‘रेलवे क्वार्टर’ बने अवैध कमाई का अड्डा: रेल कॉलोनियों में धड़ल्ले से चल रहा कमर्शियल रेंट रैकेट, सुरक्षा ताक पर!

दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली में उत्तर रेलवे के कर्मचारियों के लिए बनाए गए आवास अब मूल उद्देश्यों से पूरी तरह भटक चुके हैं। रेलवे बोर्ड के सख्त नियमों को ठेंगा दिखाकर राजधानी की प्रमुख रेलवे कॉलोनियां—सदर बाजार, किशनगंज, सब्जी मंडी, शकूरबस्ती और तुगलकाबाद—अवैध किराए के अड्डों और कमर्शियल गतिविधियों का गढ़ बन चुकी हैं। सरकारी तंत्र की उदासीनता के कारण सरकारी संपत्तियों का यह खुला दुरुपयोग लगातार जारी है। 

नियम ताक पर रख चल रहा समानांतर कारोबार

रेलवे के सेवा नियमों के मुताबिक, आवंटित किया गया सरकारी आवास केवल संबंधित कर्मचारी और उसके आश्रित परिवार के रहने के लिए होता है। इसे किसी तीसरे पक्ष को किराए पर देना या व्यावसायिक कार्यों (दुकानों, गोदाम आदि) के लिए उपयोग करना गंभीर कदाचार की श्रेणी में आता है, जिसके तहत आवंटन रद्द करने और अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान है।

इसके बावजूद, वास्तविकता यह है कि इन कॉलोनियों के 30 से 40 प्रतिशत क्वार्टरों में मूल आवंटी कर्मचारी गायब हैं। उनकी जगह बाहरी लोग 8,000 से 15,000 रुपये प्रति माह तक का किराया चुकाकर अवैध रूप से रह रहे हैं। कई आवासों के बाहर तो व्यवसायिक दुकानों के बोर्ड तक टंगे हुए हैं, जो स्थानीय रेल प्रशासन और सतर्कता विभाग की कार्यप्रणाली पर सीधा प्रश्नचिन्ह लगाते हैं।

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कई रेल आवासों में तो जीआरपी अथवा स्थानीय पुलिस के लोग ही जबरन काबिज हैं, और यह कदाचार केवल दिल्ली या उत्तर रेलवे तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह रोग अन्य जोनल रेलों के लगभग सभी मंडलों में फैला हुआ है।

प्रशासनिक लापरवाही और सुरक्षा पर बड़ा खतरा

इस पूरे अवैध कारोबार के पीछे रेलवे के स्थानीय एस्टेट विभाग और सुरक्षा एजेंसियों की गहरी लापरवाही या मिलीभगत साफ झलकती है:

  • सुरक्षा से खिलवाड़: इन क्वार्टरों में रहने वाले बाहरी लोगों का कोई पुलिस वेरिफिकेशन नहीं होता। ऐसे में ये कॉलोनियां असामाजिक तत्वों और संदिग्ध गतिविधियों का सुरक्षित ठिकाना बनती जा रही हैं।
  • हकदारों का शोषण: एक तरफ जहां जरूरतमंद रेलवे कर्मचारी आवास पाने के लिए वर्षों से लंबी प्रतीक्षा सूची में धक्के खा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ भ्रष्ट कर्मचारी और दलाल सरकारी कोठियों को मिनी-होटल या कमर्शियल पीजी की तरह चलाकर मोटी कमाई कर रहे हैं। 
  • नियमित निरीक्षण का अभाव: फील्ड अफसरों द्वारा समय-समय पर फिजिकल और बायोमेट्रिक सत्यापन न किए जाने के कारण इस अवैध रेंट रैकेट के हौसले बुलंद हैं। 

प्रशासनिक मिलीभगत या ढ़िलाई?

  1. सरकारी आवासों का व्यावसायिक उपयोग और अवैध सबलेटिंग: रेलवे बोर्ड और एस्टेट नियमों (रेलवे सर्विस रूल्स) के तहत आवंटित सरकारी क्वार्टर को किसी अन्य व्यक्ति को किराए पर देना या व्यावसायिक गतिविधियों (जैसे दुकानें चलाना) के लिए उपयोग करना पूरी तरह से अवैध और गंभीर कदाचार है।
  2. दिल्ली की प्रमुख रेलवे कॉलोनियां: सदर बाजार, किशनगंज, सब्जी मंडी, शकूरबस्ती और तुगलकाबाद जैसी कॉलोनियां पुरानी दिल्ली और उत्तर रेलवे के अंतर्गत आने वाले प्रमुख रेलवे आवासीय क्षेत्र हैं, जहाँ कर्मचारियों की कमी, देखरेख और औचक निरीक्षण के अभाव में इस तरह की अनियमितताओं की शिकायतें लंबे समय से प्रशासनिक स्तर पर उठती रही हैं। 
  3. सुरक्षा और प्रशासनिक लापरवाही: बिना पुलिस सत्यापन के बाहरी लोगों का सरकारी आवासों में रहना राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय कानून-व्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा है। साथ ही, जरूरतमंद कर्मचारियों का वर्षों तक प्रतीक्षा सूची में रहना रेलवे हाउसिंग अलॉटमेंट सिस्टम की बड़ी नाकामी को दर्शाता है।

अब सख्त एक्शन की दरकार

जानकारों का मानना है कि रेलवे बोर्ड और रेल प्रशासन को अब औपचारिकताएं छोड़कर ठोस और कड़े कदम उठाने होंगे। यदि समय रहते सभी रेलवे कॉलोनियों में बायोमेट्रिक और आधार-आधारित भौतिक सत्यापन अभियान नहीं चलाया गया, और अवैध कब्जाधारियों तथा उनके संरक्षकों पर बर्खास्तगी जैसी सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह लापरवाही कभी भी किसी बड़ी आंतरिक सुरक्षा आपदा का कारण बन सकती है। सरकारी संपत्ति की लूट को रोकना अब प्रशासनिक साख की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है।