नियमों की गलत व्याख्या: पीवीसी भुगतान में स्थानीय मनमानी और नियमों की अनदेखी उजागर

मुंबई: पश्चिम रेलवे के एफए एंड सीएओ-II (कंस्ट्रक्शन) द्वारा 2 जून 2026 को जारी एक महत्वपूर्ण वित्तीय परिपत्र (No. WR/S&C/AC/Int Circular/2026/06) ने ईपीसी (EPC) और आईआर-जीसीसी कॉन्ट्रैक्ट्स में स्टील की प्राइस वेरिएशन (PV) की गणना को लेकर गंभीर विसंगतियों को उजागर किया है। यह स्पष्ट रूप से रेलवे द्वारा स्वयं स्वीकार किया गया मामला है कि स्थानीय स्तर पर नियमों की गलत, मनमानी और अपरिपक्व व्याख्या की जा रही थी।

प्रमुख विसंगतियां और रेलवे की स्वतः स्वीकारोक्ति

परिपत्र में यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है कि विभिन्न रेलवे यूनिट्स में आईआर-जीसीसी 2022 (IR-GCC 2022) के प्रावधानों से हटकर अलग-अलग तरीके अपनाए जा रहे थे:

  1. RINL/SAIL मूल्य प्रकाशन बंद होने पर भी पुराना डेटा उपयोग: स्टील की कीमतों के प्रकाशन को आरआईएनएल (RINL) और सेल (SAIL) द्वारा बंद किए जाने के बावजूद, रेलवे की कुछ यूनिट्स द्वारा लगभग 3 साल पुरानी फ्रोजन दरों के आधार पर पीवी की गणना की जा रही थी। स्टील की कीमतों में भारी गिरावट के बाद भी पुरानी दरों को अपनाने से ठेकेदारों को अनुचित वित्तीय लाभ मिलने की आशंका थी। 
  2. क्लासिफिकेशन 9 का गलत उपयोग: बिल्डिंग वर्क्स जैसे मामलों में, सुविधा या मनमानी व्याख्या के आधार पर रेजिडुअल (residual) श्रेणी यानी क्लासिफिकेशन 9 का उपयोग किया जा रहा था, जबकि यह केवल तभी लागू होना चाहिए जब काम अन्य श्रेणियों (1 से 8) के अंतर्गत न आता हो। 
  3. सब-क्लाससिफिकेशन ‘डी’ की गलत पदानुक्रमता: आरसीसी संरचनाओं, पुलों और इमारतों में उपयोग होने वाले रीइंफोर्समेंट स्टील पर सब-क्लाससिफिकेशन ‘डी’ (जो कि गर्डर, एफओबी जैसी गढ़ी हुई संरचनात्मक इस्पात वस्तुओं के लिए है) के तहत पीवी गणना की जा रही थी, जबकि इसके लिए सही प्रावधान सब-क्लाससिफिकेशन ‘बी’ है। 
  4. AOR के आधार पर स्थानीय संशोधन: सब-क्लाससिफिकेशन ‘बी’ अपनाने के बाद भी, एनालिसिस ऑफ रेट्स (AOR) के आधार पर लेबर कॉम्पोनेन्ट आदि के प्रतिशत में स्थानीय स्तर पर बदलाव या री-डिस्ट्रीब्यूशन किया जा रहा था। रेलवे बोर्ड के एसीएस नंबर 01 (ACS No. 01) के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद ऐसा करना रेलवे बोर्ड के नियमों में मनमाना बदलाव माना गया है, जिससे इरेगुलर पेमेंट्स (अनुचित भुगतान) और अंडर-रिकवरी की स्थिति उत्पन्न होती है। 

पुराने और क्लोज्ड कॉन्ट्रैक्ट्स पर बड़ा संकट: रेट्रोस्पेक्टिव ऑडिट की आवश्यकता

यह वित्तीय परिपत्र केवल भविष्य के पीवी बिलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पुराने और पहले ही बंद हो चुके कॉन्ट्रैक्ट्स पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। 

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यदि पहले के कार्यों में भी स्थानीय स्तर पर प्रिस्क्राइब्ड कॉम्पोनेन्ट वेटेजेस बदले गए थे, तो निम्नलिखित बिंदुओं पर जांच आवश्यक है:

  • क्या ऐसे सभी क्लोज्ड कॉन्ट्रैक्ट्स का रेट्रोस्पेक्टिव ऑडिट किया जाएगा?
  • किन-किन कॉन्ट्रैक्ट्स में पीवी फार्मूला बदला गया और किस अधिकारी ने इसे अप्रूव किया?
  • क्या एओआर के आधार पर रेलवे बोर्ड के निर्धारित वेटेजेस बदलकर ठेकेदारों को अतिरिक्त भुगतान किया गया?
  • क्या नकारात्मक पीवी के मामलों में रेलवे की रिकवरी कम हुई?

सीबीआई, सीएजी, विजिलेंस और अन्य केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका

चूंकि रेलवे फाइनेंस ने स्वयं इन अनियमित प्रथाओं को रिकॉर्ड पर ला दिया है, इसलिए सार्वजनिक हित में यह प्रश्न उठता है कि:

  • क्या सीएजी, नीति आयोग, पीएमओ और वित्त मंत्रालय पिछले वर्षों के क्लोज्ड कॉन्ट्रैक्ट्स, फाइनल बिलों और पीवीसी/पीवी भुगतानों का स्वतंत्र ऑडिट कराएंगे?
  • यदि जांच में जानबूझकर नियम बदलकर वित्तीय नुकसान पहुँचाने के प्रमाण मिलते हैं, तो क्या मामला सीबीआई या विजिलेंस जांच तक जाएगा?
  • रेलवे बोर्ड को यह सार्वजनिक करना चाहिए कि इस परिपत्र के जारी होने से पहले कितने कॉन्ट्रैक्ट्स में ऐसी गलत गणना अपनाई गई और कितने कॉन्ट्रैक्ट्स क्लोज हो चुके हैं?

निष्कर्ष

पश्चिम रेलवे का यह परिपत्र इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि विभिन्न रेलवे यूनिट्स में नियमों की मनमानी व्याख्या और स्थानीय स्तर पर बदलाव के कारण वित्तीय नियमों का उल्लंघन हुआ है। मामला केवल भविष्य के पीवीसी बिलों का नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के उन पुराने भुगतानों का भी है जो रेलवे द्वारा पहले ही किए जा चुके हैं। भविष्य में सुधार के साथ-साथ पास्ट ऑडिट और सख्त जवाबदेही तय करना अब अति आवश्यक हो गया है, ताकि सार्वजनिक राजस्व की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

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