रेलवे के स्पेशल लिमिटेड टेंडर पर प्रश्नचिन्ह: स्थानीय स्तर पर ठेकेदार चयन की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी?

भारतीय रेल में निर्माण और रखरखाव के कार्यों के लिए उपयोग किए जाने वाले स्पेशल लिमिटेड टेंडर (#SLT) की प्रक्रिया एक बार फिर गंभीर चर्चा के केंद्र में आ गई है। ठेकेदारों और जानकारों द्वारा यह मांग उठाई जा रही है कि SLT टेंडरिंग प्रक्रिया को पूरी तरह से स्वचालित, पारदर्शी और #IREPS (Indian Railways E-Procurement System) के माध्यम से रेलवे बोर्ड स्तर पर संचालित किया जाए। साथ ही, स्थानीय स्तर पर ठेकेदारों के चयन की व्यवस्था की स्वतंत्र जाँच की मांग भी जोर पकड़ रही है।

मुख्य चिंताएं और उठाए गए गंभीर बिंदु:

  1. चयन प्रक्रिया पर पारदर्शिता का अभाव: सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि SLT के तहत किन ठेकेदारों को आमंत्रित किया जाएगा, इसका निर्णय कौन और किस आधार पर लेता है? क्या बार-बार चुनिंदा स्थानीय ठेकेदारों को ही अवसर मिल रहा है? चयन के मानदंडों, अनुमोदन और आमंत्रित फर्मों की सूची का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में होना चाहिए।
  2. पूल और रिंग फॉर्मेशन का जोखिम: यदि बोली लगाने से पहले ही ठेकेदारों को यह पता चल जाए कि इस टेंडर में कौन-कौन भाग ले रहा है, तो आपसी मिलीभगत, बिड रोटेशन और प्रतिस्पर्धा कमजोर होने का खतरा बढ़ जाता है। इससे रेलवे को वास्तविक प्रतिस्पर्धी दरों के बजाय भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
  3. अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत की आशंका: यदि किसी मामले में रेल अधिकारियों और चयनित ठेकेदारों के बीच अनुचित तालमेल या हितों के टकराव की शिकायत मिलती है, तो निष्पक्ष स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए। यह पता लगाया जाना आवश्यक है कि चयन का आधार क्या था और क्या किसी विशेष पक्ष को अनुचित लाभ पहुंचाया गया।
  4. वित्तीय अनियमितताओं और मनी लॉन्ड्रिंग की आशंका: जांच के दौरान यदि अवैध भुगतान, रिश्वत या संदेहास्पद आर्थिक लेनदेन के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित एजेंसियों द्वारा धन के स्रोतों और लाभार्थियों की गहराई से जाँच की जानी चाहिए (हालांकि केवल आशंका के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता)।
  5. डिजिटल साक्ष्यों और CDR की जाँच: टेंडर जारी होने से लेकर बोली जमा करने की अवधि के दौरान के कम से कम 15 दिनों के संचार रिकॉर्ड (CDR, ईमेल और संदेश) की सक्षम कानूनी अनुमति के साथ समीक्षा की जानी चाहिए। इसका उद्देश्य मात्र संपर्क के आधार पर किसी को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि मिलीभगत की पुष्टि करना है।
  6. रेलवे को वित्तीय और कानूनी क्षति: प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने से रेलवे को न केवल ऊंची लागत चुकानी पड़ती है, बल्कि बाद में मुकदमों, मध्यस्थता (Arbitration) और कानूनी विवादों का सामना भी करना पड़ता है।

प्रमुख सुधारों की मांग:

  • स्वचालित प्रणाली: IREPS के माध्यम से रेलवे बोर्ड स्तर पर एक स्वचालित चयन प्रणाली लागू की जाए, जिससे स्थानीय स्तर पर मनमाने ढंग से सूचियां न बनाई जा सकें।
  • लिखित और ऑडिट योग्य मानदंड: सभी SLT टेंडरों में ठेकेदारों के चयन के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और ऑडिट योग्य नियम तय हों।
  • गोपनीयता: बोली खुलने तक भाग लेने वाले ठेकेदारों की पहचान और भागीदारी की जानकारी पूरी तरह गोपनीय रखी जाए।
  • सार्वजनिक ऑडिट: SLT के उपयोग, सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी और अंतिम दरों का स्वतंत्र ऑडिट हो और इसे संबंधित जोनल रेलवे के पोर्टल पर सार्वजनिक किया जाए।
  • कड़ी कार्रवाई: संदिग्ध मामलों में रेलवे विजिलेंस, सीवीसी या सीबीआई से जाँच कराई जाए और भ्रष्टाचार प्रमाणित होने पर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई हो।

निष्कर्ष और अंतिम प्रश्न:

जब भारतीय रेल के पास IREPS जैसी अत्याधुनिक डिजिटल प्रणाली पहले से मौजूद है, तो SLT टेंडर में ठेकेदारों के चयन और आमंत्रण की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और ऑडिट योग्य क्यों नहीं बनाया जा रहा? रेलवे बोर्ड को इस व्यवस्था की तत्काल समीक्षा करनी चाहिए, ताकि सार्वजनिक धन की सुरक्षा और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित हो सके।