RDSO के IPIS वेंडर अप्रूवल और विनिर्देश परिवर्तन पर गंभीर प्रश्न: स्वतंत्र जांच की मांग

प्राप्त एक सूचना में RDSO के दूरसंचार विभाग में एकीकृत यात्री सूचना प्रणाली (IPIS) से संबंधित परीक्षण, प्रोटोटाइप अप्रूवल तथा वेंडर अप्रूवल की प्रक्रिया के संबंध में गंभीर आरोप लगाए गए हैं। चूंकि ये आरोप संबंधित अधिकारियों अथवा वेंडर्स के विरुद्ध लगाए गए हैं, अतः यहां इन्हें अंतिम अथवा प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है। इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कर उन्हें संबंधित मूल अभिलेखों के आधार पर सत्यापित करना आवश्यक है।

प्रोटोटाइप टेस्ट एवं वेंडर अप्रूवल से संबंधित आरोप

प्राप्त शिकायत के अनुसार, IPIS के नमूनों के परीक्षण एवं अनुमोदन की प्रक्रिया संबंधित दूरसंचार अधिकारी/कार्यपालक निदेशक (दूरसंचार) के प्रत्यक्ष नियंत्रण में है। यह आरोप है कि नए विक्रेताओं द्वारा प्रस्तुत नमूनों के परीक्षण एवं अनुमोदन की प्रक्रिया में आवश्यक पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है।
शिकायत में कुछ मामलों में नमूनों के साथ कथित रूप से छेड़छाड़ अथवा अनुचित व्यवहार कर उन्हें अस्वीकृत करने की आशंका भी व्यक्त की गई है। साथ ही, यह भी आरोप है कि इस प्रक्रिया के माध्यम से विक्रेताओं के अनुमोदन को सीमित रखने तथा पूर्व से अनुमोदित विक्रेताओं को लाभ पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।

इन आरोपों की सत्यता केवल मूल परीक्षण अभिलेखों, प्रयोगशाला/परीक्षण रिपोर्टों, नमूना अभिरक्षा अभिलेखों, निरीक्षण टिप्पणियों, अस्वीकृति के कारणों तथा संबंधित अधिकारियों की फाइल टिप्पणियों के परीक्षण से ही निर्धारित की जा सकती है।

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अप्रूव्ड वेंडर्स और अधिकारियों के बीच निहित संबंध

शिकायत में यह गंभीर आरोप लगाया गया है कि कुछ अनुमोदित विक्रेताओं तथा संबंधित अधिकारियों के बीच ऐसी संभावित मिलीभगत हो सकती है, जिसके परिणामस्वरूप नए विक्रेताओं को अनुमोदन प्राप्त करने में बाधाएं उत्पन्न की जा रही हैं।

यदि यह आरोप जांच में सही पाया जाता है, तो इससे निम्नलिखित पहलुओं पर गंभीर प्रश्न उत्पन्न होंगे—

  • निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा;
  • विक्रेता अनुमोदन की पारदर्शिता;
  • सरकारी खरीद प्रक्रिया;
  • रेलवे के हित; तथा
  • सार्वजनिक धन का उचित उपयोग।

अतः इस पहलू की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच अत्यावश्यक है।

IPIS विनिर्देश में परिवर्तन एवं लागत वृद्धि

शिकायत के अनुसार, IPIS के पूर्व संस्करण संशोधन-I की तुलना में बाद में लागू विनिर्देश में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। यह भी आरोप है कि इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप IPIS की लागत में लगभग 2.5 से 3 गुना तक वृद्धि हुई है।

यह विषय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि विनिर्देश में परिवर्तन से सरकारी खरीद की लागत में कई गुना वृद्धि हुई है, तो निम्नलिखित बिंदुओं की जांच आवश्यक है—

  • विनिर्देश में परिवर्तन का प्रस्ताव किस अधिकारी अथवा समिति ने दिया?
  • परिवर्तन का तकनीकी एवं वित्तीय औचित्य क्या था?
  • रेलवे बोर्ड द्वारा इसे कब तथा किस आधार पर अनुमोदित किया गया?
  • पुराने एवं नए विनिर्देशों की तुलनात्मक लागत विश्लेषण क्या थी?
  • विनिर्देश परिवर्तन से रेलवे पर कुल अनुमानित अतिरिक्त वित्तीय भार कितना पड़ा? तथा
  • क्या विनिर्देश तैयार करते समय किसी विशेष विक्रेता अथवा प्रौद्योगिकी को अनुचित लाभ मिलने की संभावना थी?

चाइल्ड पार्ट्स की उपलब्धता—वेंडर्स की समस्या

शिकायत में यह भी कहा गया है कि IPIS में प्रयुक्त कुछ महत्वपूर्ण उप-घटकों (चाइल्ड पार्ट्स) की आपूर्ति करने वाली फर्में कथित रूप से नए विक्रेताओं को ये घटक उपलब्ध कराने से साफ मना कर रही हैं। यह भी कहा गया है कि ऐसी आपूर्ति के लिए कथित रूप से संबंधित अधिकारी की पूर्व सहमति आवश्यक है।

जानकारों का कहना है कि यदि ऐसा कोई पक्षपाती व्यवहार वास्तव में हो रहा है, तो यह प्रतिस्पर्धा तथा नए विक्रेताओं की बाजार पहुंच की दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय हो सकता है। अतः संबंधित खरीद अभिलेखों तथा घटक-आपूर्ति संबंधी अभिलेखों की भी स्वतंत्र जांच आवश्यक है।

रेलवे पर संभावित अतिरिक्त वित्तीय भार

शिकायतकर्ता द्वारा यह आरोप लगाया गया है कि IPIS संशोधन-II की वर्तमान कीमतों के कारण रेलवे को पुराने संशोधन-I की तुलना में कई करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार उठाना पड़ सकता है।

इसलिए निम्नलिखित बिंदुओं पर विशेष वित्तीय ऑडिट आवश्यक है—

  • संशोधन-I एवं संशोधन-II की इकाई लागत
  • विनिर्देश परिवर्तन के बाद लागत में हुई वृद्धि
  • विभिन्न विक्रेताओं द्वारा प्रस्तुत मूल्य-उद्धरण
  • अनुमोदित विक्रेताओं की तुलनात्मक मूल्य संबंधी जानकारी
  • उप-घटकों की कीमतों में हुई वृद्धि
  • रेलवे द्वारा अब तक किए गए कुल भुगतान; तथा
  • विनिर्देश परिवर्तन से रेलवे पर पड़े अथवा पड़ने वाले अतिरिक्त वित्तीय भार का विवरण।

नमूनों और अभिलेखों को सुरक्षित रखा जाए!

इस शिकायत के संदर्भ में जानकारों का कहना है कि IPIS के वर्तमान एवं पूर्व अनुमोदित विक्रेताओं के नमूनों, परीक्षण रिपोर्टों तथा संबंधित मूल तकनीकी अभिलेखों को सुरक्षित रखा जाए, ताकि भविष्य में किसी प्रकार के अभिलेख परिवर्तन, नमूना प्रतिस्थापन अथवा अन्य छेड़छाड़ की संभावना न रहे।
जहां आवश्यक हो, स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञों अथवा किसी अन्य सक्षम परीक्षण संस्था के माध्यम से नमूनों का पुनः परीक्षण कराया जा सकता है।

वेंडर्स की मांग

उपरोक्त गंभीर आरोपों के दृष्टिगत प्रभावित वेंडर्स द्वारा निम्नलिखित कार्रवाई की मांग की गई है—

  • पूरे मामले की ऐसे स्वतंत्र एवं सक्षम अधिकारी अथवा समिति से जांच कराई जाए, जिसका संबंधित दूरसंचार विभाग से कोई प्रत्यक्ष हित-संघर्ष न हो।
  • IPIS संशोधन-I एवं संशोधन-II के विनिर्देशों की स्वतंत्र तुलनात्मक तकनीकी एवं वित्तीय समीक्षा कराई जाए।
  • पिछले वर्षों में IPIS हेतु अनुमोदित विक्रेताओं की सूची, अनुमोदन तिथियां, नमूना परीक्षण रिपोर्ट तथा अस्वीकृति रिपोर्टों का ऑडिट कराया जाए।
  • नए विक्रेताओं द्वारा प्रस्तुत नमूनों के परीक्षण एवं अस्वीकृति से संबंधित सभी मूल अभिलेख, प्रयोगशाला रिपोर्ट, निरीक्षण टिप्पणियां, फाइल टिप्पणियां तथा पत्राचार सुरक्षित रखे जाएं।
  • जहां संभव हो, अनुमोदित विक्रेताओं के नमूनों का स्वतंत्र पुनः परीक्षण कराया जाए।
  • यह जांच की जाए कि किसी अधिकारी, विक्रेता अथवा घटक-आपूर्तिकर्ता द्वारा किसी नए विक्रेता को अनुचित रूप से रोकने अथवा विद्यमान विक्रेताओं को अनुचित लाभ देने का प्रयास किया गया या नहीं।
  • IPIS विनिर्देश में हुए प्रत्येक महत्वपूर्ण परिवर्तन की फाइल टिप्पणियां, अनुमोदन प्रक्रिया तथा सक्षम प्राधिकारी के निर्णय की जांच की जाए।
  • विनिर्देश परिवर्तन एवं विक्रेता अनुमोदन के कारण रेलवे पर पड़े अतिरिक्त वित्तीय भार का स्वतंत्र वित्तीय ऑडिट कराया जाए।
  • यदि जांच में प्रथम दृष्टया भ्रष्टाचार, मिलीभगत, सरकारी खरीद प्रक्रिया में हेरफेर अथवा आपराधिक कदाचार के पर्याप्त साक्ष्य प्राप्त हों, तो मामले को मुख्य सतर्कता अधिकारी/रेलवे सतर्कता तथा आवश्यकता अनुसार केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो अथवा अन्य सक्षम जांच एजेंसी को सौंपने पर विचार किया जाए।
  • जांच पूरी होने तक संबंधित मूल अभिलेखों, नमूनों, परीक्षण आंकड़ों तथा इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों को सुरक्षित रखने हेतु आवश्यक निर्देश जारी किए जाएं।

शिकायत की प्रकृति

यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इस शिकायत का उद्देश्य किसी अधिकारी अथवा विक्रेता को बिना जांच दोषी ठहराना नहीं है। शिकायत में लगाए गए आरोपों की सत्यता केवल स्वतंत्र जांच, मूल अभिलेखों, तकनीकी परीक्षण, वित्तीय अंकेक्षण तथा संबंधित पक्षों के अभिलेखीय स्पष्टीकरण के आधार पर निर्धारित की जानी चाहिए।

यदि आरोप निराधार पाए जाते हैं, तो संबंधित अधिकारियों अथवा पक्षों को निष्पक्ष जांच के माध्यम से अपना पक्ष स्पष्ट करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। किंतु यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो सार्वजनिक धन एवं रेलवे के हितों की रक्षा हेतु विधिवत उचित कार्रवाई आवश्यक होगी।

अतः रेल प्रशासन से अनुरोध है कि शिकायत को गंभीरता से लेते हुए स्वतंत्र जांच, अभिलेख सुरक्षण, तकनीकी पुनः परीक्षण तथा वित्तीय अंकेक्षण की कार्रवाई की जाए और की गई कार्रवाई को सार्वजनिक किया जाए!