प्रश्नों पर स्पष्टता के बिना अस्पष्ट शर्तों के कारण अलग-अलग निविदाओं में अलग व्याख्या और बोलीदाताओं के साथ असमान व्यवहार की आशंका बनी रह सकती है।
सरकार को पैसा देना हो तो अलग कार्रवाई हो
ठेकेदारों की प्रस्तावित नीति के अनुसार, यदि किसी कंपनी पर रेलवे या अन्य सरकारी विभाग का पैसा देना बकाया है और उसकी देनदारी विधिवत स्थापित है, तो लागू नियमों के अनुसार उसका वित्तीय आकलन किया जाना चाहिए। संबंधित निविदा शर्तों के अंतर्गत, जहाँ आवश्यक और अनुमत हो, ऐसी देनदारी को कंपनी की वित्तीय क्षमता तथा पात्रता के मूल्यांकन में शामिल किया जा सकता है।
इसके विपरीत, यदि कोई कंपनी सरकारी विभाग से अपना वैध बकाया प्राप्त करने के लिए आर्बिट्रेशन या लिटिगेशन कर रही है, तो केवल उस कार्यवाही को उसके विरुद्ध अयोग्यता का स्वतः आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
यह अंतर विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि किसी कंपनी द्वारा दावा किया जाना, किसी दावे का लंबित होना और किसी देनदारी का अंतिम रूप से स्थापित होना तीन अलग-अलग स्थितियाँ हैं।
अधिकारियों और ठेकेदारों के अधिकार
सरकारी कर्मचारी भी पदोन्नति, वेतनमान और छठे, सातवें तथा आठवें वेतन आयोग से जुड़े लाभों के लिए न्यायालय का सहारा ले सकते हैं। इसी प्रकार, ठेकेदारों को भी अपने संविदात्मक अधिकारों के संरक्षण के लिए उपलब्ध कानूनी उपाय अपनाने का अवसर मिलना चाहिए।
कानूनी लड़ाई लड़ना अपने आप में दोषी होना नहीं है। यदि किसी मामले में धोखाधड़ी, गंभीर संविदात्मक उल्लंघन या अन्य अयोग्यता का आधार मौजूद है, तो उस पर लागू नियमों और संबंधित तथ्यों के अनुसार निर्णय लिया जाना चाहिए।
कुछ महत्वपूर्ण सुझाव
- ईपीसी टेंडर में लिटिगेशन और आर्बिट्रेशन की अलग-अलग, स्पष्ट परिभाषाएं/व्याख्याएं दी जाएं।
- यह बताया जाए कि किन न्यायिक और मध्यस्थता कार्यवाहियों का खुलासा करना अनिवार्य है।
- सरकारी विभाग से बकाया लेने वाले दावों और सरकार को देय प्रमाणित रकम के बीच अंतर किया जाए।
- केवल लंबित मामलों की संख्या या अवधि के आधार पर स्वतः अयोग्यता न हो।
- अयोग्यता के लिए स्पष्ट मानदंड, उचित कारण और निष्पक्ष मूल्यांकन प्रक्रिया निर्धारित की जाए।
- टेंडर जारी करने से पहले सभी संभावित बोलीदाताओं के लिए एक समान स्पष्टीकरण उपलब्ध कराया जाए।
निष्कर्ष
रेलवे का उद्देश्य सक्षम और वित्तीय रूप से मजबूत ठेकेदारों का चयन करना तथा सरकारी धन की सुरक्षा करना होना चाहिए। इसके लिए अस्पष्ट शर्तों के बजाय स्पष्ट परिभाषाओं और वस्तुनिष्ठ मानदंडों की आवश्यकता है।
रेलवे बताए कि लिटिगेशन क्या है, आर्बिट्रेशन क्या है, कौन-से मामले इनके अंतर्गत गिने जाएंगे और किस आधार पर किसी कंपनी को अयोग्य माना जाएगा।
नियम ऐसे होने चाहिए कि सरकार की वास्तविक वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित हो, लेकिन अपने वैध बकाये के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने वाले ठेकेदारों को केवल इसी कारण प्रतिस्पर्धा से बाहर न होना पड़े।
रेलवे को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि डिबारमेंट, ब्लैकलिस्टिंग या किसी अन्य दंडात्मक कार्रवाई से संबंधित वे मामले, जो न्यायालय में लंबित हैं, उन्हें ईपीसी टेंडर की पात्रता निर्धारित करते समय किस प्रकार देखा जाएगा। यदि किसी कंपनी ने अपने विरुद्ध जारी ब्लैकलिस्टिंग या डिबारमेंट ऑर्डर को न्यायालय में चुनौती दी है और मामला अभी विचाराधीन है, तो क्या केवल उस मुकदमे के लंबित होने के कारण कंपनी को अयोग्य ठहरा दिया जाएगा, भले ही न्यायालय ने आदेश पर रोक लगा रखी हो? रेलवे को स्पष्ट करना चाहिए कि ऐसे मामलों में मूल आदेश की स्थिति, न्यायालय द्वारा दिए गए स्थगनादेश (स्टे ऑर्डर) या अन्य अंतरिम राहत तथा अंतिम निर्णय को किस प्रकार ध्यान में रखा जाएगा?
इसी तरह, विभागीय तौर पर यदि किसी कंपनी के विरुद्ध ब्लैकलिस्टिंग या डिबारमेंट की कार्यवाही अभी केवल प्रस्तावित है और कोई अंतिम आदेश पारित नहीं हुआ है, तो उसे दोषी मानने का आधार क्या होगा? टेंडर शर्तों में स्पष्ट अंतर होना चाहिए—लंबित आरोप, पारित आदेश, न्यायालय द्वारा स्थगित आदेश और अंतिम रूप से प्रभावी डिबारमेंट—अलग-अलग स्थितियाँ हैं। इन सभी के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और समान रूप से लागू मानदंड निर्धारित किए जाने चाहिए, ताकि सरकारी हितों की रक्षा के साथ-साथ कंपनियों को निष्पक्ष सुनवाई और न्यायिक उपचार का अधिकार भी मिल सके।

