पॉवर कार की ‘OEM Only Policy’: जनता के गाढ़ी कमाई के बदले आखिर मिला क्या?
भारतीय रेल की पॉवर कार मेंटेनेंस की ‘OEM-only policy’ पर अब गंभीर प्रश्न उठाना आवश्यक हो गया है। #OEM को प्रीमियम रेट देने और प्रतिस्पर्धा सीमित करने का औचित्य तभी हो सकता है जब उसके बदले रेलवे को बेहतर सर्विस और सेफ्टी मिले, बेहतर विश्वसनीयता और स्पेशलाइज्ड ओईएम विशेषज्ञता मिल रही हो। लेकिन जमीनी वास्तविकता इसके उलट प्रश्न खड़े कर रही है।
29 जुलाई 2026 को जैसलमेर में पॉवर कार नं. 251071 में गंभीर आग लगी। उत्तर पश्चिम रेलवे (#NWR) ने अपने आधिकारिक पत्र में इसे “very serious incident of fire” कहा। इससे भी गंभीर बात यह है कि PCME/NWR द्वारा ओईएम के अधिकृत कर्मचारी से बात करने के बाद रेलवे ने रिकॉर्ड किया कि संबंधित कर्मी “were not properly trained.” रेलवे ने मेंटेनेंस क्वालिटी, फायर सेफ्टी प्रक्रिया और ऑपरेशनल विजिलेंस में भारी विसंगतियां भी दर्ज कीं।
यानी ओईएम को प्रीमियम रेट—अर्थात मनचाही दरें—देने के बावजूद रेलवे को घटना के बाद अपने अधिकारियों को निर्देश देना पड़ा कि पॉवर कार पर लगाए जाने वाले लोगों की आईटीआई क्वालिफिकेशन, ट्रेनिंग, तकनीकी योग्यता और ओईएम कॉम्पिटेंसी सर्टिफिकेट की जांच की जाए।
OEM अलग-अलग, ग्राउंड पर एजेंसी वही?
यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न पैदा होता है—
जैसलमेर/जोधपुर में किर्लोस्कर पॉवर कार के मेंटेनेंस /एस्कॉर्टिंग में एक अन्य कंपनी एगिस फैसिलिटी मैनेजमेंट (Egis Facility Management) की भूमिका बताई गई है। वहीं संत्रागाछी में कमिन्स पॉवर कार के ऑपरेटर एवं मेंटेनेंस स्टाफ की भर्ती में भी एगिस फैसिलिटी मैनेजमेंट की ब्रांडिंग सामने आई है। भर्ती विज्ञापन में ‘फ्रेशर’ के लिए ₹23,000 और अनुभवी स्टाफ के लिए ₹26,000 + benefits दर्शाए गए हैं।
यह बात सही है कि कम वेतन अपने-आप किसी कर्मचारी को अयोग्य नहीं बनाता, लेकिन पॉलिसी का मुद्दा इससे बिल्कुल अलग है:
अगर किर्लोस्कर हो या कमिन्स (Cummins)—वास्तविक ग्राउंड लेवल मैनपॉवर और एक्जिक्यूशन आखिर एक ही फैसिलिटी मैनेजमेंट एजेंसी के माध्यम से हो रहा है, तो रेलवे द्वारा ओईएम को इतना प्रीमियम रेट किस स्पेशलाइज्ड सर्विस के लिए दिया जा रहा है?
ओईएम का नाम बदल गया, लेकिन एक्जिक्यूशन एजेंसी वही रही—तो ‘OEM exclusivity’ का टेक्निकल और फाइनेंसियल जल्टिफिकेशन क्या है?
क्या यह जनता की गाढ़ी कमाई की “बंदरबाँट” जैसी व्यवस्था नहीं बनती जा रही है?
बिना कम्प्लीट फाइनेंसियल ट्रेल के किसी बंदरबाँट को तथ्य के रूप में कहना उचित नहीं होगा। लेकिन फील्ड की परिस्थितियाँ निश्चित रूप से यह प्रश्न पूछने का आधार पैदा करती हैं।
रेलवे द्वारा प्रीमियम रेट पर कॉन्ट्रैक्ट ओईएम को दिया जाता है। ओईएम के नीचे फैसिलिटी मैनेजमेंट एजेंसी एक्जीक्यूशन करती दिखाई देती है। वही एजेंसी अपेक्षाकृत बहुत कम मासिक वेतन पर मैनपॉवर की भर्ती करती है। और इसके बावजूद भीषण आग लगने के बाद रेलवे को पता चलता है कि भर्ती किए गए कर्मचारी अच्छी तरह से प्रशिक्षित नहीं थे।
तो जनता को गाढ़ी कमाई से दिया गया अतिरिक्त प्रीमियम आखिर जा कहाँ रहा है और उसके बदले रेलवे को मिला क्या?
यदि प्रीमियम रेट देने का उद्देश्य ‘OEM-level expertise’ था, तो उसका परिणाम आग की कम घटनाएं, कम फेलियर, बेहतर उपलब्धता और बेहतर सेफ्टी के रूप में दिखाई देना चाहिए था।
अब पॉलिसी का ऑडिट होना चाहिए
रेलवे को इस ‘OEM-only policy’ का स्वतंत्र फाइनेंसियल एवं टेक्निकल ऑडिट कराना चाहिए और केवल चार बातें सामने रखनी चाहिए:
- पुरानी प्रतिस्पर्धात्मक दर बनाम नई ओईएम दर
- ओईएम को रेलवे द्वारा दिया गया पैसा बनाम डाउनस्ट्रीम एक्जीक्यूशन कास्ट
- पॉलिसी से पहले और बाद के पॉवर कार फायर/फेलियर
- प्रीमियम एक्सपेंडिचर के बदले रिलायबिलिटी तथा सेफ्टी में वास्तविक इम्प्रूवमेंट।
यदि आंकड़े साबित करते हैं कि प्रीमियम से सेफ्टी और रिलायबिलिटी कुछ सुधरी है, तो पॉलिसी जस्टिफाईड है।
लेकिन यदि काम आउटसोर्स्ड मैनपॉवर ही कर रहा है, योग्यता पर रेलवे को स्वयं प्रश्न उठाने पड़ रहे हैं और सीरियस फायर/फेलियर भी जारी हैं, तो ‘OEM-only policy’ पर पुनर्विचार आवश्यक है।
प्रश्न बहुत सीधा है:
जब ओईएम अलग-अलग हैं, लेकिन ग्राउंड पर फैसिलिटी मैनेजमेंट एजेंसी वही है, तो ओईएम प्रीमियम क्यों?
जनता का पैसा ओईएम के लोगो और कॉन्ट्रैक्टिंग लेयर्स के लिए नहीं—बेहतर सेफ्टी और रिलायबिलिटी के लिए खर्च होना चाहिए।
और यदि वह इम्प्रूवमेंट नहीं मिल रही है, तो रेलवे को बताना चाहिए कि, “इतना अतिरिक्त पब्लिक फंड खर्च करके आखिर मिला क्या?”

