संपादकीय | बड़े टेंडर, छोटे ठेकेदार, हितों का टकराव, और जवाबदेही

रेलवे हो या हाईवे—सरकारी निर्माण कार्यों में टेंडरों का लगातार बढ़ता आकार छोटे और स्थानीय ठेकेदारों की भागीदारी के लिए गंभीर संकट बनता जा रहा है। यदि टेंडर इतने बड़े होते जाएं कि स्थानीय ठेकेदार प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाएं, तो इसका सीधा प्रभाव स्थानीय रोजगार और हजारों मजदूरों की आजीविका पर पड़ता है।

इसके साथ ही एक अन्य गंभीर समस्या हितों के टकराव की है। यदि किसी निर्णय लेने वाले अधिकारी या प्राधिकारी को किसी कंपनी के टेंडर, तकनीकी स्वीकृति, भुगतान या अनुबंध से जुड़े निर्णय लेने हैं, तो उसके प्रत्यक्ष लाभार्थियों और निकट संबंधियों के उस कंपनी में किसी भी वित्तीय हित की पारदर्शी जांच अनिवार्य होनी चाहिए।

इस दायरे में पति-पत्नी, माता-पिता, सास-ससुर, भाई-बहन, बेटा-बेटी, दामाद-बहू, जीजा-साला/साली, भाभी-देवर/ननद तथा अन्य निर्धारित निकट संबंधी शामिल किए जाने चाहिए। मुद्दा सीधा है—क्या निर्णय लेने वाले अधिकारी या उनके निकट संबंधी उस कंपनी के शेयर रखते हैं, खरीदते हैं या किसी अन्य रूप में आर्थिक लाभ प्राप्त करते हैं? यदि ऐसा कोई हित-संबंध पाया जाता है, तो संबंधित व्यक्ति को उस प्रक्रिया से पूरी तरह अलग किया जाना चाहिए और इसकी सार्वजनिक घोषणा होनी चाहिए।

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यह किसी पर व्यक्तिगत आरोप नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन की रक्षा, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता की मांग है। ईडी, सीबीआई, सीवीसी, वित्त मंत्रालय और गृह मंत्रालय से यह अपेक्षा है कि वे बड़े सरकारी टेंडरों में संभावित हितों के टकराव, लाभकारी ओनरशिप, शेयर होल्डिंग और संबंधित व्यक्तियों के वित्तीय हितों का स्वतंत्र ऑडिट कराएं।

बड़ा टेंडर देना गलत नहीं है, लेकिन वह पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी होना चाहिए।

हालाँकि यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यदि छोटा ठेकेदार मजबूत होगा, तो स्थानीय रोजगार बढ़ेगा और सरकारी व्यवस्था पर जनता का भरोसा भी मजबूत होगा।

छोटे ठेकेदारों का यह भी कहना है कि वे वह दौर भूले नहीं हैं जब देश में दो लाख से दो करोड़ रुपये तक के छोटे और मध्यम कार्यों के हजारों टेंडर होते थे। उस समय काम स्थानीय स्तर पर बंटता था, जिससे छोटे ठेकेदारों को अवसर, मजदूरों को रोजगार और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को गति मिलती थी। आज जब छोटे कार्य भी बड़े पैकेजों में समाहित हो रहे हैं और पांच करोड़ रुपये से कम के कार्य करने वालों के लिए अवसर सीमित हो रहे हैं, तो उनकी चिंताएं पूरी तरह स्वाभाविक हैं।

उनका यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि क्या विकास का मतलब केवल बड़े-बड़े टेंडर और पैकेज हैं? उनकी मांग है कि विकास का मॉडल ऐसा हो जिसमें बड़े प्रोजेक्ट्स के साथ-साथ छोटे स्थानीय कार्य भी शामिल हों, ताकि छोटे ठेकेदार, मजदूर और स्थानीय व्यवसाय—सभी की भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

यदि सरकार बड़े टेंडर देना जारी रखती है, तो हितों के टकराव पर अत्यंत कड़े नियम लागू होने चाहिए। जिस अधिकारी या निर्णयकर्ता का किसी कंपनी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध हो, उसके तथा उसके निकट संबंधियों द्वारा कंपनी के शेयर रखने या खरीदने पर स्पष्ट प्रतिबंध और अनिवार्य घोषणा की व्यवस्था होनी चाहिए। टेंडर का आकार बड़ा हो सकता है, किंतु पारदर्शिता उससे भी बड़ी होनी चाहिए।

मूल प्रश्न यह है कि क्या सरकारी कार्य स्थानीय छोटे ठेकेदारों और समर्पित लोगों को मिलेंगे, या बड़े टेंडरों के जरिए यह व्यवस्था शेयर और सट्टा बाजार से जुड़ी चुनिंदा बड़ी कंपनियों तक ही सीमित होकर रह जाएगी? व्यवस्था में सभी की समान हिस्सेदारी और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। यदि किसी पद पर बैठे व्यक्ति पर निजी लाभ के लिए किसी कंपनी को अनुचित फायदा पहुंचाने का आरोप है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए।

छोटे ठेकेदार अब कई गंभीर और बुनियादी प्रश्न उठा रहे हैं:

  • जब पांच करोड़ रुपये तक के टेंडरों में केवल पांच प्रतिशत हिस्सा ही छोटे पैकेजों के लिए रखा जाता है, तो देश के लाखों छोटे और मध्यम ठेकेदारों का भविष्य क्या होगा?
  • एक तरफ बड़ी आबादी आज भी मुफ्त राशन पर निर्भर है, तो दूसरी तरफ सरकारी निर्माण कार्यों के टेंडर लगातार विशाल रूप क्यों लेते जा रहे हैं?
  • छोटे ठेकेदारों की आवाज को बार-बार क्यों अनसुना किया जा रहा है?
  • क्या बड़े पैकेज वाली टेंडर व्यवस्था वास्तव में एमएसएमई, स्थानीय रोजगार, क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और छोटे ठेकेदारों के हित में है?

अब छोटे ठेकेदारों और एमएसएमई उद्यमियों को केवल कोरे आश्वासन नहीं, बल्कि समान अवसर चाहिए। यदि टेंडरों का आकार इसी प्रकार बढ़ता रहा और अवसर सीमित होते गए, तो स्थानीय स्तर पर यह विरोध और मुखर होगा। देश को ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जहां सार्वजनिक काम केवल सट्टा बाजार से जुड़ी कंपनियों तक सीमित न रहे, बल्कि मजदूरों को उनका अपना स्थानीय साथी और क्षेत्रीय ठेकेदार मिले जो उनके साथ खड़ा हो सके और वास्तविक स्थानीय रोजगार का सृजन कर सके। यह अब सोचना सरकार को है, क्योंकि वोट बड़े ठेकेदार या बड़ी कंपनियां नहीं दिलातीं, बड़े ठेकेदार और बड़ी कंपनियां केवल बड़ी रिश्वत या बड़ा पार्टी फंड तो दे सकती हैं मगर वोट नहीं दिलवा सकतीं, यह काम छोटे, मध्यम और स्थानीय ठेकेदार तथा मजदूर ही करते हैं!