रेल विद्युतीकरण पर मंडराता संकट: ओएचई इंसुलेटर में सीमित सप्लायर्स का खेल, आसमान छूती कीमतें और अटकी परियोजनाएं

भारतीय रेल इस समय देश भर में मिशन मोड पर विद्युतीकरण का विस्तार कर रही है। इस महत्वाकांक्षी योजना की रीढ़ है ओवरहेड इलेक्ट्रिफिकेशन (ओएचई) प्रणाली, जिसमें इंसुलेटर सबसे महत्वपूर्ण इलेक्ट्रिकल कंपोनेंट माना जाता है। इसका मुख्य कार्य हाई-वोल्टेज इलेक्ट्रिकल कंडक्टर को सपोर्टिंग स्ट्रक्चर से अलग (इंसुलेट) रखना है, ताकि करंट केवल तारों में बहे और पूरा नेटवर्क सुरक्षित बना रहे। दशकों से इसके लिए पोर्सिलेन तकनीक का व्यापक उपयोग होता रहा है। लेकिन आज स्थिति यह बन चुकी है कि रेलवे की गति को आगे बढ़ाने वाला यही उपकरण कॉन्ट्रैक्टर्स के लिए गले की फांस और रेलवे की प्रगति के लिए गंभीर अड़चन बन गया है। तकनीकी प्रतिस्पर्धा के अभाव और कुछ चुनिंदा निर्माताओं की पकड़ (एकाधिकार) के चलते बाजार में कीमतें अप्रत्याशित रूप से बढ़ने के गंभीर आरोप लग रहे हैं।

चार निर्माताओं से दो पर सिमटा बाजार

उद्योग से जुड़े सूत्रों और फील्ड में काम कर रहे कॉन्ट्रैक्टर्स के अनुसार, कुछ वर्ष पूर्व तक रेलवे ओएचई पोर्सिलेन इंसुलेटर के क्षेत्र में रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइजेशन (आरडीएसओ) से स्वीकृत लगभग चार प्रमुख निर्माता सक्रिय थे। इनमें मॉडर्न इंसुलेटर (राजस्थान), आईईसी इंसुलेटर्स (मंडीदीप, भोपाल), सरवना ग्लोबल और आदित्य बिड़ला इंसुलेटर्स शामिल थे। समय के साथ सरवना ग्लोबल और आदित्य बिड़ला इस सेगमेंट से बाहर हो गए या उन्होंने उत्पादन बंद कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि पूरे बाजार की निर्भरता व्यावहारिक रूप से केवल दो ही निर्माताओं—मॉडर्न इंसुलेटर और आईईसी इंसुलेटर्स—पर आकर टिक गई। जब किसी तकनीकी और क्रिटिकल कंपोनेंट का सप्लायर बेस इतना संकरा हो जाता है, तो बाजार में स्वाभाविक प्रतिस्पर्धा समाप्त हो जाती है और निर्माताओं को मनमाने ढ़ंग से कीमतें तय करने की एकतरफा शक्ति मिल जाती है।

तीन गुना तक उछले दाम, टेंडर शर्तों की मार झेलते कॉन्ट्रैक्टर्स

कॉन्ट्रैक्टर्स का आरोप है कि पिछले दो से तीन वर्षों में पोर्सिलेन इंसुलेटर की दरों में बार-बार संशोधन किया गया। कुछ मदों में तो कीमतें टेंडर के समय उपलब्ध दरों से 3 से 3.5 गुना तक बढ़ चुकी हैं। रेलवे की अनुबंध प्रणाली में पोर्सिलेन को ‘वोलेटाइल’ कंपोनेंट नहीं माना जाता, जिसके कारण टेंडर डॉक्यूमेंट्स में इसकी वास्तविक मूल्य वृद्धि की भरपाई के लिए कोई प्रभावी प्राइस वेरिएशन क्लॉज (पीवीसी) नहीं होता। कॉन्ट्रैक्टर जिस दर के आधार पर बोली लगाकर काम हासिल करता है, बाद में बाजार में उसी उपकरण की दरें कई गुना बढ़ जाती हैं। अब कॉन्ट्रैक्टर्स के सामने दोहरा संकट है: या तो वे भारी वित्तीय घाटा सहकर काम पूरा करें, या फिर काम की गति धीमी कर दें। बैंकों की गारंटी, फंसा हुआ वर्किंग कैपिटल, मशीनरी और मैनपावर की लागत के बीच कॉन्ट्रैक्टर्स के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है।

Advertisements

वैकल्पिक तकनीक और कंपोजिट इंसुलेटर की उपेक्षा पर प्रश्न

सबसे बड़ा तकनीकी विरोधाभास यह है कि आरडीएसओ के तकनीकी दस्तावेजों में पोर्सिलेन के साथ-साथ सिलिकॉन कंपोजिट इंसुलेटर दोनों के तकनीकी प्रावधान पहले से दर्ज हैं। जानकारों का कहना है कि जब देश में एक्स्ट्रा हाई वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों में सिलिकॉन और ग्लास इंसुलेटर जैसी आधुनिक तकनीकों का बड़े पैमाने पर सफल उपयोग हो रहा है, तो रेलवे में इसे खुलकर अपनाने में इतनी हिचकिचाहट क्यों है? आरडीएसओ ने प्रदूषण और पथराव जैसी परिस्थितियों के लिए कंपोजिट इंसुलेटर के फायदे भी रेखांकित किए हैं। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर प्रोक्योरमेंट को टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल क्यों नहीं बनाया गया? नए निर्माताओं के अप्रूवल की प्रक्रिया को समयबद्ध और पारदर्शी बनाकर वैकल्पिक सप्लायर्स को बाजार में क्यों नहीं उतारा गया, यह एक गंभीर नीतिगत प्रश्न है।

कार्टेलाइजेशन और मिलीभगत की आशंका: स्वतंत्र जांच की दरकार

सप्लाई साइड में केवल दो सप्लायर्स का रह जाना, दोनों की दरों का लगभग एक ही दिशा में असामान्य रूप से बढ़ना और कॉन्ट्रैक्टर्स के पास कोई विकल्प न छूटना—यह स्थिति गंभीर प्रतिस्पर्धा-रोधी आचरण (#कार्टेलाइजेशन) की आशंका पैदा करती है। क्या यह मूल्य वृद्धि कच्चे माल, ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स की वास्तविक लागत वृद्धि के अनुपात में है, या फिर यह सप्लायर्स के एकाधिकार का अनुचित लाभ है?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, कॉन्ट्रैक्टर्स ने जोनल रेलवे, आरडीएसओ और रेलवे बोर्ड को कई ज्ञापन सौंपे, लेकिन कोई ठोस राहत नहीं मिली। इससे रेल प्रशासन और चुनिंदा सप्लायर्स के बीच सांठगांठ की आशंकाओं को भी हवा मिल रही है। ऐसे गंभीर आरोपों की निष्पक्षता से पड़ताल के लिए आवश्यक है कि इसे आंतरिक फाइलों तक सीमित न रखकर कॉम्पिटिशन कमीशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) और विजिलेंस जैसी स्वतंत्र एजेंसियों के दायरे में लाया जाए।

सच्चाई सामने लाने के लिए आवश्यक कदम

इस पूरे तंत्र में पारदर्शिता बहाल करने के लिए आरडीएसओ के अप्रूवल, रिन्यूअल और कैंसिलेशन के पुराने रिकॉर्ड खंगालने होंगे। दोनों प्रमुख कंपनियों के पिछले 5 से 10 वर्षों के परचेस ऑर्डर्स, कॉन्ट्रैक्टर्स को जारी कोटेशंस, रेट रिवीजन के आधार और कच्चे माल बनाम विक्रय मूल्य का गहन फॉरेंसिक कॉस्ट ऑडिट होना चाहिए। इसके साथ ही, अन्य स्थापित कंपनियों के बाजार से बाहर होने के कारणों और नए अप्रूवल्स में हुई देरी की भी टाइमलाइन जांची जानी चाहिए।

तात्कालिक समाधान के तौर पर रेलवे को टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल प्रोक्योरमेंट नीति लागू करनी चाहिए, जिससे योग्य कंपोजिट इंसुलेटर निर्माताओं को तत्काल बाजार में एंट्री मिले। इसके अलावा असामान्य रूप से बढ़े दामों के प्रभाव से कॉन्ट्रैक्टर्स को बचाने के लिए अनुबंधों में अंतरिम राहत की व्यवस्था हो। रेलवे का विद्युतीकरण देश के टैक्सपेयर्स के हजारों करोड़ रुपयों से संचालित एक राष्ट्रीय अभियान है। किसी एक छोटे उपकरण की कृत्रिम कमी या सीमित कंपनियों के अनुचित लाभ के चलते देश के इंफ्रास्ट्रक्चर की रफ्तार को बंधक नहीं बनने दिया जा सकता।