भ्रष्टाचार का नया तरीका—“टेंडर सेटिंग”?
जयपुर: उत्तर पश्चिम रेलवे (#NWR) के जयपुर मंडल के अंतर्गत आने वाले RUB (रोड अंडर ब्रिज) और LHS के टेंडरों की पारदर्षिता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। टेंडर दस्तावेजों और शर्तों की समीक्षा से ऐसा प्रतीत होता है कि वाटरप्रूफिंग (जलरोधक) कार्यों के लिए तय की गई शर्तें किसी खास एजेंसी या चुनिंदा ठेकेदारों को लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से डिजाइन की गई हैं।
टेंडर की संदेहास्पद शर्तें और प्रावधान
उत्तर पश्चिम रेलवे, जयपुर मंडल द्वारा जारी किए गए RUB टेंडरों (जैसे टेंडर संख्या ENGG-JP-2026-27-104 और ENGG-JP-2026-27-105) की शर्तों में यह प्रावधान किया गया है कि वाटरप्रूफिंग कार्यों के लिए ठेकेदार को फॉस्रॉक (Fosroc), सीका (Sika), पैगेल (Pagel), इजोनिल (Izonil) या समकक्ष स्पेशलिस्ट एजेंसी के साथ ₹100 के नॉन-जुडिशियल स्टाम्प पेपर पर एमओयू और मैन्युफैक्चरर सर्टिफिकेट देना अनिवार्य होगा। इसके साथ ही, यह शर्त भी जोड़ी गई है कि यह सर्टिफिकेट टेंडर की बिड-सबमिशन स्टार्ट डेट से 90 दिन से अधिक पुराना नहीं होना चाहिए।
इस पूरी प्रक्रिया और शर्तो को लेकर निम्नलिखित गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं:
- पहले से तैयारी का खेल: जब टेंडर जारी ही अभी हुआ है, तो टेंडर जारी होने से पहले ही ऐसी विशिष्ट शर्तों और एमओयू के लिए दस्तावेज और व्यवस्था क्यों और कैसे तैयार हो जाती है?
- सीमित जानकारी: ₹100 के नॉन-जुडिशियल स्टाम्प पेपर पर बैक-डेटेड एमओयू और टेंडर से पहले से तैयार स्पेशलिस्ट एजेंसी के दस्तावेजों की जानकारी आखिर कितने कांट्रैक्टर्स को थी? यदि यह रिक्वायरमेंट टेंडर से पहले व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं थी, तो क्या केवल कुछ चुनिंदा ठेकेदारों को इसकी जानकारी देकर उन्हें पहले से दस्तावेज तैयार करने का अवसर दिया गया?
- 90 दिन की वैलिडिटी का औचित्य: जब ठेकेदार के क्रेडेंशियल्स पुराने अनुभवों के आधार पर स्वीकार किए जाते हैं और उसकी ईएमडी, बैंक गारंटी और सिक्योरिटी डिपॉजिट जैसी वित्तीय प्रतिभूतियां टेंडर में मान्य होती हैं, तो वाटरप्रूफिंग के लिए 90 दिन की समय-सीमा की शर्त क्यों रखी गई?
- इस 90-दिवसीय शर्त का वास्तविक टेक्निकल उद्देश्य क्या है? इसका परिणाम स्पष्ट रूप से यह हो सकता है कि जिस कांट्रैक्टर को इस शर्त की पहले से जानकारी हो, वही समय रहते स्पेशलिस्ट एजेंसी से एमओयू बनवा ले, जबकि अन्य ठेकेदारों को टेंडर के बाद इसकी भनक लगे।
क्या यह केवल औपचारिकता है?
जानकारों का मानना है कि यदि फील्डिंग पहले से सेट हो और मैच फिक्स जैसी स्थिति बन जाए, तो फिर टेंडर प्रक्रिया की औपचारिकता निभाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। यदि प्रक्रिया निष्पक्ष है, तो सभी बिडर्स को समान अवसर और समान जानकारी क्यों नहीं दी जानी चाहिए? यदि किसी खास ठेकेदार को पहले से लाभ पहुंचाने की यह व्यवस्था है, तो यह सारी प्रक्रिया स्वस्थ टेंडर कॉम्पिटिशन न होकर केवल एक दिखावा मात्र रह जाती है।
स्वतंत्र सतर्कता और सीवीसी जांच की मांग
इन गंभीर संदेहों को देखते हुए यह आवश्यक हो गया है कि:
- जयपुर य मंडल में डीआरएम और एडीआरएम द्वारा लगाए गए RUB टेंडरों की पूरी टेंडरिंग प्रक्रिया, प्री-टेंडर निर्णयों, एलिजिबिलिटी कंडीशंस और संबंधित दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच हो।
- इस बात की गहराई से विजिलेंस/सीवीसी जांच की जाए कि किसे कब जानकारी मिली, एमओयू कब तैयार हुआ, स्टाम्प पेपर कब खरीदा गया और टेंडर जारी होने से पहले दस्तावेज कैसे बन गए।
रेल प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि यह 90 दिन की शर्त किस तकनीकी आवश्यकता या नियम के तहत रखी गई है। यदि इसका जवाब संतोषजनक नहीं मिलता है, तो इस शर्त की उच्च-स्तरीय जांच अनिवार्य है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि टेंडर वास्तविक प्रतिस्पर्धा के लिए था या किसी चहेते ‘पसंदीदा ठेकेदार’ के लिए!

