खलीलाबाद–बहराइच रेल प्रोजेक्ट: मिट्टी की मात्रा और गुणवत्ता को लेकर टेंडर विवाद और वित्तीय घालमेल
खलीलाबाद–बहराइच नई रेल लाइन परियोजना में अब मिट्टी और ब्लैंकेटिंग की पूरी कुंडली खुलेगी! मिट्टी की मात्रा हो या क्वालिटी, या ब्लैंकेटिंग की गुणवत्ता और मोटाई, एल-सेक्शन हो या ओरिजनल ग्राउंड लेवल (OGL) और नेचुरल ग्राउंड लेवल (NGL)—के हर रिकॉर्ड, हर माप और हर सैंपल की जाँच होनी चाहिए। स्वीकृत ड्रॉइंग, लेवल बुक, साइट की वास्तविक स्थिति और भुगतान की गई मात्रा का मिलान होना चाहिए। आखिर धरातल पर रेलवे की पटरी मजबूत बनानी है, केवल कागजों पर नहीं!
मिट्टी कितनी आई, कैसे आई, कहां से आई, कैसी आई, कितनी बिछी और कितनी दबाई गई, सबका हिसाब होना चाहिए। खलीलाबाद–बहराइच रेल लाइन में मिट्टी का ऐसा रायता फैलाया गया है कि किसकी मिट्टी कम हुई, किसकी बढ़ गई और किसके समायोजन से हिसाब बराबर हुआ—इसी में कई अधिकारियों की कुर्सी डोलने लगी है और कई ठेकेदारों की बोलती बंद हो गई!
अब एक ही माँग है—लेवल बुक खोलिए, गाड़ी की पर्चियाँ मिलाइए और हिसाब लगाइए। मिट्टी जमीन पर कितनी थी और कागजों में कितनी हो गई? क्योंकि मिट्टी का खेल है, यहाँ नींव से पहले हिसाब की खुदाई आवश्यक है!
खलीलाबाद-बहराइच नई रेल लाइन परियोजना में ओरिजनल टेंडर के बाद “बैलेंस वर्क” के दो ओपन टेंडर और एक स्पेशल लिमिटेड टेंडर (एसएलटी) किया गया है। एक टेंडर अगस्त में रांची की एक फर्म को दिया गया है, जबकि एक ओपन टेंडर 22.10.2026 को और एसएलटी 28.10.2026 को खुलेगा। भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार, पहले ठेकेदार को तब टर्मिनेट किया गया जब लगभग एक महीने पहले ही उसे करीब बीस करोड़ की एनएस आइटम दी गई थी और इसके लिए पचास लाख रुपये संबंधित कंस्ट्रक्शन अधिकारियों को और पचीस लाख रुपये अकाउंट्स अधिकारियों को मिले थे।
सूत्रों का कहना हैं कि इतनी बड़ी डील (लेनदेन) होने के बावजूद और बिना किसी सूचना के टेंडर टर्मिनेट कर दिए जाने से बौखलाए ठेकेदार ने संबंधित चीफ इंजीनियर के चैंबर में घुसकर उसे न केवल काफी भला-बुरा कहा, बल्कि दो-चार झापड़ भी लगा दिए। हालाँकि #Railwhispers इस घटना की पुष्टि नहीं करता है। मगर यदि वास्तव में ऐसा हुआ है तो यह बहुत शर्मनाक बात है। इससे उन चर्चाओं को बल मिलता है कि इस परियोजना में बहुत बड़ा घालमेल हुआ है।
एक विशेष बातचीत के दौरान कुछ रेल अधिकारियों से मिली जानकारी के अनुसार, कथित तौर पर पहले मिट्टी की मात्रा घटाई गई और बाद में समायोजन के माध्यम से उसे दोबारा बढ़ा दिया गया। यदि ऐसा हुआ है, तो यह गंभीर जाँच का विषय है कि मिट्टी की मूल स्वीकृत मात्रा, संशोधित मात्रा और भुगतान योग्य मात्रा में बदलाव किस आधार पर किया गया, किस अधिकारी ने इसकी मंजूरी दी और क्या साइट की वास्तविक माप इसका समर्थन करती है। माँग है कि मूल एवं संशोधित BOQ, लेवल बुक, चेनज-वार अर्थवर्क रिकॉर्ड, माप पुस्तिकाओं और भुगतान बिलों का स्वतंत्र मिलान कराया जाए तथा संबंधित अधिकारियों की भूमिका और जवाबदेही निर्धारित की जाए। जब तक इस कथित समायोजन की भौतिक रूप से तथ्यात्मक जाँच पूरी नहीं होती, संदिग्ध मदों के भुगतान पर नियमानुसार रोक लगाने पर विचार किया जाए।
सोशल मीडिया पर ऐसी अनेक वीडियो उपलब्ध हैं, जिनमें खलीलाबाद–बहराइच रेल लाइन के आसपास दूर-दूर तक खेतों का लेवल लगभग एकसमान दिखाई देता है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि OGL और NGL के वास्तविक रिकॉर्ड क्या कहते हैं और अर्थवर्क की मात्रा किस आधार पर निर्धारित की गई?
यदि कहीं खेतों का प्राकृतिक स्तर लगभग बराबर है, तो संबंधित चेनज पर मूल सर्वे, लेवल बुक, एल-सेक्शन, क्रॉस-सेक्शन, मिट्टी की भराई की मोटाई और भुगतान की गई मात्रा का मिलान कराया जाना चाहिए। उपलब्ध वीडियो अपने आप में गड़बड़ी का प्रमाण नहीं हैं, लेकिन वे जाँच के लिए महत्वपूर्ण संकेत दे सकते हैं। हर चेनज की वास्तविक स्थिति सामने आए, रिकॉर्ड की स्वतंत्र जाँच हो और मिट्टी की मात्रा का हिसाब सार्वजनिक किया जाए—तभी दूध का दूध और पानी का पानी होगा! क्रमशः

