रोटेशनल ट्रांसफर को धता बताने का खेल: रेल सिस्टम में भ्रष्टाचार, मनमानी और जवाबदेही का संकट
भारतीय रेल में प्रशासनिक सुधार, पारदर्शिता और सुशासन सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों के नियमित रोटेशनल ट्रांसफर का नियम बनाया गया है। लेकिन जब उच्च पदों पर बैठे लोग ही नियमों को ताक पर रखकर अपने चहेतों को बचाने में जुट जाते हैं, तो पूरे सिस्टम की साख दांव पर लग जाती है। ऐसा ही एक गंभीर मामला मध्य रेल से सामने आया है, जहाँ नियमों को ठेंगा दिखाते हुए एक वरिष्ठ अधिकारी को मुंबई में ही बनाए रखने के लिए कथित तौर पर बड़े स्तर पर तिकड़म भिड़ाई गई है।
पूरा घटनाक्रम: कैसे बचाए जा रहे हैं चहेते अधिकारी?
मामले की शुरुआत मध्य रेल के तत्कालीन मुख्य विद्युत वितरण इंजीनियर (#CEDE) वेदप्रकाश (#IRSEE-2000) के चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स (#CLW) में हुए ट्रांसफर से होती है। सूत्रों के अनुसार, उन्हें मध्य रेलवे से तुरंत रिलीज न करने के लिए रेलवे बोर्ड के तत्कालीन शीर्ष स्तर (MTRS और CRB) से #PCEE/CR को मौखिक निर्देश या संदेश दिए गए थे। मीडिया प्लेटफॉर्म #Railwhispers द्वारा इस खबर को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर उजागर किए जाने के बाद उन्हें रिलीज तो कर दिया गया था, लेकिन PCEE/CR ने उन्हें दो महीने की लंबी छुट्टी मंजूर कर दी थी। परिणामस्वरूप, लगभग 26 साल की लगातार लंबी सेवा में पहली बार मुंबई से बाहर ट्रांसफर किए गए वेदप्रकाश आज तक सीएलडब्ल्यू में जॉइन करने नहीं पहुँचे।
अब उन्हें मुंबई में ही टिकाए रखने के लिए रेलवे बोर्ड से लेकर स्थानीय स्तर पर एक नया खेल खेला गया और मुंबई रेलवे विकास निगम (#MRVC) में उनके लिए एक पद का जुगाड़ किया गया। हालांकि, MRVC का आधिकारिक पक्ष यह है कि उनके एक अधिकारी का ट्रांसफर इरीन (#IRIEEN), नासिक हो जाने के कारण वहाँ यह पद खाली हुआ था, जिसके लिए नियमानुसार विज्ञापन जारी किया गया था।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस पद के लिए केवल दो अधिकारियों—वेदप्रकाश और परिहार—ने आवेदन किया और दोनों ही अधिकारी मध्य रेल के ही हैं। सोमवार, 12 अक्टूबर को हुए औपचारिक साक्षात्कार के दौरान कथित तौर पर दूसरे अधिकारी (परिहार) को यह समझा दिया गया कि यह पूरी चयन प्रक्रिया केवल वेदप्रकाश को ही मुंबई में समायोजित करने के लिए ही रची गई है।
दोहरे मापदंड: एक को वीआरएस, दूसरे को संरक्षण
इस मामले का सबसे काला पहलू यह है कि रेलवे बोर्ड द्वारा दोहरे मापदंड अपनाए जा रहे हैं। वेदप्रकाश से ठीक पहले दक्षिण रेलवे के एक अन्य अधिकारी समीर दिघे (IRSEE-2000), जिनका भी लगभग 26 साल के सेवाकाल में पहली बार चेन्नई से CLW ट्रांसफर हुआ था, उन्हें रोटेशन ट्रांसफर स्वीकार न करने पर वीआरएस लेने के लिए मजबूर कर दिया गया।
रेलवे बोर्ड के अंदरूनी सूत्रों के माध्यम से यह भी तथ्य सामने आया है कि समीर दिघे का ट्रांसफर पूर्व MTRS/DGHR/MInfra नवीन गुलाटी द्वारा रुकवाया गया था, जबकि वेदप्रकाश का ट्रांसफर रुकवाने और उन्हें मुंबई में ही बनाए रखने के लिए रेलवे बोर्ड के एक पूर्व मेंबर घमासान सिंह—एक अत्यंत घटिया आदमी—की तगड़ी लॉबिंग काम कर रही थी।
अधिकारियों के रोटेशन न होने से रेल सिस्टम को हो रहा नुकसान
नियमित रोटेशनल ट्रांसफर का मुख्य उद्देश्य किसी भी अधिकारी को एक ही स्थान या कुर्सी पर लंबे समय तक टिकने से रोकना है, ताकि भ्रष्टाचार, स्थानीय जोड़तोड़ नेटवर्क और भाई–भतीजावाद की जड़ें मजबूत न हो सकें। इसके अभाव में रेलवे सिस्टम को निम्नलिखित गंभीर नुकसान उठाने पड़ते हैं:
- हितों का टकराव (Conflict of Interest): एक ही जोन या शहर में दशकों तक जमे रहने से अधिकारी स्थानीय ठेकेदारों, वेंडरों और निजी हितों के साथ सांठगांठ बना लेते हैं, जिससे पारदर्शी कार्यप्रणाली नष्ट हो जाती है।
- भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद: लंबे कार्यकाल के दौरान प्रशासनिक पदों पर बैठे अधिकारी अपने चहेतों को टेंडर आवंटन और उच्च पदों पर उपकृत करने का नेटवर्क तैयार कर लेते हैं।
- सिस्टम में असंतोष और निराशा: जो अधिकारी ईमानदारी से नियमों का पालन करते हुए दूर-दराज के क्षेत्रों या नए स्टेशनों पर ट्रांसफर स्वीकार करते हैं, उनका मनोबल टूटता है। इसके विपरीत, रसूखदार जुगाड़ू अधिकारियों द्वारा ट्रांसफर रुकवाने से सर्वसामान्य कर्मियों-अधिकारियों में गहरी निराशा फैलती है।
- सुरक्षा और प्रशासनिक दक्षता पर असर: जब तकनीकी और संरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण पदों पर पेशेवर योग्यता से ज्यादा राजनीतिक या प्रशासनिक लॉबिंग हावी हो जाती है, तो अंततः रेल सुरक्षा और परियोजना समय-सीमा प्रभावित होती है।
भ्रष्टाचार और नॉन-रोटेशन का सीधा संबंध
रोटेशन ट्रांसफर से बचना और भ्रष्टाचार सीधे तौर पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब किसी अधिकारी को एक ही कार्यक्षेत्र या मलाईदार कमाऊ पद पर वर्षों तक रहने का संरक्षण मिल जाता है, तो वह सिस्टम की जवाबदेही से ऊपर उठ जाता है। मनचाही पोस्टिंग हासिल करने के लिए बोर्ड स्तर के पूर्व और वर्तमान अधिकारियों की लॉबिंग इस बात का प्रमाण है कि नियम केवल कमजोर या सामान्य अधिकारियों के लिए हैं, जबकि रसूखदार जुगाड़ू अधिकारियों के लिए प्रशासनिक व्यवस्था को बंधक बना लिया जाता है।
बोर्ड और जोनल स्तर पर किसकी है जिम्मेदारी?
इस प्रकार की अनियमितताओं और मनमानी के लिए स्पष्ट रूप से निम्नलिखित स्तरों पर जवाबदेही तय होनी चाहिए:
- रेलवे बोर्ड स्तर: नीतिगत फैसलों, पारदर्शी तबादलों और कैडर मैनेजमेंट की मुख्य जिम्मेदारी चेयरमैन/रेलवे बोर्ड (#CRB) और बोर्ड के संबंधित मेंबर्स (MTRS, MInfra, MOBD, और MF) की होती है। यदि बोर्ड स्तर पर ही मौखिक आदेशों के जरिए चुनिंदा अधिकारियों के ट्रांसफर रोके जा रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक भ्रष्टाचार है।
- जोनल स्तर (PHOD/GM): जोनल मुख्यालयों पर महाप्रबंधक (GM) और संबंधित प्रधान विभाग प्रमुखों (जैसे PCEE) की यह नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी होती है कि वे बोर्ड के आदेशों को निष्पक्षता से लागू करवाएं। इसके उलट, यदि वे अपने चहेतों को लंबी छुट्टियाँ देकर या फर्जी पदों की जुगाड़ करके बचाते या फैसलिटेट करते हैं, तो वे भी इस मिलीभगत और भ्रष्टाचार में बराबर के भागीदार हैं।
अब प्रश्न रेलमंत्री से—
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब समीर दिघे जैसे अधिकारी को रोटेशन नीति के तहत वीआरएस लेने के लिए मजबूर किया गया, तो उसी बैच के वेदप्रकाश को मुंबई में ही लगातार बनाए रखने के लिए यह पूरा ताना-बाना किसने बुना? क्या रेलमंत्री इस पूरे प्रकरण की उच्च-स्तरीय और निष्पक्ष जाँच करवाएँगे? जब पूर्व जीएम और ‘मेंबर’ स्तर के अधिकारी मंत्री की नाक के नीचे इस तरह की गलत गतिविधियों में संलिप्त रहकर रेल सिस्टम का बंटाधार कर रहे हैं, तो ऐसे में रेलवे का निगरानी तंत्र और मंत्री सेल क्या कर रहा है? रेल के जानकारों और नियम-निर्देशों का पालन करने वाले सत्यनिष्ठ अधिकारियों की निगाहें अब रेल मंत्रालय के अगले कदम पर टिकी हैं।

