अहमदाबाद मंडल: मिसयूज एंड अब्यूज ऑफ पॉवर, और एफआईआर की आड़ में फेस सेविंग का प्रयास!

भारतीय रेल में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन के दावों की पोल खोलते हुए पश्चिम रेलवे के अहमदाबाद मंडल से एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक (#SrDCM) कार्यालय के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में फर्नीचर की मरम्मत और नई खरीद के नाम पर भारी वित्तीय अनियमित्ताओं के अकाट्य सबूत सामने आए थे। एक व्हिसलब्लोअर द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों, पत्राचार, बिलों और फोटोग्राफ्स से यह खुलासा हुआ था कि जनता की गाढ़ी कमाई का किस प्रकार खुला दुरुपयोग किया जा रहा है। इस संबंध में प्रकाशित, “पश्चिम रेलवे: अहमदाबाद मंडल में फर्नीचर मरम्मत और खरीद के नाम पर वित्तीय घालमेल: चालीस लाख से अधिक की चपत” शीर्षक रिपोर्ट पुनः देखी जा सकती है। इस भ्रष्टाचार का खुलासा होने के बाद जब आवाज उठाई गई, तो इसे दबाने के लिए प्रशासनिक शक्तियों और पहुंच एवं पहचान का दुरुपयोग कर कथित साजिश के तहत पुलिस में एक एफआईआर दर्ज कराने का सनसनीखेज मामला भी सामने आया है।

चालीस लाख से अधिक का संदिग्ध खर्च

प्राप्त वित्तीय दस्तावेजों और व्हिसलब्लोअर के इनपुट्स के अनुसार, मंडल में फर्नीचर की मरम्मत और नए सामान के नाम पर कुल ₹40 लाख से अधिक की भारी-भरकम राशि खर्च की गई है। बाजार दरों के जानकारों का कहना है कि यदि नया सामान खरीदा जाता तो यह पूरा काम तीस लाख रुपये के भीतर हो जाता, जबकि वास्तविक मरम्मत कार्य पर तो बहुत कम खर्च हुआ है। गंभीर आरोप यह भी है कि संबंधित कर्मचारियों और अधिकारियों ने इस बजट का एक बड़ा हिस्सा अपने निजी या सरकारी आवासों पर इंटीरियर और रेनोवेशन कराने में खर्च कर लिया और उनके खर्चों को सरकारी बिलों में जोड़ दिया गया।

वित्तीय आंकड़ों और प्राप्त रिकॉर्ड से स्पष्ट होता है कि एक ही फर्म को संदिग्ध रूप से लगातार और बड़े पैमाने पर काम दिए गए। इस फर्म को जेम पोर्टल के माध्यम से ₹15,44,643 और ऑफलाइन डिमांड के जरिए ₹24,67,619 यानी कुल ₹40,12,262 का भुगतान किया गया। बिलों और वर्क ऑर्डर्स के विश्लेषण से पता चलता है कि सोफा रिपेयरिंग के लिए औसतन ₹5,800 और टिकट बुकिंग ऑफिस की चेयर रिपेयरिंग के लिए औसतन ₹6,200 प्रति चेयर का खर्च दर्शाया गया, जो कि बाजार दरों से कई गुना अधिक है। साबरमती स्टेशन पार्सल ऑफिस के लिए खरीदी गई 8 कुर्सियों की खरीद लागत प्रति कुर्सी ₹6,375 (कुल ₹51,000) दर्शाई गई है, जबकि खुले बाजार में ऐसी कुर्सियां मात्र ₹2,300 से ₹2,700 में मिल जाती हैं। इसके अलावा, इनवाइस नं. C-133484, दि. 31.03.2026 – स्नेक्स और बिसलेरी बॉटल्स (₹1,41,200) और इनवाइस नं. T-2672, दि. 31.03.2026 — स्नेक्स बॉक्स, वीआईपी स्नेक्स बॉक्स, बिसलेरी और पेपर नैपकिन (₹7,95,283) के नाम से भी भारी-भरकम बिल सामने आए हैं, जो इस वित्तीय गड़बड़ी के दायरे को और व्यापक बनाते हैं।

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नोटिंग और वित्तीय स्वीकृतियों के दस्तावेज

इस मामले में सामने आए दस्तावेजों में सीनियर डीईएन/समन्वय, अहमदाबाद (#SrDEN/Co/ADI) के स्तर से जारी की गई नोटिंग भी शामिल है, जो वित्तीय स्वीकृति और प्रशासनिक खर्चों के तौर-तरीकों पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं। दिनांक 21.05.2026 को सीनियर डीईएन/कोऑर्डिनेशन ने ADFM-I-ADI के अनुमोदन से जारी नोटिंग (Ref – Sr.DEN/Co-ADI’s notings dated 20-05-2026) के अनुसार, कम्युनिटी एंगेजमेंट फंक्शन और ट्रेन के फ्लैग-ऑफ जैसे आयोजनों के लिए कुल ₹88,72,722/- की भारी-भरकम अग्रिम राशि की निकासी का प्रस्ताव पास किया गया था। इसमें इंजीनियरिंग विभाग के लिए ₹31,27,732, कमर्शियल विभाग के लिए ₹14,22,975, एसएंडटी के लिए ₹20,31,812.50, मैकेनिकल के लिए ₹5,00,000, इलेक्ट्रिकल के लिए ₹9,72,202, पीआरओ के लिए ₹43,000 और पर्सनल विभाग के लिए ₹7,75,000/- की राशि की अग्रिम निकासी की गई थी। इस नोटिंग में यह भी निर्देश दिए गए थे कि खर्च की अनुमानित दरों की औचित्यपूर्णता (Reasonability of rates) और मूल रूप से बिलों का उचित लेखा-जोखा संबंधित प्राधिकारी द्वारा प्रमाणित होना चाहिए। हालांकि, मैकेनिकल विभाग द्वारा किसी भी प्रकार का वस्तु-वार या मद-वार (Item wise) अनुमानित ब्रेक-अप न दिए जाने के बावजूद इस पर वित्तीय सहमति देना विभागीय कार्यप्रणाली पर संशय पैदा करता है।

सामाजिक कार्यकर्ता के विरुद्ध एफआईआर

जब उपरोक्त वित्तीय अनियमितताएं और भ्रष्टाचार के दस्तावेज सार्वजनिक हुए और सोशल मीडिया तथा समाचार पोर्टलों के माध्यम से आवाज उठाई गई, तो मंडल प्रशासन ने अपनी खाल बचाने के लिए कथित तौर पर अपनी शक्तियों का दुरुपयोग शुरू कर दिया। अहमदाबाद मंडल प्रशासन द्वारा सीनियर डीसीएम कार्यालय में कार्यरत एक सीनियर कमर्शियल क्लर्क मयूर सिंह राजपूत को मोहरा बनाकर शहर कोटड़ा पुलिस स्टेशन में एक प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता और पश्चिम रेलवे के पूर्व जेडआरयूसीसी सदस्य योगेश मिश्रा के विरुद्ध एक साजिश के तहत एफआईआर दर्ज कराई गई है। 

एफआईआर में दर्ज आरोप और धाराएं

शहर कोटड़ा पुलिस स्टेशन में दर्ज इस प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR No. 1119104126026) में गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 336(4), 338, 340(2), 351(2), 308(3), 356(2), 61(2) तथा सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन अधिनियम (IT Act) की धारा 66-D के तहत मामला दर्ज किया गया है।

शिकायतकर्ता मयूर सिंह राजपूत ने आरोप लगाया है कि गत 12 सितंबर 2026 को दोपहर करीब एक बजे आरोपी योगेश मिश्रा डीआरएम ऑफिस स्थित एसीएम (सहायक वाणिज्य प्रबंधक) यजुष आचार्य के पास पहुंचे और कथित तौर पर पैसों की अवैध मांग की तथा मांग पूरी न होने पर बदनाम करने की धमकी दी। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि योगेश मिश्रा और उनके साथी अंकित पांडेय ने आपराधिक षड्यंत्र रचकर रेलवे के वर्क ऑर्डर और निजी रिकॉर्ड अवैध रूप से प्राप्त किए और उनमें छेड़छाड़ कर ₹40 लाख का फर्जी घोटाला बताकर सोशल मीडिया तथा समाचार पोर्टलों पर प्रसारित किया।

निराधार एफआईआर और साजिश?

इस पूरे घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कथित आरोपी योगेश मिश्रा के समर्थकों और जानकारों ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। उनका कहना है कि योगेश मिश्रा एक प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता हैं और वे सितंबर माह में अपने किसी व्यक्तिगत कार्य से डीआरएम ऑफिस गए थे, जहाँ वे एसीएम यजुष आचार्य से पूर्व परिचय के चलते केवल एक मिनट के लिए उनसे मिले थे। पैसे मांगने या ब्लैकमेल करने जैसी बातें पूरी तरह मनगढ़ंत, निराधार और दुर्भावनापूर्ण हैं।

सूत्रों का दावा है कि इस पूरे षड्यंत्र के पीछे सीनियर डीसीएम/अहमदाबाद का दिमाग है, जिन्होंने अपनी पहुंच और गांधीनगर में पदस्थ अपनी आईएएस पत्नी तथा पूर्व जीआरपी डीसीपी रहे अधिकारियों के कथित दबाव का इस्तेमाल कर यह कार्रवाई करवाई है। हैरानी की बात यह है कि सरकारी नौकरी कर रहे क्लर्क मयूर सिंह राजपूत ने एफआईआर में अपना पेशा केवल ‘नौकरी’ लिखा है, जबकि उनका रेलवे में कार्यरत सरकारी पदनाम लिखा जाना चाहिए था; तभी इसे ऑफिसियल एफआईआर माना जा सकता है। इस प्रकार यह एक मायने में निजी व्यक्ति द्वारा एक निजी व्यक्ति—योगेश मिश्रा—के विरुद्ध एक निजी रंजिश जैसी कार्रवाई प्रतीत होती है।

जानकारों का कहना है कि एसीएम यजुष आचार्य को भी कथित रूप से दबाव में लेकर गवाह के रूप में खड़ा किया गया, जबकि बतौर गवाह एफआईआर में उनका नाम डाले जाने की न तो उन्हें कोई पूर्व जानकारी थी और न ही इसकी उनसे पूर्व सहमति ली गई थी। उनके कार्यस्थल की व्यस्तता को लेकर भी कई प्रश्न उठ रहे हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, 2 अक्टूबर गांधी जयंती के अवसर पर उनकी ड्यूटी डीआरएम के साथ लगी थी, उन्हें एडीआरएम के माध्यम से वहां जाने से रोका गया और शिकायतकर्ता राजपूत के साथ बयान देने के लिए पुलिस स्टेशन भेजा गया। बताते हैं कि उन्होंने पुलिस को अपना कोई हस्ताक्षरित बयान नहीं दिया है।

हालाँकि कानूनी जानकारों का कहना है कि पुलिस के सामने दर्ज ऐसे बयानों का कोर्ट में कोई खास कानूनी महत्व नहीं होता। तथापि प्राप्त जानकारी के अनुसार, ऊपरी दबाव में पुलिस द्वारा आरोपी योगेश मिश्रा की न केवल एक दिन की रिमांड ली गई है, बल्कि उनके घर की तलाशी का वारंट भी जारी किया गया है। जानकारों का कहना है कि मंडल प्रशासन द्वारा न केवल आरोपी की सामाजिक प्रतिष्ठा को धूल-धूसरित करने की तैयारी की गई है, बल्कि उन्हें पूरी तरह से प्रताड़ित करने का भी बंदोबस्त किया गया है। जबकि इस पूरे षड्यंत्र के पीछे जिसका कुटिल दिमाग है, उस पर शुरू से ही भारी कदाचार के आरोप लगते रहे हैं।

प्रशासनिक, राजनीतिक और कानूनी परिदृश्य

इस मामले में जब डीआरएम/अहमदाबाद से बात की गई, तो उन्होंने कहा कि उन्हें मामले की पूरी जानकारी नहीं है, लेकिन सीनियर डीसीएम ने उन्हें बताया था कि कमर्शियल विभाग का बिल केवल साढ़े चार से पाँच लाख का था, जिसे बढ़ा-चढ़ाकर चालीस लाख बताया गया है; हालाँकि वह इस पूरे मामले की गहन छानबीन करेंगे।

वहीं, कथित आरोपी योगेश मिश्रा के साथ पश्चिम रेलवे ZRUCC के सदस्य रहे और वर्तमान में दहेगांव, गांधीनगर के नगराध्यक्ष किंजन पटेल ने कड़ी आपत्ति जताते हुए स्पष्ट रूप से कहा है कि योगेश मिश्रा जैसा प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता कभी भी किसी अधिकारी से पैसे मांगने या ब्लैकमेल करने जैसा अपराध नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि उन पर लगाए गए आरोप पूरी तरह निराधार, दुर्भावनापूर्ण और एक गहरे षड्यंत्र का हिस्सा हैं, इसके गंभीर परिणाम होंगे।

इस संबंध में सीनियर डीसीएम और शिकायतकर्ता मयूर सिंह राजपूत का पक्ष जानने के लिए मोबाइल और व्हाट्सएप मैसेज के जरिए उनसे संपर्क करने का कई बार प्रयास किया गया, मगर उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला। जानकारों का मानना है कि सत्ता और पद के अहंकार में अधिकार के इस कथित दुरुपयोग के गंभीर राजनीतिक और कानूनी दुष्परिणाम सामने आएंगे, क्योंकि यह पूरा मामला केवल “मिसयूज ऑफ पॉवर” का ही नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से “अब्यूज ऑफ पॉवर” का भी है। एक पूर्व सीबीआई निदेशक और एक पूर्व सीआरबी जैसे उच्च अधिकारियों के हश्र तथा हाल ही में एक महिला आईएएस अधिकारी पर कोर्ट द्वारा लगाए गए पांच लाख के निजी जुर्माने के उदाहरणों से सबक लेते हुए प्रशासनिक पदों पर बैठे जिम्मेदार अधिकारियों को यह ध्यान रखना चाहिए कि केवल अपने अहंकार की तुष्टि और फेस सेविंग के लिए पद और पॉवर के दुरुपयोग के परिणाम बहुत घातक होते हैं।