शोबाजी बनाम सुरक्षा: क्या भारतीय रेल केवल ‘इवेंट मैनेजमेंट’ का अखाड़ा बनकर रह गई है?
भारतीय रेल—जो देश की जीवन रेखा कही जाती है—आज अपनी मूल पटरियों से भटकती नजर आ रही है। रेलवे के पास देश का सबसे बड़ा मानव संसाधन और विशाल ढ़ांचा है, लेकिन विडंबना यह है कि इस संसाधन का उपयोग यात्री सुविधाओं, संरक्षा-सुरक्षा, और तकनीकी उन्नयन के बजाय कथित तौर पर राजनीतिक अभियानों और ‘इवेंट मैनेजमेंट’ के लिए किया जा रहा है। आज पूरी भारतीय रेल के 7000 से अधिक रेलवे स्टेशनों पर ‘जन-संवाद’ कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें सभी स्टेकहोल्डर्स के अलावा जेन-जी युवाओं की भी भागीदारी करवाई जाएगी और इसके तुरंत बाद झाड़ू लगाने का कार्यक्रम प्रायोजित होगा।
स्वच्छता और शुद्ध पानी की उपलब्धता आदि के ये सारे आयोजन 2 अक्टूबर से लगातार चल रहे हैं, जबकि सेफ्टी, मेंटेनेंस, प्रोजेक्ट्स की प्रगति और ट्रेनों की पंक्चुअलिटी इत्यादि के ड्राइव सब पीछे चले गए हैं, क्योंकि इनमें शोबाजी का माइलेज नहीं मिलता है। चूंकि सरकार के पास बाकी मंत्रालयों की अपेक्षा रेलवे में ही सबसे अधिक मानव संसाधन सहित बाकी संसाधन भी उपलब्ध हैं, इसलिए रेलवे और यात्रियों की दैनंदिन सुविधाओं को दरकिनार कर सारी वर्क फोर्स को सरकारी कामकाज के विज्ञापन के लिए ‘इवेंट मैनेजमेंट’ में लगा दिया जाता है। मगर सरकार को यह पता नहीं होता है कि इस सब की आड़ में ‘जनता के नौकर’ केवल अपने निजी लाभ के लिए किस तरह देश को और सिस्टम को खोखला कर रहे हैं।
इसी महीने सतर्कता अभियान भी चल रहा है, पानी की गुणवत्ता का अभियान, पैंट्री कार की चेकिंग ड्राइव, आवारा कुत्ते कितने हैं और उनका क्या करना है—ये भी प्राथमिकता पर है, और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट की गूगल शीट भी घूम रही है, साथ ही सभी स्टेशनों के लिए फ्लेक्स बोर्ड बन गए हैं। इन सब से दैनंदिन के काम कितने प्रभावित हो रहे हैं, निर्णयों की, उत्पादन की, सेवाओं की गुणवत्ता में आई भारी कमी, बढ़ता हुआ खर्चा, रेल की बिजली पर अचानक लगा टैक्स, गाड़ियों में बढ़ती भीड़ और गंदगी, ये सब काम इस ‘रील बनाओ अभियान’ और लगातार ‘इवेंट मैनेजमेंट’ से नहीं सँभलेंगे।
भारत सरकार के सभी अभियानों में संख्या बल रेल से ही आता है, और मोदी जी कभी रेल मंत्रालय से मूल प्रश्न तो कर लें क्योंकि दुनिया भर की रील बनाने में व्यस्त लोग बालासोर, पुरी और बंडामुंडा कर बैठे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार के खर्च में 10,000 करोड़ का अतिरिक्त खर्च सही पाया है, क्योंकि ऑफिस ऑर्डर 58/2016 के चलते किसी को अपना काम देखने की फुर्सत ही नहीं है।
आज स्थिति यह है कि रेलवे बोर्ड के चेयरमैन, CME/RCF से LED फिटिंग की इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन पर चर्चा करते हैं, और इस पर एक सुपरवाइजर ने कमेंट किया कि जिस स्तर की बात लेवल-17 और 15 के अधिकारी की हुई, वह केवल यह बताती है कि रेल के शीर्ष नेतृत्व को यह भी नहीं पता कि कौन सा काम किसे करना चाहिए, जिसका परिणाम यह होगा कि हर चीज के दाम बढ़ जाएंगे और फायर सेफ्टी वहीं की वहीं रह जाएगी।
आज दोपहर से पहले एक लाख से अधिक फोटो सोशल मीडिया पर डाल दी जाएंगी, लेकिन ट्रेन में आग लगे या कोर्ट में सरकार और ‘जनता के नौकरों’ के कपड़े उतार दिए जाएं—इससे क्या अंतर पड़ता है!

