पूर्वोत्तर रेलवे में ₹235 करोड़ से अधिक के ‘बैलेंस वर्क’ टेंडर चर्चा में, मूल ठेकों सहित जीएसटी और बिड कैपेसिटी तक जाँच की माँग

खलीलाबाद–बहराइच नई रेल लाइन परियोजना के तीन टेंडरों ने बड़े प्रश्न खड़े किए हैं; क्या थे मूल ठेकों के मूल्य? क्यों बचे इतने काम? और किसकी तय होगी जवाबदेही?

पूर्वोत्तर रेलवे के निर्माण संगठन, गोरखपुर (CAO-C-NER-ENGG/GKP) द्वारा खलीलाबाद–बहराइच नई ब्रॉड गेज रेल लाइन परियोजना से संबंधित तीन बड़े ‘बैलेंस वर्क’ टेंडर जारी किए जाने के बाद परियोजना की लागत, मूल ठेकों की स्थिति और कार्यों की वास्तविक प्रगति को लेकर कई प्रश्न उठ रहे हैं। उपलब्ध टेंडर दस्तावेजों के अनुसार, इन तीनों कार्यों की कुल विज्ञापित लागत लगभग ₹235.21 करोड़ है। प्रश्न यह है कि जब ये कार्य मूल परियोजना का हिस्सा थे, तो मूल ठेकों में कितना काम पूरा हुआ, कितना भुगतान किया गया और अब इतने बड़े मूल्य के बैलेंस वर्क की आवश्यकता क्यों पड़ी?

  • पहला टेंडर संख्या DYCE-CON-G-GKP-02-2026 है। इसके अंतर्गत बखिरा–मेंहदावल सेक्शन में अर्थवर्क, फॉर्मेशन, ब्लैंकेटिंग और रिटेनिंग वॉल के निर्माण का बैलेंस वर्क शामिल है। इस टेंडर की विज्ञापित लागत ₹58,91,608,973? नहीं, उपलब्ध दस्तावेज में राशि ₹58,916,089.73 दर्ज है, अर्थात लगभग ₹58.92 करोड़। दस्तावेज में टेंडर बंद होने की तारीख 15 जून 2026 दी गई है।
  • दूसरा टेंडर संख्या DYCE-CON-G-GKP-07-2026 है। इसमें मेंहदावल से खेसरहा सेक्शन के बीच माइनर ब्रिज संख्या 40, 44, 46, 53 और 60 सहित अर्थवर्क, फॉर्मेशन तथा ब्लैंकेटिंग के बैलेंस वर्क शामिल हैं। इसकी विज्ञापित लागत ₹81,38,02,081.72, अर्थात लगभग ₹81.38 करोड़ है। दस्तावेज के अनुसार, इस टेंडर की अंतिम तारीख 22 अक्टूबर 2026 है।
  • तीसरा टेंडर संख्या DYCE-CON-G-GKP-08-2026 है। इसके अंतर्गत भगौली से बखिरा सेक्शन के बीच माइनर ब्रिज संख्या 15, 25, 35 और 37 तथा अर्थवर्क, फॉर्मेशन और ब्लैंकेटिंग के बैलेंस वर्क शामिल हैं। इसकी विज्ञापित लागत ₹94,90,98,102.56, अर्थात लगभग ₹94.91 करोड़ है। इस टेंडर की अंतिम तारीख 28 अक्टूबर 2026 दर्ज है।

इस प्रकार तीनों टेंडरों की कुल विज्ञापित लागत लगभग ₹235.21 करोड़ बैठती है।

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इन आंकड़ों के सामने आने के बाद सबसे पहला प्रश्न मूल ठेकों की लागत और उनकी वर्तमान स्थिति को लेकर है। इन सेक्शनों में पहले कितने रुपये के ठेके दिए गए थे? मूल ठेकेदारों को अब तक कितना भुगतान किया जा चुका है? मूल अनुबंधों में कितना काम पूरा दिखाया गया और कितना काम अधूरा छोड़ा गया? क्या काम की मात्रा, डिजाइन, साइट की स्थिति या अन्य तकनीकी कारणों से बैलेंस वर्क की आवश्यकता पैदा हुई, अथवा अनुबंधों के निष्पादन में ऐसी कमियाँ रहीं जिनकी जाँच आवश्यक है? इन प्रश्नों का जवाब मूल LOA, स्वीकृत BOQ, भुगतान विवरण और सेक्शन-वार प्रगति रिपोर्ट से ही मिल सकता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या मूल ठेकों को समाप्त करने या उनके संबंध में अन्य दंडात्मक कार्रवाई करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की आवश्यक मंजूरी ली गई थी? क्या टर्मिनेशन की प्रक्रिया निर्धारित अनुबंध शर्तों के अनुसार पूरी की गई? क्या ठेकेदारों को नोटिस, जवाब देने का अवसर और नियमानुसार समय दिया गया? संबंधित फाइल नोटिंग, अनुमोदन, टर्मिनेशन आदेश और विभागीय जाँच का रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि जिम्मेदारी ठेकेदार की थी, विभागीय निर्णयों की थी या दोनों पक्षों से जुड़ी परिस्थितियों की।

निर्माण कार्यालय से जुड़ी स्थानीय चर्चाओं में ₹100 करोड़ से अधिक के संभावित वित्तीय समायोजन की आशंका भी व्यक्त की जा रही है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध दस्तावेजों से नहीं होती। इसलिए इस विषय में अनुमान के आधार पर किसी व्यक्ति या कंपनी को दोषी ठहराने के बजाय मूल ठेकों, भुगतान, शेष कार्य की गणना और नए टेंडरों की दरों का स्वतंत्र वित्तीय ऑडिट कराया जाना चाहिए। जाँच में यह देखा जाना चाहिए कि कहीं एक ही कार्य की मात्रा, भुगतान या लागत का दोहरा आकलन तो नहीं हुआ और क्या प्रत्येक मद के लिए उचित तकनीकी आधार उपलब्ध है।

जीएसटी (#GST) से संबंधित संभावित अनियमितताओं की भी जाँच की माँग उठाई गई है। आरोप है कि कुछ मदों की मात्रा या वर्गीकरण में बदलाव के कारण किसी कंपनी को अनुचित जीएसटी लाभ मिल सकता है। इस आरोप की पुष्टि के लिए मूल और संशोधित BOQ, टेंडर की शर्तें, लागू जीएसटी दरें, सप्लाई एवं कार्य निष्पादन के बिल, भुगतान रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों की स्वीकृतियों का मिलान आवश्यक है। यदि किसी मद में बदलाव किया गया है, तो उसका तकनीकी और वित्तीय औचित्य भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए। केवल आरोप के आधार पर इसे जीएसटी घोटाला घोषित करना उचित नहीं होगा; निष्कर्ष दस्तावेजों की जाँच के बाद ही निकाला जाना चाहिए।

रेलवे के कार्यों में वास्तविक मात्रा और भुगतान की पुष्टि के लिए लेवल बुक, मेजरमेंट बुक, चेनज-वार अर्थवर्क रिकॉर्ड, ब्लैंकेटिंग की मात्रा, ब्रिज निर्माण के माप, साइट निरीक्षण रिपोर्ट और भुगतान बिल अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए माँग है कि संबंधित मूल रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएँ और आवश्यकतानुसार केंद्रीय सतर्कता आयोग (#CVC) तथा केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (#CBI) द्वारा जाँच की जाए। विशेष रूप से यह सत्यापित किया जाना चाहिए कि अलग-अलग टेंडरों में शामिल कार्यों की सीमाएँ स्पष्ट हैं और किसी स्थान पर एक ही मात्रा की दो बार माप या भुगतान की स्थिति नहीं बनी।

टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता भी जाँच का अहम हिस्सा होनी चाहिए। प्रत्येक टेंडर में कितने ठेकेदारों ने भाग लिया, कितने तकनीकी रूप से योग्य पाए गए, किन्हें अयोग्य घोषित किया गया, L1 कौन रहा और स्वीकृत दर क्या रही—इन सभी जानकारियों का खुलासा किया जाना चाहिए। यदि किसी कार्य को स्पेशल लिमिटेड टेंडर (#SLT) प्रक्रिया के अंतर्गत आमंत्रित किया गया था, तो संबंधित आमंत्रित कंपनियों, पात्रता मानदंडों और चयन के आधार का विवरण भी सामने आना चाहिए। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि प्रतिस्पर्धा पर्याप्त थी या नहीं, और क्या निविदा प्रक्रिया में किसी प्रकार का अनुचित लाभ दिए जाने की संभावना थी।

एक अन्य आरोप यह भी है कि संबंधित कार्य कर रही किसी कंपनी को पहले भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (#NHAI) द्वारा ब्लैकलिस्ट किया गया था। इस दावे की पुष्टि संबंधित आदेश, उसकी अवधि और वर्तमान कानूनी स्थिति की जाँच करके की जानी चाहिए। साथ ही यह देखा जाना चाहिए कि यदि ऐसा कोई आदेश था, तो रेलवे टेंडर की पात्रता शर्तों पर उसका क्या प्रभाव पड़ता था और कंपनी द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों में इसका खुलासा किया गया था या नहीं। केवल ब्लैकलिस्टिंग के आरोप से किसी कंपनी की वर्तमान अपात्रता स्वतः सिद्ध नहीं होती।

बिड कैपेसिटी को लेकर भी जाँच की आवश्यकता बताई जा रही है। आरोप है कि एक कंपनी ने पहले कोलफील्ड क्षेत्र में चल रहे कार्यों को अपनी बिड कैपेसिटी के आकलन में सही ढ़ंग से नहीं दर्शाया था। यदि ऐसा हुआ था, तो यह निर्धारित करने के लिए मूल निविदा दस्तावेज, चालू कार्यों की सूची, शेष दायित्व, कार्यों की प्रगति और बिड कैपेसिटी की गणना का परीक्षण करना होगा कि प्रस्तुत जानकारी सही थी या नहीं। यह भी देखा जाना चाहिए कि संबंधित अधिकारियों ने निविदा मूल्यांकन के समय उपलब्ध दस्तावेजों का नियमानुसार सत्यापन किया था या नहीं।

इस पूरे मामले में रेलवे बोर्ड, पूर्वोत्तर रेलवे के महाप्रबंधक, निर्माण संगठन और संबंधित सतर्कता एजेंसियों से माँग है कि तीनों टेंडरों की संयुक्त समीक्षा कराई जाए। मूल ठेकों की लागत, मूल ठेकेदारों का नाम, अनुबंध समाप्ति की स्थिति, अब तक किए गए भुगतान, वास्तविक शेष कार्य, नए टेंडरों की लागत, निविदा में भाग लेने वाले ठेकेदारों और स्वीकृत दरों का तुलनात्मक विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए। साथ ही, प्रत्येक सेक्शन की चेनज-वार भौतिक प्रगति और भुगतान का मिलान कराया जाए। क्रमशः