एक और नए रेलवे जोन की मांग: राजनीतिक हितसाधन का माध्यम बनी भारतीय रेल—एक गंभीर समीक्षा!
झारखंड के सांसदों द्वारा रेलमंत्री को दिए गए ज्ञापन (दिनांक 09/02/2024) तथा वीडियो विश्लेषण के आधार पर भारतीय रेल के विकेंद्रीकरण, नए जोनों के गठन और राजनीतिक निहित स्वार्थों पर प्रस्तुत है एक विस्तृत और तर्कसंगत समीक्षा
#Ep262: एक और नए रेलवे जोन की मांग:
राजनीतिक हितसाधन का माध्यम बनती भारतीय रेल और नए जोनों की हकीकत
भारतीय रेल, जो कभी देश को एक सूत्र में पिरोने वाली अखंड राष्ट्रीय धमनी हुआ करती थी, आज लगातार क्षेत्रीय और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते छोटे-छोटे हिस्सों में तोड़ी जा रही है। हाल ही में झारखंड के एनडीए सांसदों द्वारा रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव को सौंपे गए ज्ञापन में राज्य के लिए एक अलग रेलवे जोन (रांची मुख्यालय के साथ) बनाने की मांग की गई है। यह मांग कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि उस प्रवृत्ति का हिस्सा है जहां राष्ट्रीय नेटवर्क को प्रांतीय और राजनीतिक हितसाधन का माध्यम बना दिया गया है।
1. वाजपेई सरकार से शुरू हुआ सिलसिला और इसके दूरगामी परिणाम
वर्ष 2003-04 में तत्कालीन वाजपेई सरकार के कार्यकाल के दौरान सात नए रेलवे जोनों का गठन किया गया था। इसके बाद के राजनीतिक दलों ने भी इसी राह पर चलते हुए क्षेत्रीय तुष्टीकरण के तहत नए जोन (जैसे साउथ कोस्ट रेलवे) बनाने का काम जारी रखा।
- हानि: इन निर्णयों से देश के एकीकृत राष्ट्रीय रेल ढ़ांचे को भारी नुकसान पहुंचा है। रेलवे को राज्यों की सीमाओं में समेट देने से इसकी अखिल भारतीय प्रकृति कमजोर हुई है।
- लाभ: इसका सीधा लाभ कुछ राजनीतिक दलों को सत्ता भोगने के रूप में और रेल अधिकारियों-कर्मचारियों को स्थानीय स्तर पर मनचाही पोस्टिंग और ट्रांसफर से बचने के रूप में मिला है। आम जनता या देश को इससे कोई अल्प या दीर्घकालिक लाभ नहीं मिला।
2. प्रशासनिक और परिचालनिक स्तर पर सुधार या गिरावट?
नए जोन बनने के समर्थकों का तर्क होता है कि इससे प्रशासन चुस्त होगा और विकास तेजी से होगा। परंतु वास्तविकता इसके विपरीत है:
- परिचालनिक बाधाएं: छोटे-छोटे जोन और सीमित डिवीजनों (जैसे सिकंदराबाद, हैदराबाद और नांदेड़ वाले साउथ सेंट्रल रेलवे या सिकंदराबाद के आसपास के क्षेत्रों) के कारण कर्मचारियों का रोटेशन और प्रशासनिक लचीलापन लगभग समाप्त हो गया है। हेडक्वार्टर और डिवीजन कुछ ही किलोमीटर के दायरे में सिमट कर रह गए हैं।
- बैरियर्स और समय की बर्बादी: अत्यधिक जोनल बैरियर बन जाने के कारण ट्रेनों के संचालन में तालमेल कमजोर हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप आज ट्रेनें समय पर नहीं चल पा रही हैं और स्पेशल ट्रेनों के नाम पर यात्रियों पर आर्थिक बोझ बढ़ाया जा रहा है। प्रशासनिक दक्षता सुधरने के बजाय भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के लिए नए रास्ते अवश्य खुल गए हैं।
3. सांसदों के ज्ञापन में दिए गए तर्कों की वास्तविकता
झारखंड के सांसदों द्वारा दिए गए ज्ञापन में यह तर्क दिया गया है कि राज्य में उन्नत रेल ट्रैफिक, वंदे भारत जैसी ट्रेनों के परिचालन और खनिज संपदा में बड़े योगदान के कारण अलग जोन बनने से राज्य का सर्वांगीण विकास होगा और रेल राजस्व बढ़ेगा।
- तर्क की समीक्षा: यह तर्क तार्किक रूप से कमजोर और पूर्णतः भ्रामक है। केवल एक नया प्रशासनिक भवन या ‘जोन’ बना देने से न तो राज्य की आय बढ़ती है और न ही रेलवे की आमदनी में स्वतः कोई वृद्धि होती है। आज के डिजिटल युग में GEM या IREPS के माध्यम से टेंडर कोई भी कहीं से भी डाल सकता है। यह डाले भी जा रहे हैं। स्थानीय विकास और रोजगार का जोन से कोई सीधा संबंध नहीं होता, यह केवल क्षेत्रीय राजनीतिक संतुष्टि और अधिकारियों के हितों का साधन मात्र है।
4. क्या राज्यों का छोटा होना रेल नेटवर्क पर लागू होता है?
राजनीतिक कारणों से राज्यों का बंटवारा (जैसे झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड का गठन) भले ही प्रशासनिक सुविधा के नाम पर किया गया हो, लेकिन यह सिद्धांत एक अखिल भारतीय परिवहन और तकनीकी नेटवर्क पर लागू नहीं होता:
- यदि राज्यों के छोटे होने के आधार पर रेलवे जोन बांटे जाने लगे, तो देश की ‘पॉवर ग्रिड’ को भी अलग-अलग राज्यों के हिसाब से तोड़ देना चाहिए था, या हर राज्य का अलग टेलीकॉम नेटवर्क होना चाहिए था।
- रेल केंद्र का विषय है। ऊर्जा और दूरसंचार की तरह रेलवे भी एक केंद्रीय और एकीकृत राष्ट्रीय बुनियादी परिवहन ढ़ांचा है, जिसे क्षेत्रीय सीमाओं में बांधना तकनीकी और आर्थिक रूप से नुकसानदेह है।
5. समेकित और जोन-वार समीक्षा की आवश्यकता
वर्तमान परिस्थितियों की मांग है कि:
- समीक्षा और ऑडिट: वर्ष 2003-04 के बाद से बनाए गए सभी नए जोनों (विशेषकर ईस्ट सेंट्रल रेलवे – ECR या अन्य) के वित्तीय निवेश, बजट उपयोग और उसके अनुपात में हुए विकास कार्यों की एक स्वतंत्र और निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच एवं ऑडिट कराया जाना चाहिए।
- पुनर्गठन: राजनीतिक रेवड़ियां बांटने और क्षेत्रीय दबाव में आकर नए जोन बनाने की प्रवृत्ति पर तुरंत रोक लगनी चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय रेल के इस फैले हुए ‘रायते’ को समेटकर इसे पुनः प्रभावी रूप से 5 या 9 बड़े जोनों के एकीकृत ढ़ांचे के तहत लाया जाए, ताकि राष्ट्रीय हित और यात्रियों की सुगमता सर्वोपरि बनी रहे।
निष्कर्ष
भारतीय रेल देश की जीवन रेखा है। यदि इसे राजनीतिक और प्रांतीय हितों के तहत टुकड़ों में बांटा जाता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब यह राष्ट्रीय नेटवर्क पूरी तरह कमजोर होकर केवल स्थानीय अधिकारियों और राजनीतिक दलों के स्वार्थ का अड्डा बनकर रह जाएगी। समय आ गया है कि सरकार इस दिशा में आत्म-मंथन करे और तुष्टीकरण की राजनीति छोड़कर एक मजबूत, एकीकृत और पारदर्शी रेलवे प्रणाली की स्थापना करे।

